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''फासीवाद की पहचान है कि वह सबसे पहले राजनीति को खारिज करता है''

उदय प्रकाश | Updated on: 3 December 2015, 7:28 IST
QUICK PILL
  • साहित्‍यकारों एवं कलाकारों पर देश भर में हो रही हिंसक वारदातों और असहिष्‍णुता के माहौल और पुरस्‍कार वापसी के मुद्दे पर दक्षिणपंथी और वामपंथी विचारकों एंव संस्कृतकर्मियों के बीच संवाद हेतु श्री अचलेश्‍वर महादेव मंदिर फाउंडेशन की ओर से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का शीर्षक था ‘अब क्‍या?\' इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रकाश द्वारा दिया गया वक्तव्य.

मैं राजनीतिक नहीं हूं और किसी भी तरह की राजनीति से मेरा वास्‍ता लम्‍बे अरसे से नहीं है. राजनीति किसी भी देश की हो उसमें हमेशा कुछ कारक, कुछ तत्‍व, कुछ घटक, कुछ कम्‍पोनेंटस, कुछ इनग्रीडिएंट्स हमेशा सक्रिय होते हैं. कोई भी राजनीति दैवीय नहीं होती है. कई नस्‍लें होती, कुछ नस्‍लें ऐसी होती हैं जो डोमिनेंट होती हैं कुछ नस्‍लें ऐसी होती हैं जो पराभूत हो रही होती हैं. कहीं वर्ण व्‍यवस्‍था होती है, कहीं समुदाय होते हैं, उनके परस्‍पर संबंध होते हैं और उनकी अंतरक्रिया से एक राजनीति बनती है.

आप सबने फ्रांसिस फुकुयामा की किताब 'ऑर पोस्‍ट ह्यूमन फ्यूचर' पढ़ी होगी. आधुनिकता आई कहां से? उसी फ्रांस से आई जहां कल इतना बड़ा हादसा हुआ है. जहां इसी आतंकवाद ने वो तबाही की है कि आज हम सब रो रहे हैं. उसी फ्रांस में 1780 करीब एक क्रांति हुई और वहीं से जन्‍म हुआ था आधुनिक डेमोक्रेसी का, लोकतंत्र का.

लोकतंत्र के तीन बुनियादी नारे उसी समय दिए गए थे, अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता उनमें से एक थी जो सिविल लिबर्टीज में आती थी. नारे थे फ्रेटरनिट, इक्‍वैलिट और लिबर्टी. ये तीन नारे थे डेमोक्रेसी के और अगर कोई भी राजनीति इन तीन में से किसी भी घटक को कमजोर करती है या रिफ्यूज़ करती है तो वो लोकतांत्रिक राजनीति नहीं है, वो बर्बरता है तानाशाह है, वही साम्‍प्रदायिकता है, वही है फासिज्म.

फासीवाद की पहली पहचान है कि वह सबसे पहले राजनीति को रिजेक्‍ट करता है. फासीवाद लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्‍मन है. कोई नस्‍ल, कोई एक जाति, कोई एक मत, अपने प्‍यूरिटिज्म को, अपनी नस्ली शुद्धता को, अपनी सुप्रीमेसी को, अपने अहंकार को सबके ऊपर थोपता है. जो उसको नहीं मानता उसको मारता है, उसकी आवाज दबाता है. यही है फासीवाद है.

फासीवाद को समर्थन किनसे मिलता है? उन ताकतों से जो ये जानती हैं कि इसके आने से हमें लाभ होगा. मैं शायद थोड़ा सा गुस्‍से में हुं. जब मैंने अपना साहित्य अकादमी पुरस्‍कार लौटाया था तब एमएम कलबुर्गी की हत्‍या हुई थी, 30 अगस्‍त को. उस समय मैं अपने गांव में था. मेरा गांव मध्‍यप्रदेश और छत्‍तीसगढ़ की सीमा पर है.

फासीवाद की पहली पहचान है कि वह सबसे पहले राजनीति को रिजेक्‍ट करता है. फासीवाद लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्‍मन है

मुझ पर वामपंथियों ने ही आरोप लगाया कि मैं योगी आदीत्‍यनाथ का करीबी हूं. कम्‍युनिस्‍टों ने कहा कि मैं संघी हूं क्‍योंकि मैंने अंत में प्रार्थना लिखी, क्‍योंकि मैंने वारेन हेस्टिंग्‍स का सांड लिखा. मुझको कम्‍युनिस्‍ट कहते है कि मैं संघी हूं और संघी कहते हैं कि मैं कम्‍युनिस्‍ट हूं. कांग्रेसी कहतें हैं मैं भाजपाई हूं, भाजपाई कहतें हैं मैं कांग्रेसी हूं. मैं कुछ नहीं हूं, मैं लेखक हूं और लेखक वही आखिरी आदमी होता है जिसकी बात गांधी ने की थी.

आज सुबह मैं पढ़ रहा था अमर उजाला. आप अनीश कपूर को जानतें होंगे, शायद भारत और बम्‍बई में पैदा होने वाला अकेला ऐसा शिल्‍पकार है जिसकी अंतरराष्ट्रीय जगत में बहुत बड़ी ख्‍याति है. उसने स्‍टेनलेस स्‍टील से कितनी बड़ी कलाकृतियां पैदा की है ये आप जा कर देखिए शिकागो में. उसकी स्टील से बनी कृति है बीन यानि बादल का बीज, आपको लगेगा कि जैसे बादल का कोई बीज धरती पर उतर आया है, वो हमारे देश का है. हमें गर्व होता है कि हमारे इसी देश ने ऐसे कलाकार पैदा किए.

उसने क्‍या किया कि जब ये सारी घटनाएं देखीं कि दाभोलकर मारे गए, कलबुर्गी मारे गए, हम सबको धमकियां दी गई, गालियां दी गई, एक दलित लेखक ने जातिवाद के खिलाफ लिखा तो उसकी उंगलियां काटने की धमकी दी गई. लगातार ये सब हो रहा था तब अनीश कपूर ने इस पर नाराजगी जताई. तो उन्‍हीं अनीश कपूर के बारे में आज उठा कर पढ़िए अमर उजाला, किसी संगठन ने पता नहीं क्‍या नाम है उसका, कोई हिंदुत्‍ववादी संगठन है उसने 21 लाख रूपये का इनाम घोषित किया है अनीश कपूर की जीभ काटने के लिए. लिखा है कि वो ब्रिटिश लेखक हैं. अनीश लेखक है ही नहीं. वो शिल्‍पकार है, मूर्तिकार है. ये लोग वो लोग हैं जो मूर्तिकार, शिल्‍पकार, पेंटर, एक्‍टर, डारेक्‍टर किसी का फर्क नहीं जानते. इनका एक ही चश्मा है, मोदी समर्थक या मोदी विरोधी है, हिंदुत्‍व का समर्थक या हिंदुत्‍व का विरोधी. ऐसे लोगों का राष्‍ट्र क्‍या है?

ये लोग वो लोग हैं जो मूर्तिकार, शिल्‍पकार, पेंटर, एक्‍टर, डारेक्‍टर किसी का फर्क नहीं जानते. इनका एक ही चश्मा है, मोदी समर्थक या मोदी विरोधी

अभी यहां बहस में भी आप देख रहे हैं कि शरीर जब बहुत सक्रिय होता है तो विचार समाप्‍त हो जाते हैं. हां बुद्धि दगा दे जाती है, आपका जिस्‍म आक्रामक हो उठता है. यही हो रहा है. मैं साफ शब्दों में पूछना चाहता हूं इनका राष्‍ट्र है क्‍या?

विवाह का जो निमंत्रण पत्र होता है उस पर लिखा संस्‍कृत का श्‍लोक पढ़ कर ये लोग कहते हैं हम संस्‍कृत जानते हैं. इनको हिंदी का एक वाक्‍य लिखना नहीं आता है ये दावा करते हैं कि हिंदी इनकी राष्‍ट्र भाषा है. ये धर्म के बारे में नहीं जानते हैं और दावा करते हैं कि हिंदुत्‍व हमारा है. आप हैं कौन हर चीज पर दावा करने वाले. आप लोग पूरे देश पर दावा ठोक रहे हैं, इसकी भाषा, इसकी पूरी परंपरा और विरासत पर कब्जा कर लेना चाहते हैं. यह पतन का, बौद्धिक दिवालिएपन का, धूर्तो और पाखंडियों का दौर है.

मेरे मन में बार-बार नरेंद्र मोदीजी से पूछने के लिए एक सवाल उठ रहा है, प्रधानमंत्रीजी जब आप ब्रिटेन में महात्‍मा गांधी की मूर्ति का पैर छू रहे थे, जब आपने कहा था कि यह बुद्ध और महात्‍मा गांधी का देश है तब क्‍या आप सच बोल रहे थे? जब वह पैर छू रहे थे तब क्‍या उनको गोडसे की याद नहीं आयी थी कि जिसका मैं पैर छू रहा हूं, उसकी इसी राष्‍ट्रवाद का नाम लेकर एक सनकी, जातिवादी, आतंकवादी ने हत्या कर दी थी. उस व्‍यक्ति की हत्या जो राष्‍ट्रपिता है. जो लोग राष्‍ट्रपिता की हत्‍या कर रहे हैं वही दावा कर रहे हैं कि हम राष्‍ट्रवादी हैं. इतना बड़ा विरोधाभास.

(श्रोताओं का एक समूह उदय प्रकाश को बोलने से रोक देता है)

मैं तो भूल ही गया कि मैं क्‍या बोल रहा था. ये तो आप लोग मानेंगें ही कि भय का वातावरण है और ये डर उन लोगों के द्वारा पैदा किया जा रहा है जो लोग नहीं जानते कि साहित्‍य क्‍या है. देखिए साहित्‍य में व्‍यंजनाएं होती हैं और गालियां भी होती हैं. मैंने कल लिखा कि जो समय होता है वो अपने भीतर विचित्र विरोधाभास को हमेशा संजोए रखता है.

एक फुटबाल स्‍टेडियम था विम्‍बले, जहां पर हमारे प्रधानमंत्री, का संभाषण हो रहा था, डेविड कैमरून खड़े थे. हालांकि नब्‍बे हज़ार की क्षमता वाले स्‍टेडियम में पचपन हजार लोग आए थे. सब भरापुरा था, खूब तालियां पिट रहीं थी और एक दूसरा फुटबाल स्‍टेडियम था फ्रांस में नेशनल फुटबाल स्‍टेडियम. दो फुटबाल स्‍टेडियम थे एक में यह आयोजन हो रहा था दूसरे में गोलियां चल रही थीं, आतंकवादियों का हमला हो रहा था. एक क्‍वींस पैलेस था, महारानी एलिज़ाबेथ का राजमहल जहां भोज था और दूसरी तरफ पेरिस के छोटे-मोटे होटलों में लोग परिवार के साथ खाना खा रहे थे. वे मारे गए. एक गाना यहां चल रहा था मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती, बचना ऐ हसीनो लो मैं आ गया, दूसरी तरफ एक बहुत बड़ा कंसर्ट चल रहा था संगीत का जिसमें 129 लोग मारे डाले गए संगीत सुनते हुए.

संगीत और गणित ये कला और विज्ञान के दो सबसे विकसित रूप हैकिसी भी कला का यह लक्ष्‍य होता है वो संगीत बन जाए. कविता का यह लक्ष्‍य होता है वो संगीत बन जाए

संगीत और गणित ये कला और विज्ञान के दो सबसे विकसित रूप हैं. आप लोग तो अभी शब्‍दों पर बहस कर रहे हैं क्योंकि राजनीति शब्‍दों पर केंन्द्रित होती है. किसी भी कला का यह लक्ष्‍य होता है वो संगीत बन जाए. कविता का यह लक्ष्‍य होता है वो संगीत बन जाए, कहानी का यह लक्ष्‍य होता है कि अंत में वो उस बिंदु पर पहुंच जाए जहां सब कुछ संगीतमय हो जाए और समाज का भी यह लक्ष्‍य होता है कि उसमें भी संगीत की तरह समरसता आ जाए.

तो जो संगीत सुन रहा होगा उसकी हत्‍या करना मतलब नाद में डूबे हुए व्‍यक्ति की हत्‍या करना है. प ध्रुपद जब शुरू करते है तो कहां से शुरू करते है, ओम से शुरू करते हैं. नाद ब्रह्म है. आप उनकी हत्‍या कर रहे हैं तो आप ब्रह्म की हत्‍या कर रहे हैं. आप एक कलाकार की हत्‍या कर रहे हैं तो आप ब्रह्म की हत्‍या कर रहे हैं. जिस दिन आप यह जान जाएंगें उस दिन आप किसी भी राजनीति के हिस्‍सेदार नहीं रह जाएंगे. न आपको मोदी नज़र आएंगें न आपको मुलायम सिंह नजर आएंगें, ना आपको अमित शाह नजर आएंगें.

कोई भी सच्‍चा कलाकार या सच्‍चा लेखक, आप लोग यकीन मानिए, इन छोटे मोटे क्षणभंगुर प्राणियों को लेकर ना कभी सोचता है ना कभी लिखता है. उसकी चिंता समूचे समाज की होती है, पर्यावरण की होती है. जो लेखक या कलाकार होता है उसे क्‍यों प्रोफेट कहा था रोल बार्थ ने, अगर आप उसको किसी पॉलिटिकल पार्टी का एजेंट मानेंगें, बहुत से लेखक हैं जो अपनी जाति के, अपनी राजनीति के, अपने धर्म के एजेंट हैं. किसी पोलिटिकल पार्टी के कडर हैं.

आप एक कलाकार की हत्‍या कर रहे हैं तो आप ब्रह्म की हत्‍या कर रहे हैं. जिस दिन आप यह जान जाएंगें उस दिन आप किसी भी राजनीति के हिस्‍सेदार नहीं रह जाएंगे

लेकिन यकीन मानिए हर लेखक ऐसा नहीं है और इसलिए हर बार ही लेखक दंडित होता है. कलाकार ही मारा जाता है. यही बात है कि आपको लेखक की बात तो नागवार गुजरती है लेकिन जब पोलिटिकल नेता एक दूसरे को पिशाच, तांत्रि, भूत, ठग, चोर कहते हैं तो आप सब लोग खुश होते हैं, ताली पीटते हैं. लेखक को आप लोग कमजोर पाते हैं इसलिए मारने खड़े हो जाते है. लेखक तो वध्य है. वो तो भुनगा है आपके समाज का, जैसे कोई तितली जिंदा रहती है. आप तितली को मार कर वीर बनेंगें क्‍या? आप किसी मच्‍छर को मार कर ताकतवर बनेगें क्‍या?

मैं आपसे मांगता हूं कि आप उसका सम्मान करिए जो आपके देश का सबसे बध्यतम, सत्‍ताहीन, सबसे अकेला है. वह जो लेखक है, कलाकार है. उसकी रक्षा कीजिए, सकी हत्या मत कीजिए. जिस दिन आप सकी आवाज बंद कर देंगें आपको खुद अपने अत्‍याचारों का पता नहीं चलेगा. यह आत्‍मविवेचन यह आत्‍मवलोकन आपके विवेक में होना चाहिए. मैं तो तुलसी की माला पहन कर आता हूं, मैं धार्मिक नहीं हूं, लेकिन मैं साम्‍प्रदायिक भी नहीं हूं.

आपने सोचा है कि जिस धर्म के भीतर आप वर्णव्‍यवस्‍था को लगातार मजबूत बनाए हुए हैं वह मुश्किल से पांच प्रतिशत लोगों के शासन पर टिकी हुई है. पूरी सांस्‍कतिचेतना पर उका अधिकार है. आप कब तक इतने सारे लोगों को गुलाम बना कर रखेंगें? यकीन मानिए भारत एक महासमुद्र है मानवता का. असंख्‍य नस्‍लें यहां आई हैं असंख्‍य जातियां यहां आई हैं, असंख्‍य मत यहां आए हैं, असंख्‍य खानपान और रिति-रिवाज यहां आए हैं.

भारत एक महासमुद्र है मानवता का. असंख्‍य नस्‍लें यहां आई हैं असंख्‍य जातियां यहां आई हैं, असंख्‍य मत यहां आए हैं, असंख्‍य खानपान और रिति-रिवाज यहां आए हैं

मजबूरी में कहना पड़ रहा है सभी को कि यह बुद्ध और गांधी का देश है. मैं पूछता हूं कि बुद्ध को बाहर क्यों जाना पड़ा यहां से? किसने निकाल बाहर किया था बुद्ध को? आम्‍बेडकर ने तो कहा था कि वही एक रास्‍ता है, वही एक मार्ग है. पर आप इतने भी सहिष्णु नहीं थे.

मैं आयोजकों से निवेदन करता हूं कि भविष्‍य में किसी लेखक को इस तरह के पॉलिटिकल डिबेट और कॉक फाटिंग में मत बैठाइ. क्‍योंकि ये कमर्शियल टीवी चैनल का कोई डिबेट नहीं है जहां टीआरपी के लिए सारी चीज़े होती हैं. वो बैठा लेते है चार पांच, एक तरफ आरएसएस को बैठा देंगें, एक तरफ कांग्रेस को एक तरफ भाजपा को, एक तरफ कम्‍यनिस्‍ट पार्टी को और एक तरफ लेखक को बैठा लेंगे और फिर वो लोग लड़ेंगें आपस में और सब बैठ कर तमाशा देखेंगे, इस तरह सिद्ध होगा कि जो एंकर है वो सबसे बड़ जानकार है.

आप पढ़िए कम से कम. ना पढ़ना हो तो कम से कम आप राजनीति में जाइए. लेखको के बारे में न बोलिए कुछ, छूइए उनको. अब कलबुर्गी क्‍यों मारा गया? कलबुर्गी ने कुछ नहीं लिखा था. वोकालिंगा में एक ऐसा रूढ़िवादी मतवाद है जिसका वो विरोध कर रहे थे. उन्‍होंने यूआर अनंतमूर्ति के बचपन का एक संस्‍मरण अपने लेख में कोट कर दिया था. किसी ने बिना यह सोचे कि यह कहां से आया, सीधे कलबुर्गी के नाम पर लगा दिया और मीडिया तो आप जानते हैं ही....इस तरह कालबुर्गी की हत्या हुई. आप लोग लेखको पर क्‍यों संदेह करते हैं. अगर आप शत्रु को तलाशने निकलेंगे अनेक मिल जाएंगे.

मैं एक दोहे से अंत करना चाहूंगा जो तुलसीदास का नहीं है लेकिन कहा जाता है तुलसीदास का है. हमारे गांवों में ये खूब कहा-सुना जाता है-

''जितने तारे गगन में, उतने शत्रु होयें, कृपा रहे रघुनाथ की तो बाल ना बांका होए.''

तो आप लोग करते रहिए जितना कुछ करना हो कोई बाल भी बांका नहीं कर पाएगा.
First published: 3 December 2015, 7:28 IST
 
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