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अच्छी शरणार्थी नीति को सामाजिक न्याय की आवश्यकताः रणबीर समद्दर

श्रिया मोहन | Updated on: 22 June 2016, 7:03 IST

विश्व शरणार्थी दिवस (20 जून) पर कैच ने प्रोफेसर रणबीर समद्दर से बात की. प्रोफेसर महानिर्बाण कोलकाता शोध समूह के निदेशक हैं. वो विभिन्न देशों से भारत में आकर बसे विस्थापितों के बारे में लिखी किताब 'मार्जिनल माइग्रेंट्स' के लेखक भी हैं.

प्रोफेसर समद्दर के अनुसार विस्थापन के विषय पर सामूहिक रूप से ध्यान दिए जाने की जरूरत है. उनके अनुसार भारत में बड़े पैमाने पर आंतरिक विस्थापन हो रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि कैसे हम मौसमी शरणार्थियों को सुरक्षा प्रदान कर उनके प्रति जिम्मेदारी निभा सकते हैं. 

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प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के कुछ अंशः

विदेशी शरणार्थियों को स्वीकार करने के मामले में भारत को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है?

मैं नहीं मानता कि 2016 में भारत की शरणार्थी नीति में कोई बदलाव आया होगा. यह वैसी ही है जैसी बरसों से चली आ रही है. जो कि मूलतः अनौपचारिक है लेकिन इसके पूर्ण रूप में. कहने का मतलब है भारत की विदेश नीति के हित में ही सब कुछ हो रहा है.

उदाहरण के लिए तिब्बती शरणर्थियों को ही लीजिए तीन पीढ़ियों के बाद ये अब यहीं के होकर रह गए है. लोगों का कहना है कि तिब्बती शरणार्थी सबसे ज्यादा सुविधाएं भोगने वाले चहेते शरणार्थी हैं. हालांकि मैं इससे सहमत नहीं हूं.

भारत सरकार उनके प्रति दयालु और उदार रही है. हमें याद रखना होगा कि तिब्बती शरणार्थियों का भारत की विदेश नीति के संदर्भ में फायदा भी मिला है. काश भारत इसी तरह श्रीलंकाई, ईरानी या बांग्लादेशी शरणार्थियों के प्रति भी दयालु होता. बड़ा सवाल यह है कि केवल शिविरों में जिंदगी जीने का ही अधिकार न मिलेगा बल्कि शरणार्थियों को अन्य अधिकार जैसे घूमने का, शिक्षा का और रोजगार का अधिकार आदि भी मिले. 

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भारत की कोई राष्ट्रीय शरणार्थी नीति नहीं है. भारत ने 1961 संधि या 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किया है. परन्तु अच्छा होता अगर भारत ने मानाधिकारों पर जोर देते हुए शरणार्थियों के प्रति न्याय की पैरवी करते हुए इनमें से किसी एक पर हस्ताक्ष कर दिए होते.

आज विस्थापन बहुत बड़ी संख्या में मिला-जुला है. आप यह नहीं कह सकते कि ये कारण विशुद्ध रूप से राजनीतिक आर्थिक या मानव तस्करी से जुड़े हुए हैं. 

भारत बड़े स्तर पर सुरक्षा केंद्रित होता जा रहा है. इससे इसके आतिथ्य भाव पर प्रभाव पड़ा है. हमें विस्थापितों के प्रति अधिक उदार रवैया अपनाना चाहिए. 

आपकी किताब मार्जिनल नेशंस में आपने राष्ट्रीय सीमाओं से परे खुले दरवाजे की नीति अपनाने का तर्क दिया है और शरणार्थी अधिकारों की रक्षा हेतु एक दक्षिण एशियाई प्रोटोकॉल की वकालत की है. यह समाधान कितना कारगर है, क्या भारत अपने संसाधनों को दूसरों के साथ बांट सकता है, जब इसके पास अपने खुद के गरीब तबके के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.

मैंने अपनी किताब में कहा है कि लोग किसी भी हालत में विस्थापन कर ही रहे हैं. हमें केवल बड़े से हिमखंड की चोटी दिखाई दे रही है. यानी जो आंकड़े हमारे सामने हैं. वे केवल वही हैं, जो आधिकारिक तौर पर बताए गए हैं. चूंकि लोग आते-जाते तो हैं ही. इसलिए हमें ऐसे उपाय करने चाहिए जैसे लचीली सीमा नीति जहां उन्हें यात्रा की अनुमति और मूल अधिकार मिलें. 

अगर आप रोजगार अवसरों की बात करते हैं तो मैं आपको बताता हूं बांग्लादेशी शरणार्थी दिल्ली में हमारे घरों में काम करते हैं. चेन्नई और त्रिवेन्द्रम में बंगाली शरणार्थी मजदूरी का काम कर रहे हैं. आपको क्या लगता है कि वे किसी आधिकारिक अनुमति का इंतजार कर रहे हैं.

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सीमा को केवल एक चिन्हित रेखा के रूप में ही न देखें. वैश्वीकरण के फलस्वरूप गतिशीलता और संचार के आधुनिक दौर में यह केवल सीमा नहीं है. बल्कि सीमा क्षेत्र है, जिससे बड़ा सा श्रमिक बाजार खड़ा हो सकता है, परन्तु हमने सुरक्षा चौकसी पर भी निगरानी करनी शुरू कर दी है.

लेकिन यह चिंता वाजिब है. आप आतंकवाद के बढ़ते खतरे को कैसे नजरंदाज कर सकते हैं?

आपने देखा ऑरलैंडों में क्या हुआ. राष्ट्रपति को सफाई देनी पड़ी कि आतंकवादी घर के ही थे. दूसरे शब्दों में आतंकवाद की समस्या को हल करने के लिए हमें पहले इसकी जड़ तक जाना होगा. क्या हम अभावों, बेरोजगारी, निर्वासन, भेदभाव और अन्याय की समस्या से निजात पा सके हैं, जिनकी वजह से यह आतंकी भावनाएं उपजती हैं.

भारत में बड़े पैमाने पर भीतरी विस्थापन की समस्या बढ़ रही है. भले ही ये जलवायु के कारण हो या सूखे के कारण, कौन जिम्मेदार है? दिल्ली को आए दिन बढ़ते शरणार्थियों के प्रति कैसा रवैया अपनाना चाहिए?

आज की तारीख में यह ज्वलन्त प्रश्न है. भीतरी विस्थापन के तीन मुख्य रूप हैं.

पहला संघर्ष की वजह से होता विस्थापन जैसा कि संयुक्त राष्ट्र मानता है. भारत सरकार ने संप्रग-1 के कार्यकाल के दौरान एक अधिनियम बनाया था जिसके अनुसार आपदा कोष बनाया गया और विस्थापितों को भी इसके दायरे में माना गया ताकि जो कुछ भी हुआ उसका वित्तीय प्रभाव आंका जा सके.

हमने प्रतिरोध किया, यह अमानवीय नीति थी. विस्थापन को इस तरह पोषित करना और नुकसान व पीड़ितों के बारे में अनुमान लगाना जैसा कि बीमा कंपनियां करती हैं, गलत था. अंततः आप यही कहेंगे आपके पास पर्याप्त पैसा नहीं है, इसलिए आप पुनर्वास नहीं कर सकते. आजकल दंगे रोज का काम हो गए हैं. उनसे होने वाले नुकसान की कोई कीमत नहीं है. इसलिए हमारी अंदरूनी विस्थापन नीति अपर्याप्त है.

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दूसरा है विकास की वजह से हो रहा विस्थापन. जंगलों का खात्मा नदियों को बांधना, खनन और खनिज तत्वों के लिए खुदाई. भारत इन दिनों विकास के चरम दौर में है. अफसोस कि इसके बूते हम चीन नहीं बन सकते. चीन की कहानी अलग है. वहां छोटे-छोटे कस्बों में बड़े उद्योग चल रहे हैं. यहां छोटी कम्पनियों और रोजगार में बढ़ोतरी देखी गई है.

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भारत में लघु उद्योग तो खत्म ही हो चुके हैं. पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय से सार्वजनिक निर्माण हो या इस्पात दोनों में ही स्पष्ट मुआवजा नीति अपनाई गई लेकिन अब ऐसा नहीं है.

तीसरा रूप सबसे महत्वपूर्ण है. मैं इसे पारिस्थितिकीय या पर्यावरणीय शरणार्थी कहता हूं.

माइक डेविस ने 1880 में ब्राजील, भारत, मिस्र और चीन में अल नीनो के कारण पड़े भयंकर अकाल पर एक किताब लिखी है. उन्होंने लिखा है कि जिन किसानों की बाजार तक अच्छी पहुंच थी वे जलवायु परिवर्तन के सामने भी टिके रहे बाकी अपना सब कुछ गंवा बैठे और मर गए.

असम या उत्तरी बिहार में साल दर साल बाढ से उपजे हालात पर गौर कीजिए इसके ठीक विपरीत महाराष्ट्र और बुंदेलखंड में सूखे की समस्या है. हमारे पास कहां ऐसा कानूनी और प्रशासनिक ढांचा है. जो लोगों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचा सके.

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महाराष्ट्र में भी कहां दायित्व का पालन होता दिखाई दे रहा है, जहां गरीब और हाशिये पर रह गए किसानों के लिए कम से कम आवश्यक पानी प्रभावशाली लोगों से बचा कर रखा जाए. पहले यह महाराष्ट्र सरकार फिर केंद्र सरकार और फिर अन्य राज्यों की सरकारों का दायित्व बनता है जहां ये किसान शरण लेते हैं.

आज की तारीख में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारेें बहुत खुश हो जाएंगी अगर यहां के लोग दिल्ली चले जाएं. शरणार्थी साहित्य में इसे कुछ ऐसा कहा जाता है. चूहे को निकल जाने दो यानी लोगों को जगह छोड़ कर जाने देना.

क्या आप राज्यों के बीच भी ऐसी खुले दरवाजे वाली नीति का सुझाव देंगे?

एक ओर कोई भी श्रमिकों के पलायन को नहीं रोक सकता. दिल्ली में सूखा प्रभावित क्षेत्र से आकर बसे शरणार्थियों की पहली पीढ़ी के लोग निराश्रित ही मर जाएंगे और उनकी भावी पीढ़ियां भीख मांगने और बाल श्रम को मजबूर होंगी.     

अब तक दिल्ली  को ही विस्थापितों का पेट पालना पड़ रहा है. मुझे लगता है अब दिल्ली सरकार को केंद्र सरकार से इनके लिए यह कहते हुए राहत कोष की मांग करनी चाहिए कि ये हमारे मेहमान हैं और हम इन्हें वापस नहीं भेज सकते. अगर आप गरीब घर से भी हैं और कोई मेहमान आपके यहां आता है तो आप उसके लिए जो भी थोड़ा बहुत कर सकते हैं करेंगे. ज्यादातर सामाजिक आतिथ्य किसी तरह सामुदायिक आधार पर ही निभाया जाता है.  

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सूखा प्रभावित विस्थापितों की जिम्मेदारी तीन प्रकार से बांटी जा सकती है. महाराष्ट्र और बुंदेलखंड की सरकारेें इन विस्थापितों के लिए जरूरी मद का चालीस फीसदी दिल्ली को दें. चालीस फीसदी ही केंद्र सरकार दे, क्योंकि वह शुरूआती स्तर पर गड़बड़ियों को नहीं रोक पाई. और अंतिम 20 फीसदी लागत मेजबान राज्य भुगत सकता है. 

इन नीतियों में बहुत अधिक लिखा-पढ़ी की जरूरत नहीं है. विस्थापितों की समस्या से निपटने के लिए हमें सिर्फ सामाजिक न्याय की समझ और उनके प्रति सहानुभूति रखने की आवश्यकता है.

घुमंतु श्रमिक एक बड़ी सेना की भांति हैं. बिल्कुल उसी तरह जैसे कि 19 वीं सदी में थे. जहां तक पीड़ित मानवता का सवाल है. हम फिर से 19 वीं सदी के औपनिवेशिक भारत की ओर लौट रहे हैं.

First published: 22 June 2016, 7:03 IST
 
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