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यादव परिवार की महाभारत में मायावती को फायदा, भाजपा खाली हाथ

आकाश बिष्ट | Updated on: 18 September 2016, 7:43 IST

उत्तर प्रदेश में मुलायम-अखिलेश यादव परिवार के बीच मचे घमासान से लगता है मायावती को मुंहमांगी मुराद मिल गई है, जो पांचवीं बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनना चाहती हैं. आगामी विधानसभा चुनाव में दलित-मुस्लिम गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रही मायावती को उम्मीद है कि उन्हें कम से कम 20 प्रतिशत मुस्लिम वोट जरूर मिलेंगे.

समाजवादी पार्टी में विवाद के चलते मायावती को मौका मिल गया है कि वह मुसलमानों के बीच अपनी स्थिति मजबूत दिखा सकें और अपनी पार्टी को भाजपा के सर्वश्रेष्ठ विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करें.

मायावती जानती हैं कि यह वोट बैंक कितना महत्वपूर्ण है, 2012 के चुनावों में उन्हें यह अनुभव हो चुका है. गत विधानसभा चुनावों के परिणाम घोषित होने के बाद उन्होंने स्वीकार किया था कि 70 प्रतिशत मुस्लिम वोट सपा को मिलने की वजह से उन्हें नुकसान हुआ है.

माया को भरोसा है कि उन्हें 21 प्रतिशत दलित वोट हर हाल में मिलेंगे. साथ ही वे अल्पसंख्यक समुदाय से भी इतने ही प्रतिशत वोटों की उम्मीद कर रही हैं ताकि 2017 के चुनावों में एक अकाट्य फार्मूला तैयार हो सके और उनकी किस्मत बदल सकें. गौरतलब है कि 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में बसपा व सपा दोनों को मात्र 30 फीसदी वोटों से बहुमत हासिल हुआ था.

समाजवादी पार्टी के भीतर जारी उठापटक मुसलमानों के लिए चिंता का विषय है, जो पारंपरिक तौर पर उसके समर्थक रहे हैं, जैसा कि 2012 में देखा गया. बाद में प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती घटनाओं से मुसलमानों का पार्टी से मोह भंग हो गया और इसका फायदा मायावती को मिलने की संभावना है.

मायावती की कोशिशें

वे जमीनी हकीकत से भली-भांति वाकिफ है. इसलिए वे मस्लिमों को लुभाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही. मायावती ने इस बार 100 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है जबकि 2007 और 2012 के चुनावों में माया ने क्रमशः 61 और 83 सीटों पर चुनाव लड़ा था. उनकी रैली के स्थल भी इस बात के गवाह हैं कि वे दलितों के साथ ही मुस्लिमों के बीच भी अपनी पैठ बना रही हैं. सहारनपुर में हुई उनकी विशाल रैली से कोई निष्कर्ष निकाला जाय तो मायावती अपने लक्ष्य में सफल होती दिख रही हैं.

और तो और बसपा मुसलमानों में भी वंचित वर्गों दलित और अन्य पिछड़े मुसलमानों के बीच शांति से पैठ बनाने में लगी है. इलाहबाद के राजनीतिक विश्लेषक बद्री नारायण ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा ‘पार्टी अंसारी, गड्डी, तत्व, फकीर और हलालखोर आदि मुस्लिम समाज के निचले तबके के बीच अधिक सक्रिय हो कर काम कर रही है.'

इस बार पार्टी मुसलमानों के बीच जाति और वर्ग के भेद को भुनाने की कोशिश नहीं कर रही, जबकि यह अक्सर गरीब मुसलमानों के मुद्दे उठाती आई है. ‘गरीब मुसलमान’ जुमला वर्ग या श्रेणी को दर्शाता है. कांशीराम के गरीब मुसलमानों को बहुजन एकता का हिस्सा मानने के पार्टी के सिद्धांत का भी पालन किया जा रहा है. बहुजन एकता में दलित, पिछड़े मुसलमान और अन्य पिछड़ा वर्ग आते हैं.

यहां तक कि इस बार रैली स्थलों का चयन भी काफी रणनीतिक तरीके से किया गया है. अब तक उन्होंने आगरा, आजमगढ़, इलाहाबाद और सहारनपुर जैसे दलित-मुस्लिम बहुल इलाकों में रैलियां की हैं. और, वे अपनी हर रैली में भाजपा, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और भाजपा के साम्प्रदायिक एजेंडे पर हमला बोल रही हैं.

प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी, इसकी चाबी इन्हीं दोनों जातियों के हाथ में है. यहीं से दिशा तय होती है

आगरा में उन्होंने कहा, ‘जब से भाजपा सत्ता में आई है, मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है और दक्षिणपंथी ताकतें उनका शोषण कर रही हैं.’

यादव परिवार के विवाद से भाजपा को तो नुकसान ही होगा, जो यह मान कर चल रही थी कि 2014 के आम चुनावों की तरह मुस्लिम वोट सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच बंट जाएंगे. मुसलमान वोटों के विभाजन के चलते 2014 में भाजपा को 80 में से 71 सीटों पर जीत मिली थी और पार्टी को 42.3 प्रतित वोट मिले थे. भाजपा नेताओं को विश्वास था कि इसी प्रकार के मत विभाजन के चलते भाजपा 14 साल बाद इकलौती सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के तौर पर उभर सकती है. उस वक्त मायावती की बसपा शून्य पर सिमट कर रह गई थी.

2014 के चुनावों में जीत के बाद भाजपा को इस दौड़ में अग्रिम खिलाड़ी माना जा रहा था लेकिन हालिया घटित कुछ घटनाओं, खास तौर पर दलित और मुसलमानों पर किए जा रहे हमलों के चलते मायावती को इन दोनों ही वर्ग को लुभाने का मौका मिल गया है.

प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी, इसकी चाबी इन्हीं दोनों जातियों के हाथ में है. यहीं से भारतीय राजनीति की दिशा तय होती है. कड़ा परिश्रम करने वाली छवि और कानून-व्यवस्था का अच्छा रिकॉर्ड रखने वाली मायावती मुसलमानों को रिझाने में कामयाब हो सकती हैं, जो कि सपा की ओर कुछ सशंकित हो चले है.

First published: 18 September 2016, 7:43 IST
 
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