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घास छीलना इतना भी बुरा नहीं है

रोहित जोशी | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST

बेकाम होने के लिए एक मशहूर मुहावरा है, ‘घास छीलना’. लेकिन ‘घास छीलना’ असल में बेकाम होना नहीं है, ये बात वे महिलाएं गहराई से समझ सकती हैं जिनकी जि़ंदगी में घास की बेहद अहमियत है. और अगर इसके लिए एक लाख रुपए भी मिले तो फिर कोई कैसे कह सकता है कि घास छीलना मतलब बेकाम होना है?

पहाड़ की उन महिलाओं के लिए ‘घास छीलने’ के अर्थ बिल्कुल अलग हैं जो हर रोज दुर्गम जंगलों में घास काटने के लिए ख़तरनाक चट्टानों पर चढ़ जाती हैं. इन्हीं महिलाओं का सम्मान करने के लिए टिहरी में एक अनोखी प्रतियोगिता आयोजित हुई- घास काटने की.

बुधवार को उत्तराखंड में टिहरी के चमियाला कस्बे में इन घास काटने वाली महिलाओं यानि घसियारिनों को सम्मानित करने के लिए एक अनूठी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया.

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इस प्रतियोगिता का मकसद था गांवों की ‘बेस्ट इकोलाॅजिस्ट’ यानि सबसे योग्य पर्यावरणविद को तलाशना. प्रतियोगिता में शामिल प्रतिभागियों को केवल दो मिनट में सबसे अधिक घास काटनी थी. इसके अलावा भी इस प्रतियोगिता में कुछ और शर्तें थी.

घास काटने के दौरान कोई भी गैरजरूरी पौधा न कटे, महिला को घास के अलग-अलग प्रकारों और उनके उपयोग की जानकारी हो, अपने पशुओं के रोग और उनके घरेलू उपचार की भी जानकारी हो, और इस प्रतियोगिता में उसके द्वारा पाले गए जानवरों की संख्या के आधार पर भी अंक निर्धारित किए गए थे.

घाट काटने की प्रतियोगिता के आयोजक चेतना आंदोलन के संयोजक तरेपन सिंह चौहान बताते हैं, ‘इस प्रतियोगिता का मकसद पहाड़ की अर्थव्यवस्था की नींव रहीं घसियारिनों के उस श्रम का सम्मान करना है, जिसकी कोई गिनती नहीं होती. जबकि यही श्रम कई शताब्दियों से पहाड़ की आर्थिकी की नींव रहा है.’

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चौहान कहते हैं, ‘सरकार और एनजीओ, पर्यावरण के असल संरक्षकों की कोई परवाह नहीं करते. उलटा इन महिलाओं से जंगलों पर इनके अधिकारों को छीना जा रहा है, इसलिए पहाड़ के लोगों को खुद अपने श्रम का सम्मान करना होगा.’

तीन चरणों में आयोजित इस प्रतियोगिता में टिहरी जिले के भिलंगना ब्लाॅक की 112 ग्राम पंचायतों की 600 से अधिक महिलाओं ने हिस्सा लिया.

पहले चरण में गांव स्तर पर प्रतियोगिता आयोजित हुई. हर एक गांव से चुनी गई 3 महिलाओं को न्यायपंचायत स्तर पर प्रतियोगिता के दूसरे चरण में जाने का मौका मिला. इस चरण में 26 महिलाओं का चयन किया गया जो प्रतियोगिता के अंतिम चरण में पहुंची.

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प्रतियोगिता के अंतिम चरण में अमरसार बसर गांव की रैजा देवी निर्धारित किए गए अलग-अलग पैमानों के अनुसार 81 अंक पाकर सबसे पहले पायदान पर रहीं. और उन्हें ‘बेस्ट इकाॅलोजिस्ट’ सम्मान से सम्मानित किया गया. दूसरे पायदान पर माल्द गांव की यशोदा देवी रहीं और तीसरा स्थान औना गांव की अब्ली देवी को मिला.

पुरस्कार मिलने के बाद रैजा देवी का कहना था, ‘पुरस्कार केवल मुझे नहीं मिला है बल्कि ये पुरस्कार पहाड़ की हर एक घसियारिन का सम्मान है.’

इस प्रतियोगिता में पहला ईनाम एक लाख रुपया, दूसरा ईनाम 51 हजार रुपया और तीसरा ईनाम 21 हजार रुपया रखा गया था. संगठन से जुड़े शंकर बताते हैं, 'पुरस्कार और आयोजन की राशि का इंतजाम खुद लोगों ने चंदा जुटाकर किया है. बाहर की किसी एजेंसी से कोई पैसा नहीं लिया गया है.’

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शंकर कहते हैं, ‘घसियारिनें ही पहाड़ की पारिस्थितिकी की असली जानकार और संरक्षक हैं. लेकिन जंगलों पर से उनके अधिकारों को लगातार छीना जा रहा है. ऐसे में घसियारिनों को प्रोत्साहन देना बहुत महत्वपूर्ण है.’

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और गढ़वाली के प्रसिद्ध गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी कहते हैं, ‘घसियारियों और पहाड़ की महिलाओं को इस तरह से प्रोत्साहन देने से पहाड़ के पलायन पर भी रोक लगेगी.’

कार्यक्रम में शिरकत करने आई उत्तराखंड महिला मंच की समन्वयक कमला पंत कहती हैं, ‘पहाड़ के ग्रामीण समाज में हर एक महिला घसियारिन है और पहाड़ को बचाने में उसका अहम योगदान है. वो हर रोज जंगल जाती है और उसे वहां की वनस्पति और पारिस्थितिकी की व्यावहारिक और गहरी समझ होती है. लेकिन उसे ही जंगलों से बेदखल किया जा रहा है.'

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वरिष्ठ पत्रकार राजीवलोचन साह का कहना था, ‘ये कार्यक्रम उत्तराखंड राज्य की लड़ाई को उसके वास्तविक उद्देश्य तक पहुंचाने का रचनात्मक ज़रिया है.’ घसियारिनों को सम्मानित करने के इस कार्यक्रम में पूरे टिहरी जिले से सैकड़ों लोग आए हुए थे.

कोठेड़ा गांव के सोहन लाल कहते हैं, ‘पहाड़ की महिलाओं के सम्मान के लिए इससे पहले किसी ने भी ऐसा काम नहीं किया है. ये पहली बार हुआ है और हमें बहुत खुशी है.’

First published: 8 January 2016, 2:15 IST
 
रोहित जोशी @catch_hindi

स्वतंत्र पत्रकार और फिल्ममेकर.

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