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'हां! बाबरी मस्जिद का निर्माण एक मंदिर पर हुआ था'

कैच ब्यूरो | Updated on: 24 January 2016, 20:00 IST
QUICK PILL
  • पुरातत्व शास्त्री केके मोहम्मद के मुताबिक बाबरी मस्जिद का निर्माण मंदिर के खंडहर पर \r\nहुआ है. इसके बदले में मुसलमानों को सामाजिक मुआवजे के रूप में एक \r\nमुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसी किसी नेक पहल की पेशकश करनी चाहिये.
  • इस विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए मुस्लिम समुदाय को स्वयं ही पहल करके इस विवादित स्थल को हिंदुओं को सौंप देना चाहिये, जो अयोध्या में भगवान राम के इस जन्मस्थान पर अपना दावा जताते हैं.

वरिष्ठ पुरातत्वविद डा. केके मोहम्मद की किताब ने एक नए विवाद को जन्म दिया है. 'जान एन्ना भारतीयन' (मैं एक भारतीय) शीर्षक से अपनी आत्मकथा में मोहम्मद ने कहा है कि बाबरी मस्जिद एक मंदिर के ऊपर बनी थी. साथ ही उन्होंने अपनी किताब में इस बात से इंकार भी किया है कि उन्होंने कभी कुतुब मीनार और ताज महल के मंदिरों के ध्वंसावशेष पर बने होने जैसा कोई बयान दिया था.

बाबरी मस्जिद एक मंदिर के ऊपर बनी थी

एक ऑनलाइन न्यूज़ प्लेटफार्म पर प्रकाशित एक रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया करते हुए मोहम्मद ने कहा, ‘उन्होंने कभी मुझसे बात नहीं की और पता नहीं कैसे वे इस बयान के लिये मुझे जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.’

लेकिन मोहम्मद अपने इस दावे पर अडिग हैं कि बाबरी मस्जिद का निर्माण एक मंदिर के ध्वंसावशेष पर किया गया है. उनका कहना है कि मुस्लिम समुदाय को स्वयं ही पहल करके इस विवादित स्थल को हिंदुओं को सौंप देना चाहिये, जो अयोध्या में भगवान राम के इस जन्मस्थान पर अपना दावा जताते हैं.

मुस्लिम समुदाय को स्वयं ही पहल करके इस विवादित स्थल को हिंदुओं को सौंप देना चाहिये

मोहम्मद ने कहा, ‘इस बात में कोई शक नहीं है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण मंदिर के खंडहर पर हुआ है. इसके बदले में मुसलमानों को सामाजिक मुआवजे के रूप में एक मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसी किसी पहल की पेशकश की जानी चाहिये. सिर्फ एक सौहार्दपूर्ण समाधान ही आगे बढ़ने का इकलौता रास्ता है.

इस विवाद में सिर्फ सौहार्दपूर्ण समाधान ही आगे बढ़ने का इकलौता रास्ता है

’जान एन्ना भारतीयन' (मैं एक भारतीय) शीर्षक से अपनी आत्मकथा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक लिखते हैं कि वर्ष 1976-77 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा विवादित स्थल की खुदाई के दौरान बाबरी मस्जिद स्थल पर मंदिर के स्तंभ और शिलालेख सामने आए थे.

मोहम्मद का दावा है कि उस समय इस निष्कर्ष पर किसी ने प्रकाश ही नहीं डाला और इस तथ्य को दबा दिया गया. अपनी किताब में उन्होंने इसके लिए वामपंथी इतिहासकारों को जिम्मेदार ठहराया है.

वामपंथी इतिहासकारों ने इस तथ्य को दबा दिया कि वहां मंदिर के अवशेष थे

‘दरअसल वर्ष 1976-77 में प्रोफेसर बी बी लाल की अध्यक्षता वाले पुरातत्वविदों के हाथ बंधे हुए थे और उन्हें इस स्थान का सिर्फ सांस्कृतिक महत्व बताना था. वास्तव में मंदिर का मुद्दा तो बहुत बाद में सामने आया.’

यह वरिष्ठ पुरातत्वविद् इस विवादित स्थल पर मंदिर होने के अपने दावे को लेकर बिल्कुल आश्वस्त हैं.

‘हालांकि यह साबित करना बेहद मुश्किल हो सकता है कि यह स्थान भगवान राम का जन्मस्थान है लेकिन इस तथ्य को कोई नहीं झुठला सकता कि यहां पर मंदिर का अस्तित्व था क्योंकि इसके बहुत मजबूत सबूत मौजूद हैं.’

वामपंथी इतिहासकार और मीडिया पर उनका प्रभाव

मोहम्मद आरोप लगाते हैं कि देश के मीडिया घराने उनके इन दावों पर ध्यान देने को तैयार ही नहीं हैं. उन्होंने कहा, ‘वामपंथी इतिहासकारों के मीडिया के साथ बहुत अच्छे संबंध रहे हैं.

इरफान हबीब और रोमिला थापर जैसे वामपंथी इतिहासकारों ने मंदिर के अस्तित्व से संबंधित तमाम सबूतों को सिरे से नकार कर बाबरी मस्जिद विवाद के एक सौहार्दपूर्ण समाधान के मौके को ही नाकाम कर दिया.’

इरफान हबीब और रोमिला थापर जैसे वामपंथी इतिहासकारों ने मंदिर के अस्तित्व से संबंधित तमाम सबूतों को सिरे से नकार दिया था

‘इसके अलावा चूंकि एएसआई से जुड़े पुरातत्वविद् सरकारी अधिकारी थे इसलिये वो विवरणों को सीधे मीडिया के साथ साझा नहीं कर सकते थे और इसी के चलते वामपंथी इतिहासकारों को अपने दुष्प्रचार को जारी रखने का पूरा मौका मिला.’

मोहम्मद का कहना है मुस्लिम समुदाय को हिंदू समाज का शुक्रगुजार होना चाहिये कि उन्होंने बहुमत में होने के बावजूद भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में सफलतापूर्वक स्थापित किया है.

उन्होंने आगे कहा, ‘मुसलमानों को हिंदुओ की भावनाओं का सम्मान करते हुए अयोध्या में विवादित स्थल पर मंदिर के निर्माण में खुलकर मदद करनी चाहिये.’

अयोध्या में एक मस्जिद की आवश्यकता क्यों है?

मोहम्मद के अनुसार अयोध्या में विवादित स्थल के पास बहुत अधिक मुस्लिम आबादी नहीं रहती है. उनका कहना है कि इस स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण समझ से परे है.

अगर यहां मस्जिद होता तब भी कुछ चुनिंदा मुसलमान ही वहां नमाज अता कर पाते.

अपनी किताब में उन्होंने 'कुव्वत-उल-इस्लाम' मस्जिद का निर्माण भी मंदिर के अवशेषों पर होने की बात कही है.

मोहम्मद का दावा है कि इस तथ्य को साबित करने के पूरे सबूत मौजूद हैं कि ऐतिहासिक कुतुब मीनार के नजदीक स्थित कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण भी एक मंदिर के अवशेषों पर किया गया था.

First published: 24 January 2016, 20:00 IST
 
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