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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: कहां खड़ा है भारत?

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 12 October 2016, 7:27 IST
(गेट्टी इमेजेज)

10 अक्टूबर को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाता है. इसका उद्देश्य है मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों के बारे में जागरूकता पैदा करना और ध्येय की पूर्ति के लिए सरकारी व गैर सरकारी कारकों का समर्थन जुटाना.

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, ‘यदि हमने तुरंत कदम नहीं उठाए तो मानसिक अवसाद 2030 तक विश्व स्तर पर सबसे बड़ी बीमारी बन जाएगा.’

भारत में विकार

बंगलोर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हैल्थ एण्ड न्यूरोसाइंसेज (निम्हांस) की ओर से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ मिल कर असम, मणिपुर, केरल, पंजाब, उत्तरप्रदेश, बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात और राजस्थान समेत 12 राज्यों पर आधारित एक सर्वे के अनुसार इन राज्यों की करीब 13 प्रतिशत आबादी मानसिक अवसाद व चिंता जैसी सामान्य बीमारियों से लेकर सीजोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर जैसे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी गम्भीर विकारों से जूझ रही है.

एक ऐसे ही, लेकिन अधिक चिंताजनक तथ्य की ओर लांसेट ने संकेत किया है जिससे पता चलता है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य के 10 में से केवल एक रोगी को ही उपचार मिल पाता है और अगले दस साल में भारत में मानसिक रोग चीन के मुकाबले ज्यादा तेजी से फैलने वाला है.

स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार 10-20 मिलियन भारतीय सीजोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर जैसी गम्भीर मानसिक बीमारियों से ग्रस्त हैं जबकि 50 मिलियन, अर्थात देश की आबादी का करीब 5 प्रतिशत लोग अवसाद और चिंता जैसे सामान्य विकारों से ग्रस्त हैं.

अगला कदम

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल विधेयक, 2013 के साथ भारत अब मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल में मील के एक नए पत्थर से केवल एक कदम दूर हैं. 

सभी सम्बद्ध पक्षों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श और संसद की स्थाई समिति के गठन के बाद अगस्त में यह विधेयक राज्यसभा में पारित कर दिया गया. लोकसभा में इस विधेयक पर अगले सत्र में चर्चा होने की उम्मीद है. यह विधेयक मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 का स्थान लेगा जिसमें काफी फेरबदल की जरूरत है.

विधेयक

इस विधेयक को पारित करने में जल्दी की जरूरत क्यों है? इसे समझने के लिए आइए, इसकी कुछ प्रमुख विशेषताओं पर गौर करें.

अग्रिम निर्देशः

अपनी किस्म के इस पहले कदम के रूप में, विधेयक में रोगी को स्वयं अपना उपचार चुनने का अधिकार दिया गया है. इसके तहत अवयस्क के अलावा कोई भी रोगी इस बारे में अग्रिम निर्देश जारी कर सकता है कि भविष्य में किसी मानसिक रोग के समय वह कैसा उपचार चाहेगा.

प्रतिनिधिः

विधेयक रोगी को यह अधिकार भी देता है कि वह अपने उपचार व सेवा-सुश्रुषा की देखभाल के लिए एक प्रतिनिधि नामित कर सके जिसका परिवार का सदस्य होना जरूरी नहीं है.

निरीक्षण अधिकारी से समीक्षा मंडल तकः

मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 1987 के तहत अभी मोटे तौर पर यह राज्य सरकार द्वारा नियुक्त निरीक्षण अधिकारी की जिम्मेदारी है. यदि वह समझता है कि रोगी को उचित उपचार व देखभाल नहीं मिल रहा है तो वह दखल दे सकता है. नए विधेयक में जिला जज की अध्यक्षता में मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा मंडल के गठन का प्रावधान किया गया है जिसके सदस्यों के रूप में जिला कलेक्टर अथवा मजिस्ट्रेट, दो मानसिक स्वास्थ्य प्रोफेशनल्स जिनमें एक मनोचिकित्सक होना चाहिए तथा मनोचिकित्सा क्षेत्र में काम कर चुके अथवा स्वयं मनोरोगी रह चुके दो व्यक्ति शामिल होंगे.

निशक्तजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन

यूएनसीआरपीडी को ध्यान में रखते हुए विधेयक में तनाव में कमी लाने वाली अथवा चेतनाशून्य करने वाली दवाओं के बिना इलेक्ट्रोकॉन्क्लूजिव थेरेपी अथवा ईसीटी पर, पुरुष अथवा महिला रोगी के वंध्याकरण और उन्हें किसी भी तरह चेन से बांधने पर रोक लगाई गई है.

वर्तमान आंकड़ों को भयावह मानते हुए, विधेयक में अधिक संख्या में मानसिक स्वास्थ्य संस्थाओं की स्थापना की बात कही गई है ताकि हर रोगी को उपचार मिल सके. जब से यह विधेयक पेश हुआ है तब से आंदोलनकारी इसके समर्थन में आवाज उठा रहे हैं. वे इसे मानसिक रोगियों के लिए बहुप्रतीक्षित राहत बता रहे हैं.

बंगलौर आधारित एक्शन फॉर मेंटल इलनेस की सह-संस्थापक डॉ. निर्मला श्रीनिवासन का कहना है कि इस विधेयक के कानून बनते ही मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच काफी बढ़ जाएगी. तब हम (यूएनसीआरपीडी) के साथ खड़े होंगे जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं. आंदोलनकारियों का मानना है कि अग्रिम निर्देश का प्रावधान अपने आप में इलाज जैसा होगा क्योंकि इससे रोगी को नियंत्रण व पसंद की भावना का अहसास मिलेगा.

विधेयक पर आपत्तियां

कई मनोचिकित्सक हालांकि विधेयक में कुछ कमियों की ओर इशारा करते हैं. गत वर्ष मेंटल हैल्थ प्रोफेशनल्स की संस्था और पांच हजार से अधिक सदस्यों वाली इंडियन साइकियाट्रिस्ट सोसायटी (आइपीएस) विधेयक पर कुछ आपत्तियां सामने लेकर आई थी. उनका कहना है कि प्रस्तावित मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा मंडल में केवल एक मनोचिकित्सक होने से मरीज के उपचार में बाधा आ सकती है.

राजकीय मेडीकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल, चंडीगढ़ में साइकियाट्री की प्रोफेसर और आइपीएस की एक सदस्य डॉ. प्रीति अरुण का कहना है कि मंडल सदस्यों के बीच पूर्वाग्रह हो सकता है, सम्भव है कि वे रोगी की स्थिति को न समझ पाएं. प्रतिनिधि की नियुक्ति के प्रावधान को लेकर भी मनोचिकित्सक चिंतित हैं. कई मनोचिकित्सकों का कहना है कि यदि यह प्रतिनिधि परिवार का सदस्य नहीं हुआ तो विवाद पैदा हो सकता है.

एक उपेक्षित मुद्दा

लेकिन मनोचिकित्सकों द्वारा व्यक्त की जी रही चिंताओं के बावजूद यह विधेयक मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल की मोटे तौर पर उपेक्षित समस्या के समाधान की ओर एक बहुत जरूरी कदम है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2013 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत एक शपथ पत्र में कहा था कि, ‘मानसिक स्वास्थ्य अस्पताल गंभीर वित्तीय संकट झेल रहे हैं क्योंकि उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संसाधनों का समुचित आवंटन नहीं हो रहा. ’

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री ने सोमवार को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि, ‘जिला अस्पतालों, सामुदायिक व प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में हमें चिकित्सा अधिकारियों, नर्सिंग कर्मियों, काउन्सलर्स व फार्मासिस्टों को प्रशिक्षण देना होगा. इसके साथ ही रोगियों से सहायता लेने व मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की मांग भी बढ़ जाएगी.’

उनका कहना था कि, ‘आशा व एएनएम जैसी फील्ड कार्यकर्ताओं की मदद से सामुदायिक गतिविधियों को बढ़ाने और लागू करने की जरूरत होगी.’ इन हालात को देखते हुए विधेयक के माध्यम से लोगों को यह समझाने में काफी मदद मिलेगी कि मानसिक स्वास्थ्य एक जरूरी और गंभीर मुद्दा है, यह कोई ऐसी वस्तु नहीं जो अपने आप चली जाएगी. आशा करें कि यह जल्द पारित होगा.

First published: 12 October 2016, 7:27 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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