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मेटरनिटी कानून में बदलाव: कानून पहले भी था पर महिलाओं को इसका कितना लाभ मिलता था?

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 7 February 2017, 8:24 IST

दिल्ली से सटे नोएडा स्थित एक मीडिया हाउस में काम करने वाली अंजू ने 2014 में अपने पहले बच्चे को जन्म दिया. मेटरनिटी बेनेफिट कानून के तहत कंपनी को उन्हें तीन महीने की मेटरनिटी लीव के दौरान पूरी सैलरी का भुगतान करना चाहिए था, लेकिन अंजू को सिर्फ बैसिक सैलरी दी गई.

सोनिया (बदला हुआ नाम) को जब अपनी पहली प्रिगनेंसी का पता चला तो उनकी खुशियों को पंख लग गए. वे एक गुड़गांव की निजी कंपनी में काम करती थी. लेकिन उनकी खुशियां स्थायी नहीं रहीं. जैसे-जैसे उनकी डिलिवरी का समय नजदीक आया उनकी कंपनी का रवैया उनके खिलाफ बदलता गया. सातवें महीने में जब उन्होंने मेटरनिटी लीव की बात कही तो कंपनी ने उनके सामने शर्त रखी कि उन्हें इस दौरान कोई सैलरी नहीं दी जाएगी, यानी लीव विदाउट पे. या फिर वे नौकरी छोड़ दें. 

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यह सिर्फ अंजू या सोनिया की कहानी नहीं है बल्कि निजी क्षेत्र में काम कर रहीं नए भारत के बड़े शहरों में हजारों कामकाजी महिलाओं की इन्हीं स्थितियों से गुजरता पड़ता है. भारत में 1961 से ही ‘मेटरनिटी बेनेफिट कानून’ लागू है. इसके तहत कामकाजी महिलाओं को बच्चे के जन्म के बाद तीन महीने का अवकाश मिलेगा और अवकाश के दौरान उस महिला को कंपनी द्वारा पूरी सैलरी देना अनिवार्य है.

अक्सर निजी कंपनियां अपने यहां काम करने वाली महिलाओं को मेटरनिटी लीव कानून का पूरा लाभ देने से इनकार करती हैं. इसके अलावा अगर निजी कंपनियां छुट्टी देने के लिए तैयार हो जाती हैं तो सैलरी देने के लिए तैयार नहीं होती है.  

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पिछले साल आई श्रम मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2012 में मेटरनिटी बेनिफिट कानून के तहत देशभर में इस तरह की 122 शिकायतें दर्ज की गईं. इसमें सिर्फ पांच मामलों की जांच हुई और सिर्फ दो कंपनियों को ही दोषी पाया गया. पारिवारिक कारणों से ज्यादातर महिलाएं अपनी शिकायतें कोर्ट में नहीं ले जा पाती हैं. और अगर कोई महिला कोर्ट में अपने अधिकार के लिए जाती भी है तो उन्हें लंबे समय तक अदालतों का चक्कर लगाना पड़ता है.

अब महिलाओं को मां बनने पर 26 हफ्ते की छुट्टी मिलेगी

गुरुवार को मेटरनिटी बेनिफिट (संशोधन) बिल, 2016 राज्यसभा से भी पास हो गया है. कानून बनने पर कामकाजी महिलाओं को मां बनने पर 26 हफ्ते की छुट्टी मिलेगी. यह 10 या इससे अधिक कर्मचारियों को काम पर रखने वाले सभी प्रतिष्ठानों पर लागू होगा. इससे संगठित क्षेत्र में 18 लाख महिला कर्मचारियों लाभ होगा.

पहले दो बच्चों के लिए 26 हफ्ते का अवकाश मिलेगा जबकि तीसरे बच्चे के लिए और गोद लेने वाली मां को 12 हफ्ते का अवकाश मिलेगा. इसके अलावा 50 से अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों के लिए ऑफिस परिसर में ही क्रेच का अनिवार्य प्रावधान शामिल है. क्रेच वह जगह है जहां बच्चों को दिन के समय घर जैसा माहौल और स्नेह दिया जाता है. वहां बच्चों को साफ रखने, गंदे कपड़े बदलने के साथ उन के खानेपीने से लेकर उनके खेलने तक का पूरा ध्यान रखा जाता है.

दिल्ली स्थित अंबेडकर विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाली असिस्टेंट प्रोफेसर शिवानी नाग कहती हैं, “प्रबंधन के सभी स्तरों पर स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ावा देने के लिए यह कानून जरूरी है. अब इसे लागू कराने की जिम्मेदारी भी उठानी होगी. इसके अलावा महिलाओं को लेकर सोच में भी बदलाव लाने की जरूरत है. अक्सर निजी कंपनियां इंटरव्यू के दौरान महिलाओं से शादी की उनकी योजना के बारे में पूछती हैं जो आमतौर पर पुरुषों से नहीं पूछा जाता है. मां बनने और शादी करने वाली महिलाओं के साथ किसी भी स्तर पर भेदभाव नहीं होना चाहिए.”

मां बनने के बाद कई महिलाएं नौकरी छोड़ देती हैं

कानून के साथ ही पुरुषों को भी अपनी सोच बदलने की जरूरत है. कारोबारी संगठन एसोचैम द्वारा किए गए एक सर्वे से पता चलता है कि मां बनने के बाद कई महिलाएं नौकरी छोड़ देती हैं. सर्वे के मुताबिक 40 प्रतिशत महिलाएं अपने बच्चों को पालने के लिए यह फैसला लेती हैं. भारत में कामकाजी महिलाओं को सिर्फ नौकरी ही नहीं बल्कि परिवार, पति और बच्चे की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है.

ग्लोबल मैकेंजी इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार कामकाजी क्षेत्र में लैंगिक समानता के मामले में भारत अपने कई पड़ोसी देशों से भी पीछे है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में महिलाओं की आबादी 60 करोड़ से ज्यादा है. लेकिन देश के श्रम शक्ति में उनकी हिस्सेदारी केवल 27 फीसदी है जबकि वैश्विक स्तर पर ये औसत 40 फीसदी से ज्यादा है. इसी रिपोर्ट के अनुसार अगर पुरुष भी घर में महिलाओं के काम में हाथ बंटाना शुरू करे दें तो महिलाओं के पास काम करने के लिए ज्यादा मौके होंगे. इसका असर जीडीपी पर भी पड़ेगा. रिपोर्ट के अनुसार भारत में अगर पुरुषों की तरह महिलाओं को पेशेवर कामकाज के पूरे मौके मिलें तो दस साल बाद देश के जीडीपी में 16 फीसदी का इजाफा हो सकता है.

पिछले दशक में घटा कामकाजी महिलाओं का अनुपात

भारत में शहरी क्षेत्रों की तुलना में कामकाजी महिलाओं की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा है. पिछले साल आई विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले सालों में भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या घटी है. एसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार ने  2005 से 2014 के बीच महिलाओं के अनुपात में दस फीसदी की गिरावट आई है. इस दौरान महिलाओं का अनुपात 37 से घटकर 27 फीसदी पर आ गया.

पिछले साल एक महिला पत्रकार ने अदालत में अपील की थी कि 2012 में गर्भवती होने के कुछ समय बाद ही उन्हें कंपनी से निकाल दिया गया, जबकि कंपनी का कहना है कि उन्हें खराब काम के चलते बाहर निकाला गया. महाराष्ट्र की एक अदालत ने पत्रकार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कंपनी को उन्हें काम पर वापस रखने और बकाया भुगतान करने का आदेश सुनाया. हालांकि ऐसे मामले विरले ही हैं. सबसे बड़ा सवाल है कि कानून को ना मानने वालों पर क्या कार्रवाई होगी?

केंद्रीय श्रम राज्य मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने कहा है कि नए कानून में जो लोग नियमों का उल्लंघन करेंगे उन्हें तीन महीने से लेकर एक साल तक की सजा का प्रावधान है. इसके अलावा नए बिल में जुर्माने का भी प्रावधान शामिल किया गया है. अब इस बिल को लोकसभा से पास कराने की तैयारी है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण चुनौती प्रस्तावित कानून को जमीन पर कारगर तरीके से लागू करने की होगी.

First published: 12 August 2016, 8:54 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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