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ज्यां द्रेज़: कुछ लिखने से पहले पढ़ना जरूरी है!

ज्यां द्रेज़ | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
वरिष्ठ अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ ने यह पत्र छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में रह रही अपनी सहयोगी बेला भाटिया पर हो रहे हमले और खुद को विदेशी दलाल और नक्सली बताए जाने की घटना के जवाब में लिखा है.

कल मैं यह सुनकर दंग रह गया कि कुछ लोग जगदलपुर के नजदीक रह रही मेरी सहोयगी बेला भाटिया के निवास के पास जमा हुए और पड़ोसियों को उनके खिलाफ भड़काने लगे. एकदम फिल्मी तर्ज पर इन लोगों ने उनके घर के नजदीक ही प्रदर्शन किया और “बेला भाटिया मुर्दाबाद” तथा “बेला भाटिया बस्तर छोड़ो” जैसे नारे लगाये.

इन लोगों ने एक पर्चा भी बांटा जिसमें हम दोनों के बारे लिखा था कि ये दोनों नक्सलवादी हैं और “देश को तोड़ना” चाहते हैं. प्रदर्शनकारियों में से कुछ ने बेला की मकान मालकिन से उसे निकाल बाहर करने को कहा. सौभाग्य से, बेला के पड़ोसी और मकान-मालकिन उसकी बहुत कद्र करते हैं और उन्होंने प्रदर्शनकारियों को तवज्जो नहीं दी.

जो कोई बेला और मुझे नक्लसलवादी मानता है वह निश्चित ही सच्चाई से कोसों दूर है. स्थानीय मीडिया (कैच न्यूज में भी) में प्रकाशित एक बयान में बेला इन आरोपों को खारिज करते हुए बस्तर के अपने काम की प्रकृति के बारे में स्पष्ट कर चुकी हैं. मेरे खुद के विचार और काम भी एक खुली किताब की तरह हैं. अगर प्रदर्शनकारियों ने इन बातों को जानने खोजने की जहमत उठायी होती तो वे ऐसा आरोप लगाने से पहले कई दफा सोचते.

मैं रांची विश्वविद्यालय और दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से जुड़ा हूं और विकासपरक मुद्दों पर एक अर्थशास्त्री के तौर पर काम करता हूं.

मैं रांची विश्वविद्यालय और दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से जुड़ा हूं और विकासपरक मुद्दों पर एक अर्थशास्त्री के तौर पर काम करता हूं. मैं रांची में रहता हूं और समय-समय पर बेला से मिलने बस्तर आता रहता हूं. मेरा ज्यादातर काम भुखमरी, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक नीति के अन्य पहलुओं पर है. मैं अमर्त्य सेन, एंगस डीटॉन, निकोलस स्टर्न  और अन्य अर्थशास्त्रियों का घनिष्ठ सहकर्मी हूं और अगर मैं नक्सलवादी हूं तो इन्हें भी छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक एक्ट के तहत जेल भेजा जाना चाहिए.

जिस किसी ने मेरा लेखन देखा है वह जानता है कि मैं सशस्त्र संघर्ष का समर्थन नहीं करता हालांकि लोकतांत्रिक साधनों के जरिए अन्याय के सभी रुपों के प्रतिकार का मैं समर्थक हूं. मैंने बचपन में युद्ध की भयावहता के बारे में सुना था और तभी से मैं शांति-समर्थक कार्यकर्ता हूं. मैं न तो नक्सलवादी हिंसा का समर्थन करता हूं और ना ही राज्यसत्ता द्वारा की जाने वाली हिंसा का. माओवादी हिंसा में मैंने खुद अपने मित्र को गंवाने का दुःख उठाया है. झारखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले मेरे साहसी मित्र नियामत अंसारी को माओवादी दस्ते ने कुछ साल पहले बड़ी बेरहमी से मार डाला था.

ऊपर जिस पर्चे का जिक्र आया है उसमें मुझे ‘विदेशी दलाल’ बताया गया है. सच्चाई यह है कि मैं भारतीय नागरिक हूं और कल जो लोग यह पर्चा बांट रहे थे, उनमें से कइयों की तुलना में मैंने भारत में कहीं ज्यादा वक्त बिताया है. मैं इस देश से प्यार करता हूं जहां कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मेरे मित्र हैं. सिवाय कल के दिन के भारत में सैंतीस सालों से रहते हुए मुझे कभी शत्रुतापूर्ण बर्ताव का सामना नहीं करना पड़ा है.

मुझे ‘विदेशी दलाल’ बताया गया है. सच्चाई यह है कि मैं भारतीय नागरिक हूं

नक्सलवादी होने का आरोप एक बहाना भर है. बेला को परेशान करने की असली वजह यह है कि उन्होंने कुछ हफ्ते पहले सुरक्षाबल के कुछ सदस्यों के खिलाफ बलात्कार और यौन-हिंसा की शिकायत दर्ज कराने में बीजापुर जिले की कुछ आदिवासी महिलाओं की मदद की थी. इसके बाद से ही पुलिस-प्रायोजित सामाजिक एकता मंच जैसे समूहों ने बेला को निशाना बनाना शुरु कर दिया. बस्तर के लोगों ने तो अपनी तरफ से बेला का, वह जहां भी गई है, स्वागत ही किया है और उसके काम का समर्थन किया है.

कल का प्रदर्शन धमकाने का आपराधिक कृत्य है. यह बहुत अनैतिक भी है. बस्तर जैसी जगह में किसी पर नक्सलवादी होने का आरोप मढ़ना उसकी जान खतरे में डालने के बराबर है. नक्सलवादी को निंदा का पात्र समझकर उसे निशाने पर लेने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसे आरोप के आधार पर बेला को नुकसान पहुंचा सकता है.

मुझे विश्वास है कि बस्तर के नेकदिल लोग बेला की सुरक्षा में मदद करेंगे.

ज्यां द्रेज

जगदलपुर, 27 मार्च 2016

First published: 29 March 2016, 8:54 IST
 
ज्यां द्रेज़ @catchhindi

लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं

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