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WOMEN'S DAY 2018: संविधान ने दिये हैं महिलाओं को ये अधिकार

सुहेल खान | Updated on: 8 March 2018, 7:33 IST

पूरी दुनिया में 8 मार्च को महिला दिवस मनाया जाता है. इस दिन महिलाओं के अधिकार की बात तो की जाती है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग नजर आती है. क्योंकि पुरुषवादी समाज की सोच आज भी महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से बंचित रखती है. ग्रामीण इलाकों में तो आज भी महिलाएं सदियों पुरानी खोखली परंपराओं के आधार पर जीने को मजबूर है. ऐसे में महिला दिवस मनाये जाने का मकसद पूरा नहीं होता.

भारत में आज भी महिलाओं की स्थिति ज्यादा बेहतर नहीं है. शहरी इलाकों को छोड़ दिया जाए तो आज भी देश की महिलाएं दोयम दर्जे की जिंदगी जीने को मजबूर है. नौकरियों में आरक्षण देने की बात हो या फिर संसद में महिलाओं को बराबरी की हक. हर जगह इन्हें आज भी पुरुषों से कम आंका जाता है. सरकारें महिलाओं के हक में वायदे तो हजार करती है, लेकिन उन वायदों पर कोई ध्यान नहीं देतीं.

देश की महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर जरूर है, लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए ये नाकाफी है. वैसे भारतीय संविधान ने महिलाओं को कई ऐसे हक दिये हैं जिनसे महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के मामलों में कमी लाई जा सकती है, लेकिन इन अधिकारों की जानकारी ना होने की वजह से आज भी महिलाओं का शोषण होता रहता है.

भारतीय संविधान ने महिलाओं को कुछ ऐसे अधिकार दिए हैं. जिन्हें देश की हर महिला को जानना जरूरी है. संविधान द्वारा दिए गए इन अधिकारों के बारे में जानने के बाद ही महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरुक होंगी.

भारतीय संविधान ने महिलाओं को दिए हैं ये जरूरी अधिकार

समान वेतन का अधिकार

समान पारिश्रमिक अधिनियम के अनुसार, अगर बात वेतन या मजदूरी की हो तो लिंग के आधार पर किसी के साथ भी भेदभाव नहीं किया जा सकता. क्यों कि आज महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं ऐसे में उन्हें भी पुरुषों के समान वेतन पाने का अधिकार है.

काम के दौरान हुए उत्पीड़न के खिलाफ अधिकार

आज महिलाएं भी पुरुषों के साथ काम कर रही हैं. ऐसे में अगर कोई सहकर्मी उनका यौन उत्पीड़न करता है तो भारतीय संविधान का यौन उत्पीड़़न अधिनियम उन्हेें ये अधिकार प्रदान करता है कि आप यौन उत्पीड़न करने वाले खिलाफ शिकायत दर्ज कराएं.

नाम न छापने का अधिकार

यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को नाम न छापने देने का अधिकार है. अपनी गोपनीयता की रक्षा करने के लिए यौन उत्पीड़न की शिकार हुई महिला अकेले अपना बयान किसी महिला पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में या फिर जिलाधिकारी के सामने दर्ज करा सकती है.

घरेलू हिंसा के खिलाफ अधिकार

ये अधिनियम मुख्य रूप से पति, पुरुष लिव इन पार्टनर या रिश्तेदारों द्वारा एक पत्नी, एक महिला लिव इन पार्टनर या फिर घर में रह रही किसी भी महिला जैसे मां या बहन पर की गई घरेलू हिंसा से सुरक्षा करने के लिए बनाया गया है. आप या आपकी ओर से कोई भी शिकायत दर्ज करा सकता है.

मातृत्व संबंधी लाभ के लिए अधिकार

मातृत्व लाभ कामकाजी महिलाओं के लिए सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि ये उनका अधिकार है. मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत एक नई मां के प्रसव के बाद 26 सप्ताह(6 महीने) तक महिला के वेतन में कोई कटौती नहीं की जाती और वो फिर से काम शुरू कर सकती हैं.

कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अधिकार

भारत के हर नागरिक का ये कर्तव्य है कि वो एक महिला को उसके मूल अधिकार- 'जीने के अधिकार' का अनुभव करने दें. गर्भाधान और प्रसव से पूर्व पहचान करने तकनीक अधिनियम कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अधिकार देता है.

 मुफ्त कानूनी मदद के लिए अधिकार

बलात्कार की शिकार हुई किसी भी महिला को मुफ्त कानूनी मदद पाने का पूरा अधिकार है. स्टेशन हाउस आफिसर (SHO) के लिए ये ज़रूरी है कि वो विधिक सेवा प्राधिकरण(Legal Services Authority) को वकील की व्यवस्था करने के लिए सूचित करे.

रात में गिरफ्तार न होने का अधिकार

एक महिला को सूरज डूबने के बाद और सूरज उगने से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, किसी खास मामले में एक प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही ये संभव है.

संपत्ति पर अधिकार

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत नए नियमों के आधार पर पुश्तैनी संपत्ति पर महिला और पुरुष दोनों का बराबर हक है.

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गरिमा और शालीनता के लिए अधिकार

किसी मामले में अगर आरोपी एक महिला है तो, उसपर की जाने वाली कोई भी चिकित्सा जांच प्रक्रिया किसी महिला द्वारा या किसी दूसरी महिला की उपस्थिति में ही की जानी चाहिए.

First published: 8 March 2018, 7:33 IST
 
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