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शी जिनपिंग ने क्यों चुना महाबलीपुरम को मीटिंग प्वाइंट, चीन से 1700 साल पुराना है रिश्ता

कैच ब्यूरो | Updated on: 12 October 2019, 9:24 IST

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपने दो दिवसीय भारतीय दौरे पर पहुंच चुके हैं. उनका चेन्नई एयरपोर्ट पर भव्य स्वागत किया गया. बता दें कि इस बार भारत-चीन के बीच अनौपचारिक समिति तमिलनाडु के महाबलीपुरम अथवा माम्मलापुरम में हो रही है. यहां देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करेंगे.

चीनी राष्ट्रपति का ये दौरा 48 घंटे के लिए होगा. इस दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम मसलों पर बात होगी. चीनी राष्ट्रपति पीएम मोदी के साथ आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक मुद्दे पर अहम द्विपक्षीय वार्ता करेंगे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि चीन ने दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय वार्ता के लिए जगह की तौर पर तमिलनाडू के महाबलीपुरम का चयन क्यों किया है?

महाबलीपुरम समुद्र किनारे बसा एक शहर है. इस शहर में काफी प्राचीन मंदिर हैं. इन मंदिरों का चीन से बहुत ही गहरा और पुराना नाता है. इसी कारण महाबलीपुरम को इस समिट के लिए चुना गया है. महाबलीपुरम के शासकों ने कभी चीन के साथ तिब्बत की सीमा की सुरक्षा के लिए समझौता किया था. 

महाबलीपुरम, चेन्नई से तकरीबन 60 किलोमीटर दूर स्थित है. इसकी स्थापना धार्मिक उद्देश्यों से सातवीं सदी में पल्लव वंश के राजा नरसिंह देव बर्मन ने किया था. बता दें कि नरसिंह देव को 'मामल्ल' भी कहा जाता था इस कारण महाबलीपुरम को 'मामल्लपुरम' के नाम से जाना जाता है. इसका एक अन्य प्राचीन नाम 'बाणपुर' भी है.

पल्लव वंश के तीसरे शासक राजा बोधिधर्म ने चीन के शासकों के साथ एक समझौता किया था. स मझौते के तहत उन्होंने चीन की सीमाओं की सुरक्षा का आश्वासन दिया था. यह करीब 1700 साल पुरानी बात है. सातवीं शताब्दी तक चीन के शासकों और पल्लव वंश के बीच गाढ़ी मित्रता कायम रही.

कालातंर में बोधिधर्म ने बौद्ध धर्म अपना लिया. इसके बाद वह चीन की यात्रा पर गए. चीन की यात्रा के दौरान उन्होंने वहां सामाजिक कार्य किए, इस कारण आज भी उन्हें चीन में काफी सम्मानित स्थान हासिल है. यह भी कहा जाता है कि चीन की किंगफू और शाओलिन परंपरा का नाता भी महाबलीपुरम से है. चीन की मौजूदा कम्यूनिस्ट सरकार के पहली प्रधानमंत्री झाऊ एन लाई भी महाबलीपुरम दौरे पर आए थे.

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First published: 11 October 2019, 15:10 IST
 
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