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बीएस येदियुरप्पाः रिश्वत कांड में राहत का फायदा राजनीति में नहीं

रामकृष्ण उपध्या | Updated on: 31 October 2016, 2:45 IST
QUICK PILL
  • कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और उनके घरवाले 40 करोड़ रूपए की रिश्वत लेने के मामले में विशेष सीबीआई अदालत ने बरी हो गए. 
  • मगर इससे उनके राजनीतिक कद पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि फिलहाल बीजेपी पार्टी के भीतर उनके स्तर में कोई बदलाव नहीं लाने वाली. 

इस मुश्किल मामले में फैसला आने के बाद येदियुरप्पा ने ट्वीट किया, 'सत्यमेव जयते, न्याय हुआ, मैं दोषमुक्त हूं'. उनकी नजर में यह सच्चाई और इंसाफ़ की जीत है. इस मामले को लेकर एक बार को ऐसा भी लगने लगा था कि इससे येदियुरप्पा का राजनीतिक करियर ख़त्म हो जाएगा.

येदियुरप्पा के अलावा उनके बेटे बीवी राघवेन्द्र और बीवी विजयेन्द्र, दामाद सोहन कुमार और मामले में सह अभियुक्त जेएसडब्ल्यू स्टील के कई वरिष्ठ अधिकारियों को भी बरी कर दिया गया है. येदियूरप्पा को 2018 के चुनावों में पार्टी का नेतृत्व करने के लिए बीजेपी ने पिछले अप्रैल में ही प्रदेश अध्यक्ष पद पर बहाल किया था. माना जा रहा है कि इन चुनावों में वोट जुटाने के लिए वे विक्टिम कार्ड का खेलेंगे जैसा कि 2008 के विधानसभा चुनाव जीतने के लिए उन्होंने विश्वासघात कार्ड का इस्तेमाल किया था.

अगर इससे उनके लिए थोड़ी-बहुत सहानुभूति की लहर चलती है और वह वोटों में तब्दील होती है, तो बीजेपी को इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ेगा. मगर येदियूरप्पा ख़ुद यह बात जानते हैं कि 2013 के बाद पार्टी के कामकाज के तौर-तरीकों में भारी बदलाव आए हैं और अब उन्हें पार्टी की प्रदेश इकाई में निर्विवाद नेता भी नहीं माना जाता. 

मतभेद और सुलह

बीजेपी की याददाश्त भी हाथी की तरह है. येदियुरप्पा ने 2013 के चुनावों के ठीक पहले बीजेपी छोड़कर कर्नाटक जनता पार्टी बना ली थी और चुनावों में भाजपा की सम्भावनाओं को ध्वस्त करने का बीड़ा उठा लिया था. हालांकि खुद उनकी पार्टी को नीचा देखना पड़ा और वह केवल पांच सीटें जीत पाई, लेकिन 10 प्रतिशत वोट लेकर वे बीजेपी को सबक सिखाने में कामयाब रहे और अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस की सत्ता में वापसी में सहायक बने.

फिर फौरन घर वापसी की उम्दा मिसाल पेश करते हुए येदियूरप्पा 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए समय रहते बीजेपी में वापस आ गए. उन्होंने नरेन्द्र मोदी लहर को मजबूत बनाने में पार्टी की मदद की और पार्टी राज्य की 28 में से 18 सीटें जीत गई.

हो सकता है कि येदियूरप्पा जिस प्रभावशाली लिंगायत समुदाय से आते हैं, वह उनके समर्थन में एकजुट हो गया हो लेकिन चुनावों के नतीजों ने बीजेपी के अंदर उनकी विश्वसनीयता बहाल करने में निश्चित रूप से उनकी मदद की. 

पुरानी दुश्मनियां खत्म हुए बिना येदियूरप्पा की वापसी से पार्टी के अंदर काफी हलचल हुई. इस सचाई को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि अनंतकुमार, जगदीश शेट्टार, सदानंद गौडा, केएस ईश्वरप्पा और आर अशोक जैसे वरिष्ठ नेता आज भी उनके खिलाफ हैं. 

येदियूरप्पा और उनके बेटे राघवेन्द्र लोकसभा के लिए चुने गए हैं लेकिन उनकी प्रदेश राजनीति में बने रहने की इच्छा किसी से छिपी नहीं है. सुर्खियों से दूर रहने वाले सांसद प्रहलाद जोशी का कार्यकाल पूरा करने तक पार्टी ने येदि को प्रदेश अध्यक्ष पद पर बहाल करने की उनके समर्थकों की मांग पर करीब दो साल तक कोई ध्यान नहीं दिया था. 

उन्हें अध्यक्ष जैसी ऊंची कुर्सी देने से पहले भाजपा को दो खास पहलुओं पर ध्यान देना था. उनके नेतृत्व को लेकर सहमति की कमी के अलावा उनपर चल रहे कानूनी मामलों का भी सवाल था. उनके खिलाफ कई अदालती मामले लंबित थे और किसी भी सूरत में अगर उनके खिलाफ कोई फैसला होता है तो पार्टी को शर्मिन्दगी झेलनी पड़ती. 

इस साल मार्च के महीने में कर्नाटक हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ लम्बित भूमि संबंधी अधिसूचना रद्द करने के करीब 15 मामले रद्द कर दिए. और चूंकि येदियुरप्पा का कोई बेहतर विकल्प नजर नहीं आ रहा था, तो मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने, उनके विरोधियों को चौंकाते हुए, बिना वक्त गंवाए पार्टी की बागडोर वापस उन्हें सौंप दी.

तानाशाह रवैया

उत्साहित येदियुरप्पा ने तुरंत पदाधिकारियों की नियुक्ति शुरू कर दी जो कि अधिकांश उनके खेमे के थे और जो कि उनके पीछे केजेपी तक हो आए थे. उन्होंने ऐलान कर दिया कि उनका मिशन कम से कम 150 सीटें जीतकर भाजपा को वापस सत्ता में लाने का है. 

मगर जल्द ही येदियुरप्पा के कामकाज के तानाशाही भरे रवैये के खिलाफ शिकायतों का अम्बार लग गया क्योंकि वे एकतरफा फैसले लेने लगे थे. जब उन्होंने कुछ वरिष्ठ नेताओँ तक की अनदेखी कर 24 सदस्यों की कोर कमेटी बना डाली, तब तो मानो आसमान ही फट पड़ा क्योंकि पार्टी देशभर में इस कमेटी में केवल 13 सदस्य रखने के सिद्धान्त पर चलती है.

मामला इतना बिगड़ गया था कि इसे सुलझाने के लिए केन्द्रीय नेतृत्व को दखल करना पड़ा. येदियूरप्पा द्वारा घोषित कोर कमेटी भंग कर दी गई और वरिष्ठतम नेताओं को शामिल करते हुए एक नई कमेटी मनोनीत की गई. यह येदियूरप्पा के लिए एक कड़ा संदेश था कि उन्हें सबको साथ लेकर चलना होगा और उन्हें किसी शासक की तरह काम करने अनुमति नहीं है.

येदियूरप्पा के गृह जिले शिवमोग्गा में उनके धुर विरोधी केएस ईश्वरप्पा ने विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया है. वे रायन्ना ब्रिगेड के तले ओबीसी को अलग से संगठित कर रहे हैं. अभी तक वे दो बड़ी रैलियां कर चुके हैं. इससे येदियूरप्पा काफी नाराज हैं लेकिन पार्टी ने अप्रत्यक्ष रूप से ईश्वरप्पा का साथ दिया है.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि येदियूरप्पा पार्टी से बड़े नहीं हैं. पिछली बार हमने उन्हें उच्चतम नेता मान कर गलती की और हमें उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी. पिछले चुनावों से हमने कई सबक सीखे हैं. भले ही, उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया है लेकिन उन्हें फिर पार्टी को पलीता लगाने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

सिद्धरामैया की गलतियों का फायदा उठाना

भाजपा के पुनर्जागरण अभियान का मुख्य उद्देश्य यह है कि सिद्धरामैया के नेतृत्व वाली सरकार की गलतियों को भुनाया जाए और 2018 के विधानसभा चुनावों में अपने आपको बेहतर विकल्प के रूप में पेश किया जाए. सिद्धरामैया सरकार पड़ोसी तमिलनाडु के साथ कावेरी मुद्दे पर लापरवाही बरतने, किसानों की आत्महत्याएं और कानून-व्यवस्था के बिगड़ते हालात जैसे विवादों में फंस गई है.

बेंगलुरू शहर में प्रदूषण के बढ़ते स्तर और कचरे व ट्रैफिक की समस्याओं से वहां के बाशिन्दे परेशान हैं और विशाल प्रदर्शनों के बावजूद स्टील के भारी-भरकम फ्लाईओवर के काम को आगे बढ़ाने को लेकर सरकार के अड़ियल रवैये से लोगों में आक्रोश है.

2400 करोड़ की इस परियोजना के लिए 800 पेड़ काटने पड़ेंगे और इसकी लागत 500 करोड़ रुपए और बढ़ने की संभावना है. इसे कांग्रेस के लिए उत्तरप्रदेश और पंजाब में चुनाव लड़ने के लिए पैसा उगाहने की परियोजना माना जा रहा है और बेंगलुरु के हित में नहीं है.

बीजेपी लोगों के इस असंतोष का लाभ उठाना चाहती है और मुख्यमंत्री 10 नवंबर को टीपू सुल्तान के जन्म की वर्षगांठ मनाने का फैसला लेकर भाजपा को एक और मुद्दा परोस रहे हैं जबकि पिछले साल इसी तरह के समारोह का अंत प्रदर्शनों व हिंसा से हुआ था और अखबारों में इसकी काफी आलोचना हुई थी.

First published: 31 October 2016, 2:45 IST
 
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