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अम्मा की वापसी: बारी-बारी, सरकार हमारी, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा

जॉयजीत दास | Updated on: 21 May 2016, 15:33 IST
QUICK PILL
  • डीएमके सुप्रीमो करुणानिधि ने पिछले दिनों कहा था कि इस बार डीएमके के जीतने पर वही मुख्यमंत्री बनेंगे. छठी बार सत्ता संभालने के उनके सपने को जयललिता ने चकनाचूर कर दिया.
  • राज्य विधानसभा की कुल 232 सीटों में से 134 सीटें हासिल कर जयललिता ने तमिलनाडु में तीन दशकों से चली आ रही परंपरा को तोड़ दिया है.

जे जयललिता ने तीन दशकों से चली आ रही परंपरा को तोड़ दिया है. उनकी पार्टी एआईएडीएमके तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव में वापसी करने में कामयाब रही है.

देश का सुदूर दक्षिणी राज्य 1980 के दशक के मध्य से चिर विरोधियों एआईएडीएमके और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) को बारी-बारी से सत्ता देता रहा है. इस हिसाब से इस बार जयललिता को नापसंद किया जाना था और डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होना था.

दरअसल नब्बे साल पार कर चुके करुणा ने पिछले दिनों कहा भी था कि इस बार डीएमके के जीतने पर वही मुख्यमंत्री बनेंगे. उनके 63 वर्षीय पुत्र एमके स्टालिन को अभी इंतजार करना पड़ेगा. हालांकि छठी बार राज्य की सत्ता संभालने के उनके सपने को जयललिता ने तोड़ दिया. 

देश का सुदूर दक्षिणी राज्य 1980 के दशक के मध्य से चिर विरोधियों एआईएडीएमके और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) को बारी-बारी से सत्ता देता रहा है

राज्य विधानसभा की कुल 232 सीटों में से एआईएडीएमके को 134 सीटें मिली हैं, जबकि डीएमके को 97 सीटों से संतोष करना पड़ा है. नतीजों से पता चलता है कि सत्ता-विरोधी लहर ने पुरातची थलैवा जयललिता की सरकार को कोई खास नुकसान नहीं पहुंचाया है. हालांकि साल 2011 में मिली 203 सीटों के मुकाबले इस बार उनकी सीटें काफी घट गयी हैं.

इस निर्णायक जनादेश से पांच बातें साफ पता चलती हैं:

1- भ्रष्टाचार के आरोपों ने जयललिता की लोकप्रियता में कोई खास कमी नहीं आने दी है. आय से अधिक संपत्ति के मामले में बैंगलुरु के एक स्पेशल कोर्ट ने उन्हें चार साल जेल की सजा सुनाई थी और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करनी पड़ी थी, जब तक कर्नाटक हाईकोर्ट ने 11 मई 2015 को उन्हें बरी नहीं कर दिया. इस बीच जया के एक विश्वस्त ओ पनीरसेल्वम ने उनकी कुर्सी को संभाल कर रखा.

सत्ता-विरोधी लहर ने पुरातची थलैवा जयललिता की सरकार को कोई खास नुकसान नहीं पहुंचाया है. हालांकि 2011 में मिली 203 सीटों के मुकाबले इस बार उनकी सीटें काफी घट गई हैं

2- लोकलुभावन कदमों से तमिलनाडु की राजनीति में फायदा मिलता है. एआईएडीएमके और डीएमके दोनों ने अपने लोगों को लुभाने के लिए तथाकथित लोकलुभावन घोषणाओं का सहारा लिया है और ऐसा करने की वजह से उन्हें आलोचनाएं भी झेलनी पड़ी हैं. जया इस बार इसे एक नये स्तर पर ले गईं. उन्होंने अम्मा जल, अम्मा कैंटीन आदि की शुरुआत की. हां, दूध की कीमत और बस का किराया बढ़ा, लेकिन इससे अम्मा की योजनाओं की चमक फीकी नहीं पड़ी.

3- डीएमके राज्य में सरकार बनाने के एक व्यवहारिक विकल्प के तौर पर अपनी विश्वसनीयता स्थापित नहीं कर सकी. पार्टी के लिए चुनावों में यह लगातार तीसरी नाकामयाबी है. इससे पहले उन्हें 2011 के विधानसभा चुनाव और साल 2014 के लोकसभा चुनावों में हार का स्वाद चखना पड़ा था.

सच्चाई तो यह है कि करुणानिधि को साफ शब्दों में यह कहना पड़ा कि मुख्यमंत्री वह होंगे, स्टालिन नहीं, इसका मतलब यह है कि पार्टी के भीतर ही इस बात को लेकर भ्रम था. बड़े भाई एमके अलागिरि के साथ स्टालिन का झगड़ा भी पार्टी के लिए दिक्कतों का सबब है. इसके अलावा, लोग अभी भी टेलीकॉम घोटाले में पार्टी की संलिप्तता के आरोप को भुला नहीं पाये हैं.

उन्होंने अम्मा जल, अम्मा कैंटीन आदि की शुरुआत की. हां, दूध की कीमत और बस का किराया बढ़ा, लेकिन इससे अम्मा की योजनाओं की चमक फीकी नहीं पड़ी

4- डीएमके की हार के बावजूद यह चुनाव जिस तरह से दोतरफा लड़ाई हो गया, उसकी उम्मीद नहीं थी. दरअसल एआईडीएमके और डीएमके के बीच ही अधिकांश सीटें बंट गईं, जो अन्य पार्टियों के लिए दुःस्वप्न साबित हुआ, मसलन- कैप्टन विजयकांत की डीएमडीके- पूर्व केंद्रीय मंत्री वाइको की मरुमलाराची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम- रामदौस पिता-पुत्र की पट्टाली मक्कल काच्ची- थिरुमवालवन की विदुतलाई चिरुथैगल काच्ची.

जहां पीएमके को एक सीट मिली, वहीं बाकी दल अपना खाता भी नहीं खोल सके. सिनेस्टार विजयकांत खुद उलुनदुरपेट्टाई सीट पर तीसरे स्थान पर रहे. हालांकि आश्चर्यनजक रूप से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और पुथिया तमिलगम को एक-एक सीटें हासिल हो गईं. 

करुणानिधि को साफ शब्दों में यह कहना पड़ा कि मुख्यमंत्री वह होंगे, स्टालिन नहीं, इसका मतलब यह है कि पार्टी के भीतर ही इस बात को लेकर भ्रम था

5- क्षेत्रीय दल अभी भी राज्य की राजनीति की धुरी बने हुए हैं. तकरीबन आधी सदी से तमिलनाडु की राजनीति पर द्रविड़ियन दलों का प्रभाव बना हुआ है. इस बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस छह फीसदी से अधिक वोट और आठ सीटें पाने में कामयाब रही, जबकि भारतीय जनता पार्टी को केवल तीन फीसदी वोट मिले.

एनडीए 232 में से 230 सीटों पर अपनी जमानत तक नहीं बचा सका. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), इन दोनों को ही एक फीसदी से कम वोट मिले और ये पार्टियां एक भी सीट नहीं निकाल सकीं.

First published: 21 May 2016, 15:33 IST
 
जॉयजीत दास @joyjeetdas

Equal-opportunity critic and passionate about cinema, politics and food, not necessarily in that order. He writes, when the urge to tell a story overpowers everything else.

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