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जेएनयू विवाद: भारतीय राजनीति में युवा, पत्थरों पर जमती संभावनाएं

पाणिनि आनंद | Updated on: 23 February 2016, 8:12 IST
QUICK PILL
  • ये युवा ही थे जिन्होंने दिल्ली में जन लोकपाल के आंदोलन में ईधन का काम \r\nकिया. यही हैं जो आज भी हैदराबाद विश्वविद्यालय से लेकर दिल्ली तक सरकारों \r\nकी नींदें उड़ाए हुए हैं.
  • दिल्ली से लेकर पंजाब तक छात्र और युवा खड़े हैं और लड़े हैं. इलाहाबाद की ऋचा सिंह आदित्यनाथ का रथ रोक देती हैं, रोहित वेमुला की आत्महत्या दिल्ली\r\n को हैदराबाद विश्वविद्यालय में समेट देती है.

जिस वक्त ये लेख लिखा जा रहा है, दिल्ली की सड़कों पर छात्रों और युवाओं ने ख़बरों से लेकर राजनीति तक की दिशा को अपने बाजू से बांध लिया है. वो एक पूरी सत्ता को चुनौती दे रहे हैं. देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल से लड़ रहे हैं और देश के ही एक बड़े दक्षिणपंथी संगठन को छोटा साबित करते जा रहे हैं.

राजनीतिक आका अपनी ताकत का एहसास दिलाते हुए इन छात्रों से कहते हैं कि यह है राजनीति. छात्र पलटकर कहते हैं कि हम हैं देश का युवा. युवा शक्ति का ज्वार राजनीति की जमी-जमाई मिट्टी को खोदने की ताकत रखता है. दिल्ली और देश इसके यक्षवत साक्षी हैं. तो क्या युवा राजनीति की दिशा तय कर रहे हैं. और क्या यह अब हो रहा है.

दरअसल, ऐसा नहीं हैं. युवाओं ने राजनीति की दिशा तय की है और करते रहेंगे. हालांकि इस क्रम में कितने ही उतार-चढ़ाव युवा राजनीति ने देखे हैं. लेकिन राजनीति की दिशा को तय करना, इसके संवाद और संघर्ष को दिशा देना और उसे साकार करना युवाओं के ज़रिए होता रहा है.

राजनीति की दिशा को तय करना, इसके संवाद और संघर्ष को दिशा देना युवाओं के ज़रिए होता रहा है

आज़ादी से पहले के भारत में क्रांतिकारी धारा का एक बड़ा हिस्सा युवा था, विद्यार्थी था. उसके पास सोच भी थी और शक्ति भी. इस सोच और शक्ति के सामन्जस्य से उसने मुख्यधारा के आंदोलनों और नायकों को चुनौती भी दी और अपने को अलग धारा और मकसद के साथ खड़ा भी किया.

आपातकाल के समय और जेपी आंदोलन के दौरान जो एक चीज़ उस पूरे आंदोलन की शक्ति और संवाहक बनी, वो युवा शक्ति ही थी. वहीं से आगे चलकर राजनीति को नेतृत्व मिला, राजनीतिज्ञों की एक पूरी पीढ़ी मिली. कश्मीर से लेकर सुदूर दक्षिण तक और पूर्वोत्तर से लेकर कच्छ की खाड़ी तक युवा समय समय पर सवालों के साथ मज़बूती से खड़े होते रहे हैं और आंदोलनों के वाहक बनते रहे हैं.

यही युवा मंडल-कमंडल की लड़ाई में सड़कों पर दिखे, यही दलित आंदोलनों के सिपाही बने. इन्होंने ही पुलिस बर्बरताओं, मानवाधिकार हनन, सांप्रदायिक दंगों, जाति आधारित हिंसा, संवैधानिक अधिकारों पर हमले का विरोध किया. ये युवा ही थे जिन्होंने दिल्ली में जन लोकपाल के आंदोलन में ईधन का काम किया. यही हैं जो आज भी हैदराबाद विश्वविद्यालय से लेकर दिल्ली तक सरकारों की नींदें उड़ाए हुए हैं.

और यही कारण है कि पिछले लगभग तीन दशकों के दौरान एक सुनियोजित साजिश के तहत अगर किसी एक चीज़ पर हमला करने में सभी राजनीतिक दल एकसाथ खड़े दिखते हैं तो वो हैं छात्र और युवा राजनीति. उदारीकरण के दौर में सवाल पूछने और संघर्ष करने की जगहों को कमज़ोर करने का काम तेज़ी से किया गया. कितने ही विश्वविद्यालयों में चुनावों पर रोक लगी. परिसरों के छात्र राजनीति के परिवेश को पैसे और बाहुबल की चमक दिखाकर विचलित कियागया.

अगर किसी एक चीज़ पर हमला करने में सभी राजनीतिक दल एकसाथ खड़े दिखते हैं तो वो हैं छात्र और युवा राजनीति

शक्ति और स्वार्थ के सपने दिखाकर छात्रों को भ्रष्ट किया गया. कितने ही परिसरों में छात्र राजनीति अपराध का अड्डा बनी. उसकी सुचिता और स्वतंत्रता को कमज़ोर करके उसे भाड़े के प्यादों के तौर पर इस्तेमाल किया गया. राजनीति के अपराधीकरण ने छात्र राजनीति की कमीज़ पर भी ख़ून पोतने का काम किया.

आज स्थिति यह है कि धनबल, बाहुबल के बिना कई विश्वविद्यालयों में युवा राजनीति की लड़ाई संभव नहीं दिखती. या यूं कहें कि जीत और वर्चस्व के लिए इन्हीं शार्टकट रास्तों से चलकर राजनीति में जमने का चरित्र पिछले 25 सालों के दौरान गढ़ा गया है. बात फिर लखनऊ या पटना की हो, इंदौर या जयपुर की हो, कोलकाता या पुणे की हो, युवा राजनीति को कमज़ोर और पथभ्रष्ट करने के प्रयासों में कोई कमी कसर नहीं छोड़ी गई.

आज देश का एक बड़ा हिस्सा निजी संस्थानों में पढ़ रहा है जहां राजनीति तो दूर, उसे अखबार तक पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं किया जाता है और ऐसी किसी भी कोशिश का सिर कुचलने में ज़रा भी देर नहीं की जाती. हम बहुत सुनियोजित ढंग से अपनी युवा पीढ़ी को नपुंसक बनाते जा रहे हैं. हमने उसे सिखाया है कि राजनीति नहीं, करियर पर ध्यान दो. हमने उसके दिमाग में भरा कि राजनीति सबसे गंदा काम है. हमने उसकी सोच और जागरूकता पर बाज़ार और व्यावसायिकता की पट्टी बांध दी.

हमने छात्रों को सिखाया है कि राजनीति नहीं, करियर पर ध्यान दो. हमने उसके दिमाग में भरा कि राजनीति सबसे गंदा काम है

इस तरह हम एक ऐसी युवा पीढ़ी के साथ आगे बढ़ते देश हैं जिसके पास राजनीति को, सरकारों को और देश को देखने समझने के लिए न तो इतिहासबोध है और न ही कोई वैज्ञानिक तर्क है.जो फिर भी राजनीति की ओर देखते रहे, उन्हें राजनीतिक दलों ने अपने चूल्हे की लकड़ी भर समझा. कांग्रेस के लिए छात्र राजनीति विलास और स्तुतिगान बनी तो भाजपा के लिए संघ के एजेंडे की संवाहक. क्षेत्रीय दलों ने इसमें जाति और वर्चस्व को तरजीह दी. स्थिति यह है कि स्वतंत्र और नए विचारों की ज़मीन को अधिकतर परिसरों में बंजर किया जा चुका है.

युवा राजनीतिक दलों के हाथों इस्तेमाल हो रहे हैं. उनकी मौलिकताएं उनकी दुश्मन बन जाती हैं और पिछलग्गू, भीड़ जुटाऊ, पैसेवालों की नस्ल नेतृत्व पर कब्ज़ा करके बैठी हैं. वामदल भी इसमें पीछे नहीं रहे. उन्होंने छात्रों और युवाओं को दरी बिछाने से लेकर रैली की संख्याओं तक सीमित रखा है. फैसले लेने में या मार्गदर्शन करने में पार्टी नेतृत्वों और युवाओं के बीच एक खाई है और वो लगातार बढ़ती जा रही है.

वामदलों ने भी छात्रों और युवाओं को दरी बिछाने से लेकर रैली की संख्याओं तक सीमित रखा है

इन तमाम विषमताओं के बावजूद छात्रों ने राजनीति को समझने और जानने की ललक जीवित है. शिमला से लेकर हैदराबाद तक, दिल्ली से लेकर पंजाब तक छात्र और युवा खड़े हैं और लड़े हैं. इलाहाबाद की रिचा सिंह आदित्यनाथ का रथ रोक देती हैं, रोहित वेमुला की आत्महत्या दिल्ली को हैदराबाद विश्वविद्यालय में समेट देती है. लखनऊ के अंबेडकर विश्वविद्यालय के छात्र प्रधानमंत्री के मुंह पर बगावत कर देते हैं, जेएनयू का कन्हैया दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की नींद उड़ा देता है.

राहुल गांधी से लेकर सीताराम येचुरी तक और नीतीश कुमार से लेकर अरविंद केजरीवाल तक की खेप छात्रों के संघर्षों और सवालों में अपने लिए संभावनाएं खोजती मिल जाती हैं.

युवाओं में, छात्र-छात्राओं में अपार शक्ति है. संभावना और मौलिकता है. वो आगे बढ़ना चाहते हैं और देश को अपने साथ आगे ले जाना चाहते हैं. यही शक्ति और जज्बा उन्हें राजनीति के दिग्गजों से अधिक मज़बूत और क्षमतावान बनाए रखता है. आगे जाकर अगर कोई रास्ता भटकता भी है तो नई पीढ़ी युवाओं के नेतृत्व के रूप में नज़र आती है. राजनीति इन युवाओं को अपने भविष्य नहीं, दोहन की दृष्टि से देखती है और युवा इस स्थिति को चुनौती की तरह.

राजनीति इन युवाओं को अपने भविष्य नहीं, दोहन की दृष्टि से देखती है

इस अंतरद्वन्द्व में युवा ज़्यादा मज़बूत हैं. उनके पास आयु, ऊर्जा और नयापन है. राजनीति के बूढ़े गिद्ध अंततः युवाओं से ही सहारा मांगते आए हैं. युवा मानस बदल रहा है. राजनीति को भी अपना रवैया बदलना ही पड़ेगा.

First published: 23 February 2016, 8:12 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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