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यूसीसी नहीं, औरतों को अदालत तक ले जाने की ज़रूरत: फ्लाविया

प्रणेता झा | Updated on: 24 October 2016, 11:49 IST
QUICK PILL
  • हमें यूसीसी नहीं, मौजूदा कानून के तहत ही अदालतों तक औरतों की पहुंच बनाने की ज़रूरत है. और सिर्फ़ मुस्लिम महिलाओं की नहीं बल्कि सभी महिलाओं की. 
  • महिलाओं के संरक्षण के लिए पर्याप्त कानून बने हुए हैं. हमारे देश में गरीब औरत कोर्ट तक नहीं पहुंच पाती. यह महंगा है और वकील जमकर लूटते हैं. 
  • मौजूदा कानूनों के तहत औरतों को उनके अधिकार तभी मिलेंगे, जब उन्हें सही परामर्श मिले और उनके वकील उन्हें कोर्ट तक लेकर जाएं.

प्रणेता झा:  कमोबेश सभी मज़हब में नियम-कानून औरतों से भेदभाव करने वाले हैं. ऐसे में क्या समान आचार संहिता (यूसीसी) इसका हल नहीं है?

फ्लाविया एग्नेस: सभी मज़हबों के पर्सनल लॉ में लिंग भेद है लेकिन एक समान रूप से नहीं. जैसे हिन्दुओं के वहां शादी में कन्यादान एक रिवाज है, जिसमें लड़की को एक संपत्ति माना जाता है और उसका दान कर दिया जाता है. लड़कियों को पराया धन माना जाता है. मतलब एक बार शादी कर देने के बाद उन्हें मेहमान जैसा माना जाता है. हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत यह शादी का प्रमुख रिवाज है.

औरतों को शादी के वक़्त दहेज दिया जाता है, जो कि उनके दोयम दर्जे की पहचान है. फिर उन्हें और दहेज के लिए परेशान किया जाता है जबकि दहेज प्रथा के खिलाफ सख़्त कानून बना हुआ है. चूंकि हिंदू धर्म में शादी को एक संस्था माना जाता है,  इसलिए वहां तलाक को कलंक जैसा समझा गया है और औरतें तलाकशुदा कहलाने की बजाय परेशानियों और हिंसा के बीच शादी संबंध बनाए रखने को मजबूर हैं. 

हिन्दूओं की शादी में साफतौर पर कोई सुबुत नहीं मिलता, जहां कई रिश्तों में बंधा कोई व्यक्ति आसानी से अपनी पत्नी के साथ संबंध तोड़ दे. जब कोई इंसान पहले भी अपनी शादी हो चुकी होने का दावा करता है, तो उसकी पत्नी को जज तक भी मिस्ट्रैस कह कर संबोधित करते हैं.

इसके ठीक उलट, मुसलमानों में शादी सिर्फ़ एक क़रार होती है, जिसमें महिला अधिकारों की रक्षा के लिए तमाम शर्तें शामिल होती हैं. मुसलमानों की शादी में शौहर की ओर से बीवी को मिलने वाले मेहर को औरत की भविष्य की सुरक्षा निधि माना जाता है. यह दहेज प्रथा के उलट है और आधुनिक भी. 

ईसाइयों की बात की जाए, तो तलाक इस मज़हब में भी काफ़ी मुश्किल है और 2001 के पहले तक आपसी सहमति जैसी कोई बात सामने नहीं आई थी जबकि मुस्लिम लॉ में शुरू से ही तलाक से पहले आपसी सहमति और बातचीत की वकालत की गई है और आपसी सहमति से लिया-दिया गया तलाक मंजूर कर लिया जाता है.

ये कुछ इक्का-दुक्का मिसालें हैं. इनमें से हरेक में सुधार की ज़रूरत है, लेकिन एक समान कानून से ऐसा संभव नहीं है.

प्रणेता झा: बनाने में किस तरह की चिंताएं और परेशानियां आएंगी?

फ्लाविया एग्नेस: फिलहाल सिर्फ़ मुस्लिम लॉ में भेदभाव पर बहस चल रही है जबकि आज़ादी के वक़्त मुस्लिम लॉ प्रगतिशील माना जाता था और हिन्दू कानून के लिए संहिता बनाने पर बहस चल रही थी. हमें इस बहस का दायरा बढ़ाने की जरूरत है. इसके तहत विभिन्न संस्कृति और समुदायों के बीच सांस्कृतिक और कानूनी भेद मालुम किए जाने की ज़रूरत है. यही बेहतर शुरूआत होगी.

पहले से अवैध हैं ऐसी प्रथाएं

प्रणेता झा: भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) जैसे मुस्लिम महिला संगठन भी भेदभाव की कुछ प्रथाओं पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं.

फ्लाविया एग्नेस: बीएमएमए जिन कुप्रथाओं पर पाबंदी की मांग कर रहा है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट पहले ही अवैध करार दे चुका है. मिसाल के लिए 2002 के शमीम आरा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि मनमाने ढ़ंग से मौखिक तलाक या डाक से भेजा गया तलाकनामा कानूनीतौर पर सही नहीं माना जाएगा और तलाक से पहले बातचीत करना जरूरी है. 

संगठन ने निकाह-ए-हलाला, मौखिक और ट्रिपल तलाक से जुड़ी हुई इस प्रथा का भी विरोध किया है. मगर अफ़सोस की बात यह है कि भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने कोर्ट के आदेश को महिला सशक्तीरकरण में इस्तेमाल करने और उन्हें इस कानून का फायदा दिलवाने की बजाय विरोध का रास्ता अपनाया. 

बजाय मुसमलानों के बीच इसपर बात करने की बजाय वे सीधा प्रधानमंत्री से मिले और ट्रिपल तलाक पर पाबंदी लगाने और अपनी आचार संहिता लागू करने की मांग करने लगे. अमूमन प्रतिबंध का मतलब अपराध माना जाता है और कई सारे मुसलमानों ने इसीलिए इसका विरोध किया.

बाद में सायरा बानो मामले में भी ऐसा ही हुआ. बीएमएमए ने पहले से ही अवैध घोषित प्रथाओं को फिर से अवैध घोषित करने की मांग उठाई है. बहुत से प्रगतिशील मुसलमान बीएमएमए के तौर-तरीक़े से नाखुश हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे बिना वजह मुद्दे का ध्रुवीकरण होगा. इसलिए इसे नजरंदाज करना ही ठीक है.

हिंदू महिलाओं का क्या?

प्रणेता झा:  मीडिया में यूसीसी का मुद्दा मुस्लिम पर्सनल लॉ के ही इर्द-गिर्द घूमता नज़र आ रहा है. आम राय ये बन रही है कि इस्लाम में ही औरतों के साथ भेदभाव है. मगर क्या हिंदू संहिता प्रगतिवादी है? क्या हिन्दू महिलाओं के विशेषधिकार का हनन नहीं हो रहा?

फ्लाविया एग्नेस: हम अपने आस-पास देख सकते हैं कि कितनी हिन्दू महिलाएं पीडि़त हैं. वे अपने पर होती हिंसा और अमानवीय व्यवहार से त्रस्त हैं. मगर उन्हें कभी कभार ही 'हिन्दू' कहा जाता है. अमूमन उन्हें सामान्य महिला के मामले ही बोला जाता है. दहेज, दहेज हिंसा या प्रताड़ना पर मैं पहले ही सवाल में बात कर चुकी हूं.

हालांकि और भी वीभत्स रीति-रिवाज हैं. जाति आधारित भेदभाव की बात करें. किसी हिन्दू लड़की के नीची जाति के लड़के के साथ भागने पर उसके अपने माता-पिता उसकी हत्या कर देते हैं. हाल ही आई मराठी मूवी सैराट में भी यही दिखाया गया है. दूसरा, एक ही गोत्र और पिंड में शादी नहीं होती. और बहुत से समुदायों में ऐसा करने वाली लड़की की हत्या कर दी जाती है या उसके जीवनसाथी को मार दिया जाता है और उसे परेशान किया जाता है. 

बाल विवाह पर जुटाए गए ताजा आंकड़ों से पता चला है कि 1.2 करोड़ लडकियों की शादी 10 साल की उम्र में कर दी जाती है. इनमें से 86 फीसदी हिंदू हैं. ये आंकड़े क्या कहते हैं?

इसी तरह हम देखेंगे कि ख़ुदकुशी करने वाली शादीशुदा औरतों में भी हिन्दू महिलाओं की संख्या ज्यादा है. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही एक फैसला दिया था, जिसमें पति को इस आधार पर तलाक मिल जाता है कि पत्नी ने उसके माता-पिता के साथ रहने से इनकार कर दिया था. 

संयुक्त परिवार और संयुक्त परिवार संपत्ति का चलन हिन्दुओं में ही देखने में आता है. अगर महिला किसी और समुदाय की होती तो जज शायद ही यह फैसला देते लेकिन हम इसे महिला विरोधी हिन्दू संस्कृति का नाम नहीं देंगे.

हिन्दू अविभाजित परिवार का उद्धरण भी हिन्दू संस्कृति में ही है. इससे हिन्दुओं को कर में छूट का लाभ मिलता है. अगर यूसीसी लागू की जाएगी तो यह फ़ायदा भी ख़त्म हो जाएगा. 

शरियत में क़ुरआन से इतर की बातें

प्रणेता झा: बीजेपी की मौजूदा सरकार के कार्यकाल में मुस्लिमों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ी हैं. मुसलमानों में यह दहशत है कि लिंग-भेद पर न्याय की आड़ में कहीं बीजेपी हिन्दूवाद तो नहीं थोपना चाहती? और कहीं यूसीसी हिन्दू कानून का ही एक रूप नहीं हो? यह डर कहां तक सही है?

फ्लाविया एग्नेस: उनका यह डर पूरी तरह जायज है. विधि आयोग की तरफ़ से जारी की गई प्रश्नावली में हिन्दू धर्म में दूसरी पत्नी को कोई अधिकार न दिए जाने या ऐसे ही किसी और नियम का कोई उल्लेख नहीं था. इसलिए मुसलमानों को लगता है कि यह सारी कवायद उन्हें उनके मज़हब और तहज़ीब से दूर करने के लिए की जा रही है. मुसलमानों का मानना है कि उनके शादी के पर्सनल लॉ हिन्दू विवाह अधिनियम से कहीं बेहतर हैं.

देखा जाए तो मुस्लिम लॉ अनुबंध पर आधारित हैं और इसी रूप में यह यूरोप और इंग्लैंड तक पहुंचा और अब हिन्दू कानून में भी आ चुका है. विवाह के लिए पत्नी की इच्छा और सहमति लेनी भी जरूरी होती है. हिन्दू विवाह में आज भी लड़की की इच्छा कोई नहीं पूछता. हिन्छुओं में होम, सप्तपदी और कन्यादान को ही महत्व दिया गया है. 

मगर आज मुस्लिम लॉ महिला विरोधी दिखने लगे हैं क्योंकि इसमें कुरआन से इतर बातें शामिल हो गई हैं और इसे सुधारने की जरूरत महसूस हो रही है. अब यूसीसी की लाठी से मुसलमानों को पीटा जा रहा है और उनकी मुस्लिम पहचान को नकारा जा रहा है. कई मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया है.

यूसीसी से हालत बिगड़ेगी

प्रणेता झा: क्या मौखिक तलाक के मसले पर लिंग समानता का हल्ला मचा कर जनता की सहानुभूति ली जा रही है और बाकी मुद्दे इसकी आड़ में छिप गए हैं? क्या यूसीसी से वाकई महिलाओं को फायदा होगा? या फिर एक ख़ास समुदाय को इसकी कीमत चुकानी होगी?

फ्लाविया एग्नेस: मुझे शक है कि यूसीसी से मुस्लिम महिलाओं का शायद ही भला हो. बल्कि इससे उनकी शुरुआती सुरक्षा और छिनने का ख़तरा है. हिन्दू लॉ में भी सुधार की गुंजाइश है. हिन्दुओं में उपेक्षा, बहु विवाह, दहेज प्रताड़ना और दहेज हत्या जैसी गंभीर समस्याओं को दूर करना बहुत जरूरी है. प्रधानमंत्री मुस्लिम महिलाओं को भेदभाव के चंगुल से आजाद करने की बात कर रहे हैं; जो कि साकार हो जाए तभी सही मानें.

सुधार पर्सनल लॉ में ही मौजूद

प्रणेता झा: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यूसीसी का विरोध करते हुए कहा है कि 'ट्रिपल तलाक' असल समस्या नहीं है. आपको क्या लगता है, इससे मुस्लिम समाज, खासतौर पर औरतें आहत होंगी?

फ्लाविया एग्नेस: यह बहुत मुश्किल सवाल है. इसके लिए आपको इस बात का अनुभव होना चाहिए कि समुदायों में कानून किस प्रकार कारगर हो सकता है. मुद्दे को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है और उपाय मुस्लिम लॉ में ही मौजूद हैं, जिन्हें तलाशने की जरूरत है.

इस्लाम त्वरित तलाक में विश्वास करता है. तलाक की कार्यवाही इतनी लंबी नहीं खिंचनी चाहिए, जितनी कि हमारी अदालतों में चलती रहती है. ब्रिटिश हूकूमत द्वारा लागू की गई इस कानूनी प्रणाली में पीडि़त को फीस के रूप में काफी पैसा खर्च करना पड़ता है.

इस्लामिक कानून के अनुसार, अगर दोनों पक्षों के बीच कोई विवाद होता है तो दोनों ओर से एक-एक जिम्मेदार व्यक्ति बतौर मध्यस्थ नियुक्त किया जाता है और मतभेद खत्म कर शादी को बचा लिया जाता है. अगर मतभेद नहीं सुलझते हैं, तभी तीन महीने की इद्दत के बाद अंततः तलाक की घोषणा कर दी जाती है.

तलाक की घोषणा से पहले पत्नी की सारी चीजें, मेहर और कीमती सामान लौटा दिया जाना चाहिए. उसे इद्दत के वक्त का खर्चा दिया जाना चाहिए. साथ ही भविष्य के लिए एक वाजिब समझौता किया जाना चाहिए. 2001 में डेनियल लतीफी ने महिलाओं के लिए ये अधिकार बताए थे.

बातचीत के बाद जब पति तलाक की घोषणा करता है तो इसे केवल मौखिक ट्रिपल तलाक नहीं कहा जा सकता. बाक़ायदा रस्म अदा की जाती है, जब पार्टियां आपसी सहमति से अपने अलग-अलग रास्ते चुनने पर सहमत होती हैं. लेकिन ट्रिपल तलाक के शोर में ये सारी बातें दब गईं.

ऐसा भी समय था जब औरतों को घरेलू हिंसा का शिकार होने के बाद तलाकनामा भेजा जाता था और महिलाओं को तब मुस्लिम लॉ के तहत अपने अधिकार मांगने की छूट मिल जाती थी. 

प्रश्नावली ठीक नहीं

प्रणेता झा: विधि आयोग की प्रश्नावली पर आप क्या सोचती हैं?

फ्लाविया एग्नेस: यह प्रश्नावली फौरी तौर पर तैयार की गई लगती है. इसमें सिर्फ़ अल्पसंख्यक कानून में लिंग भेद की बात की गई है लेकिन हिन्दुओं के बीच भेदभाव संबंधी कानून और प्रथाओं के बारे में बहुत कम कहा गया है. इसीलिए इस मुद्दे का ध्रुवीकरण हुआ.

प्रणेता झा: मान लीजिए कि हमें एक यूसीसी के मुताबिक चलना है तो इसे किस तरह से आदर्श बनाया जा सकता है?

फ्लाविया एग्नेस: इसके लिए ज़रूरी है कि विवाद की बजाय आपसी सहमति से काम किया जाए. यह सारे समुदाय की औरतों के लिए फायदेमंद साबित होगा. हमें सरकार और अल्पख्यकों के बीच बेहतर संवाद स्थापित करने की ज़रूरत है.

प्रणेता झा: मीडिया में पीडि़त मुस्लिम महिला की जो छवि पेश की जा रही है, उससे उन्हें कोई फायदा होगा, जो वाकई में पीडि़त हैं?

फ्लाविया एग्नेस: ईपीडब्लू में मेरा लेख पढ़ें. इसमें मैंने खुल कर कहा है कि मीडिया अनावश्यक रूप से और सनसनीखेज तरीके से मुस्लिम पीडि़ताओं को पेश कर रहा है. सायरा बानो के घरेलू हिंसा प्रकरण को मीडिया ने जिस तरह से दिखाया, यह इसका सबसे खराब उदाहरण है. हजारों हिन्दू महिलाएं भी इसी तरह पीडि़त होती हैं, जिसे मीडिया नहीं दिखाता. दरअसल वे घरेलू हिंसा नहीं मुस्लिमवाद को दिखा रहे हैं. 

मुझे यहां बताना होगा कि सायरा बानो के पास भी वे ही सारे अधिकार थे, जो किसी भी हिन्दू महिला के पास होते हैं. वह 2001 के शमीम आरा केस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर ट्रिपल तलाक को अवैध ठहरा सकती थीं. 

और अगर तलाक मंज़ूर करना था तो घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अदालत का दरवाजा खटखटा सकती थीं और तलाक के बाद अपने आर्थिक अधिकारों का दावा कर सकती थी. लेकिन इन सबके लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट का नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर का वकील करना होगा.

प्रणेता झा: चूंकि पर्सनल लॉ का अधिकांश भाग महिलाओं पर बात करता है, क्या आपको लगता है इस संबंध में महिलाओं को ज्यादा समर्थन देने की जरूरत है? और कैसे?

फ्लाविया एग्नेस: दरअसल हमें यूसीसी नहीं, मौजूदा कानून के तहत ही अदालतों तक औरतों की पहुंच बनाने की आवश्यकता है. और सिर्फ़ मुस्लिम महिलाओं की नहीं बल्कि सभी महिलाओं की. महिलाओं के संरक्षण के लिए पर्याप्त कानून बने हुए हैं.

हमारे देश में गरीब औरत कोर्ट तक नहीं पहुंच पाती. यह महंगा है और वकील जमकर लूटते हैं. मौजूदा कानूनों के तहत औरतों को उनके अधिकार तभी मिलेंगे, जब उन्हें सही परामर्श मिले और उनके वकील उन्हें कोर्ट तक लेकर जाएं.

प्रणेता झा: लिंग,धर्म और वर्ग को ध्यान में रखते हुए इससे ज्यादा अंतर्विभागीय तरीका और क्या हो सकता है? 

फ्लाविया एग्नेस: मुझे खुशी है कि तुमने क्लास की बात की, जो सबसे अहम है. हमारे देश में ज्यादातर गरीब महिलाएं अदालत तक नहीं पहुंच पाती और उन्हें कानूनन सही प्रतिनिधित्व नहीं मिलता; सरकार को चाहिए यूसीसी के बजाय इस ओर ध्यान दे.

First published: 24 October 2016, 11:49 IST
 
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