Home » इंडिया » Yogendra Yadav on Swaraj India: We need a secular politics that is not shy of offending anyone

योगेंद्र यादव: स्वराज इंडिया पंजाब में चुनाव नहीं लड़ेगी

निहार गोखले @CatchNews

 
निहार:

स्वराज इंडिया दूसरी राजनीतिक पार्टियों से अलग कैसे है?

योगेंद्र:

पार्टी 21वीं सदी के भारत की जरूरतों के मुताबिक बनाई गई राजनीतिक पार्टी है. फिलहाल जो राजनीतिक पार्टियां हैं, वे या तो 20वीं सदी की विचारधाराओं वाली पार्टी है या फिर ऐसी पार्टियां हैं जो ऐसे सिद्धान्तों का ढिंढोरा पीटती हैं, जिनके कुछ शब्दों के अर्थ भी वह कायदे से नहीं जानती. पहली श्रेणी में सीपीआईएम जैसी पार्टियां आती हैं, जबकि दूसरी श्रेणी में आप कह सकते हैं- समाजवादी पार्टी, कांग्रेस आदि.

बीजेपी जैसी पार्टी सांप्रदायिक और थोड़ी पुरानी पड़ चुकी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्त पर चल रही है, जो उसके अपने ही खोल में है और देश के बाकी लोगों की समझ से परे है. जरूरत है ऐसी धर्मनिरपेक्ष पार्टी की जो कांग्रेस, सपा, राजद और यहां तक कि वाम दल द्वारा अल्पसंख्यकों को इस्तेमाल करने के खिलाफ खड़ी हो सके.

जरूरत है ऐसी धर्मनिरपेक्ष राजनीति की जो विभिनन मुद्दों पर सैद्धान्तिक रवैया अपनाए, भले ही वह किसी से भी संबंधित हो.

जहां तक उम्मीदवारों के चयन का सवाल है, हमारा रुख बिल्कुल स्पष्ट है. हम इस संदर्भ में पुरानी परिपाटी से हटकर चलेंगे, जिसमें एक नेता तो टिकट बांटता है और लोकल लेवल पर स्वयंसेवक तय कर लेते हैं कि उनका उम्मीदवार कौन होना चाहिए.

टाइम्स ऑफ इंडिया के शुक्रवार के अंक में एक अच्छा कार्टून छपा है, जिसमें मुझे पारदर्शिता, लोकतंत्र और सब कुछ देने का वादा करते दिखाया गया है और सामने खड़ा मतदाता कहता है- देजा ‘वू’. आम आदमी पार्टी ने भी इसी तरह की बातें कहीं थीं, जब प्रशांत भूषण और मैं इसके सदस्य थे.

लोगों ने पहले भी यह सब सुन रखा है, इसलिए यह देजा वू की भावना और अविश्वास पैदा हो गया है, इसे समझा जा सकता है और मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा हूं. एक तरह से अच्छा ही होगा लोग हमें सतर्कता के साथ स्वीकारें ताकि हम उस सिंड्रोम से बच सकें, जिसमें पहले तो पूरे लगाव के साथ किसी पार्टी को स्वीकारा जाता है और फिर बाद में उसे उतनी ही नफरत भी मिलती है.

निहार:

कुछ ऐसी खबरें थीं कि आप बृहन्मुंबई नगरपालिका चुनाव में 50 सीटों पर लड़ेंगे? चुनाव लड़ने की इतनी जल्दी क्यों है?

योगेंद्र:

नहीं. मुंबई के बारे में अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं किया गया है. मैंने भी यह खबरों में देखा और यह अच्छा संकेत है कि पार्टी में दिल्ली में इस बारे में सोचा तक नहीं गया और बजाय हमसे इस बारे में पूछा जाता, यह खबर मैं अखबारों में पढ़ रहा हूं.

पर मुझे लगता है कि उन्होंने कभी ऐसा कोई इरादा जताया होगा लेकिन मुझे नहीं लगता कि पार्टी की इस बारे में कोई बैठक हुई है या कार्यकारिणी की बैठक हुई है. हमने इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया है. मुझे नहीं लगता कि बिना तैयारी के हमें चुनाव मैदान में उतरना चाहिए क्योंकि इससे अपेक्षित सफलता नहीं मिलती है.

निहार:

पंजाब के बारे में क्या ख्याल है?

योगेंद्र:

पंजाब की राजनीति में अभी उथल-पुथल मची हुई है. लोग सत्तारूढ़ दल से परेशान हैं और किसी भी कीमत पर इसे वापस नहीं चुनेंगे. अफसोस की बात यह है कि उनके पास विकल्प के तौर पर कांग्रेस या आप ही बचती है, जो कि लगता नहीं कि सही विकल्प साबित होगी. इसलिए पंजाब को एक सही विकल्प की जरूरत है.

परेशानी यह है कि जब जिस चीज की जरूरत होती है, वह हमेशा पूरी हो, जरूरी नहीं. इसलिए अभी बहुत सी बातें चल रही हैं. मैं तो बस यही कह सकता हूं कि अगर पंजाब में ही कोई विकल्प उभर कर सामने आता है तो हम उसको पूरा नैतिक और राजनीतिक समर्थन देंगे. मुझे नहीं लगता कि हम स्वराज इंडिया अपने दम पर अकेले चुनाव मैदान में उतरने वाले हैं.

जैसा कि मैंने कहा, केवल आप को नुकसान पहुंचाने के लिए हम पंजाब चले जाएं, यह हमारा राजनीतिक तरीका नहीं है. ऐसा तो हम बिल्कुल नहीं करेंगे.

बहुत से लोगों को अब भी आपके शब्द याद हैं कि एक नई पार्टी पहला चुनाव हारती है, दूसरे में लोगों की नजरों में आती है और तीसरे में जीतती है.

ये स्वर्गीय कांशीरामजी के शब्द हैं. वे किसी रादनीति विज्ञानी से ज्यादा भारतीय राजनीति को समझते थे. उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि हमें हारने के लिए लड़ना चाहिए, बल्कि उनके कहने का मतलब था इतिहास गवाह है कि कोई भी नई ताकत अक्सर पहली बार हारती है. दूसरी बार इस नए घटक से दूसरी पार्टियों की हार-जीत की दिशा तय होती है और तीसरी बार में यह खुद जीतती है. इसीलिए उनकी राजनीतिक सफलता का रास्ता धीमा और स्थाई था.

आप के अनुभव को देखते हुए लगता है हमें कड़ाई से कांशीरामजी के सिद्धांतों का पालन करना होगा क्योंकि सत्ता पाने के लिए अपनाया गया शॅार्ट रास्ता गड्ढों से भरा होता है. जो लोग बदलाव लाना चाहते हैं, अफसोस है कि उन्हें सब्र नहीं है.

निहार:

और दूसरे राज्यों के बारे में क्या सोचा है?

योगेंद्र:

मेरे लिए चुनाव महत्वपूर्ण इसलिए होते हैं कि इससे जनता से सीधे संवाद को मौका मिलता है और हम जनता को अपने विचारों को मानने के लिए मना सकते हैं. आपके संदेश से कुछ लोग आपकी तरफ हो ही जाते हैं. लेकिन यह सब तभी हो सकता है जब आपने पहले ही तैयारी करके रखी हो.

गोवा और उत्तराखंड से कोई मेरे सहकर्मी आते हैं तो मेरा उनसे सवाल यह नहीं होगा कि क्या आप जीत रहे हैं? मेरा सवाल होगा कि चुनाव के मौके पर क्या आप अंतिम व्यक्ति तक अपनी बात पहुंचाने में कामयाब हुए? सब कुछ देखते हुए मैं यह कह सकता हूं कि हम हर जगह चुनाव नहीं लड़ेंगे और न ही काफी संख्या में टिकट बांटेंगे. किन्हीं विशेष चीजों पर फोकस करेंगे और उसी पर सारी ताकत झोंक देंगे.

निहार:

चूंकि आप बहुत से मोर्चों पर कई नए कदम उठा रहे हैं क्या आप महिला उम्मीदवारों को तरजीह देंगे?

योगेंद्र:

संविधान में महिलाओं को हर जगह एक चौथाई आरक्षण प्राप्त है. हमने 33 प्रतिशत आरक्षण नहीं दिया क्योंकि समाज के दूसरे सामाजिक समूह को भी साथ में ले कर चलना है, जो वंचित और दबा हुआ है. सवाल यह नहीं है कि हम कितनी महिलाओं को टिकट देंगे, असल सवाल यह है कि इन महिला उम्मीदवारों में से कितनी महिलाएं नेता बन पाएंगी.

स्वराज अभियान ने रिहायशी इलाकों में चल रही शराब की दुकानों के खिलाफ अभियान चलाया था. क्या आप शराब बंदी का समर्थन करेंगे.

इसमें कोई शक नहीं है कि हमारे देश में शराब पीना सामाजिक बुराई माना गया है. दुर्भाग्यपूर्ण है कि शाराबबंदी को ही इसका एक मात्र समाधान माना जाता है. इससे अस्थाई समाधान तो निकल जाता है लेकिन आगे चल कर इसके कई गंभीर परिणाम हो सकते हैं. चोरी, तस्करी, अवैध शराब बनाना जैसी कई खरनाक गतिविधियां बढ़ने का अंदेशा रहता है.

मेरी निजी राय है कि हमें शराब के उपभोग में कमी लाने के लिए धीमा लेकिन कड़ा कदम उठाना होगा. मुझे लगता है शराब नियमन नीति के मामले में केरल सबसे स्मार्ट राज्य है. इसके नियमानुसार, दस साल का लक्ष्य लेकर चलिए, और धीरे-धीरे व्यवस्थित ढंग से कम करने का लक्ष्य पूरा करने के लिए सारे उपाय अपनाएं. हर साल दो दुकानें बंद करें, चरणबद्ध तरीके से चलें.

साथ ही जो शराब पीने के आदी हैं, उन्हें उनके समर्पण के लिए अच्छी सुविधाएं उपलब्ध करवाएं और युवाओं के बीच खेल संस्कृति को बढ़ाएं. मुझे लगता है यह सही तरीका है. लेकिन यहां भी जिस चीज की सख्त जरूरत है, वह है शराब की दुकानें कम करना और किसी भी एरिया में दुकान खोलने के लिए स्थानीय लोगों से अनुमति लेना आवश्यक कर दिया जाए. मैं कहूंगा यह अनुमति उस इलाके की किसी महिला से ली जाए. कम से कम इतनी चीज को अनिवार्य बनाया जाय.

 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.