Home » इंडिया » zee news has become factory producing 'anti-national'
 

ज़ी न्यूज़ समाचार चैनल है या 'राष्ट्रविरोधी' गढ़ने का कारखाना

आदित्य मेनन | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
  • 10 मार्च को 200 अकादमिशियनों और एक्टिविस्टों ने एक बयान जारी करके ज़ी \r\nन्यूज़ की निंदा की. इस बयान में कहा गया कि चैनल \'एक एक कर लोगों\r\n को निशाना बना रहा है और उनके खिलाफ लोगों के मन में नफरत पैदा रहा है.
  • ज़ी न्यूज़ ने नौ फरवरी को जेएनयू में हुए कार्यक्रम के दौरान हुई नारेबाजी\r\n का एक कथित वीडियो चलाया. चैनल ने कहा कि वीडियो में कुछ लोग \'पाकिस्तान \r\nजिंदाबाद\' का नारा लगा रहे थे. दिल्ली पुलिस ने चैनल के वीडियो के आधार पर\r\n ही जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के खिलाफ मामला दर्ज किया.

दिसंबर 2001 में गुजराती मूल के कुछ मुसलमान कारोबारी कनाडा से भारत आए थे. उनका मक़सद बेसहारा बच्चों की शिक्षा से जुड़ा एक छोटा सा प्रोजेक्ट शुरू करना था.

अपनी यात्रा के दौरान वो कई एनजीओ वालों से मिले. जिन लोगों से वो मिले उनमें मेरी एक आंटी भी शामिल थीं.

कारोबारी समूह अपना काम करके 13 दिसंबर, 2001 को वापस जाने लगे. उसी दिन भारतीय संसद पर हमला हुुआ था.

उन लोगों को एयरपोर्ट पर पूछताछ के लिए रोक लिया गया. कुछ ही देर बाद एक टीवी चैनल पर खबर चलने लगी कि 'देश से भागने की' कोशिश कर रहे 'संदिग्ध आतंकी' हिरासत में लिए गए.

चैनल ने मेरी आंटी और उनकी एक अन्य महिला सहयोगी का नाम भी उनके मददगार के तौर पर चलाना शरू कर दिया.

पढ़ेंः पत्रकार विश्व दीपक ने ज़ी न्यूज़ से इस्तीफा दिया

कनाडा के कारोबारियों को थोड़ी देर बाद छोड़ दिया गया और वो वापस लौट गए. हालांकि उन्होंने भारत में बेसहारा बच्चों के लिए प्रोजेक्ट शुरू करने का अपना विचार त्याग दिया.

चैनल ने दोबारा ये खबर नहीं चलायी कि कनाडा से आए कारोबारियों को पुलिस ने बेगुनाह पाते हुए जाने दिया है.

ज़ी न्यूज़ के मालिक सुभाष चंद्रा पिछले लोक सभा चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी का प्रचार कर चुके हैं

चैनल ने कनाडा के कारोबारियों का नाम लिखना तो बंद कर दिया लेकिन उसने मेरी आंटी और उनकी सहयोगी का नाम बेरोकटोक दिखाता रहा.

मेरी आंटी की सहयोगी पंपोश एनक्लेव में रहती थीं. इस कॉलोनी में कश्मीरी पंडित काफी संख्या में रहते हैं. उनकी मकान मालिक ने टीवी पर संसद हमले के संबंध में उनका नाम देखने के बाद उन्हें घर से निकाल दिया.

पुलिस की जांच में कहीं भी इन दो महिलाओं के नाम का जिक्र नहीं था. जाहिर है उनका इस हमले से दूर दूूर तक कोई लेना-देना नहीं था. लेकिन चैनल ने इस बाबत कोई स्पष्टीकरण नहीं जारी किया, माफी मांगना तो दूर की बात है.

चैनल जिस खबर को 'एक्सक्लूसिव' कहके दिखा रहा था उसपर कोई फॉलोअप न्यूज नहीं दी.

अब तक आप अगर उस चैनल का नाम न समझ गए हों तो हम बता दें कि वो चैनल 'ज़ी न्यूज़' था.

गौहर रज़ा को निशाना बनाना

आज पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि वो दोनों महिलाएं भाग्यशाली थीं. कम से कम प्राइम टाइम में उनकी तस्वीर लगाकर उन्हें 'राष्ट्रविरोधी' नहीं घोषित किया गया था.

ज़ी न्यूज़ ने वैज्ञानिक गौहर रज़ा के साथ ठीक यही किया है. क्योंकि उन्होंने पांच मार्च को हुए शंकर शाद मुशायरे में एक कविता पढ़ी थी.

नौ मार्च की शाम ज़ी न्यूज़ पर लगातार उन्हें 'राष्ट्रविरोधी' बताया जाता रहा. मुशायरे में शामिल लोगों को अफ़ज़ल गुरु गैंग के सदस्य बताए गए. गौहर रज़ा की कविता में दूर-दूर तक ऐसा कुछ नहीं था जिसे 'राष्ट्रविरोधी' ठहराया जा सके. लेकिन ज़ी न्यूज़ को इसकी चिंता कहां.

पढ़ेंः मीडिया ने 'राष्ट्रवाद' का बहुत ही संकुचित इस्तेमाल किया

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि रज़ा को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वो और उनकी पत्नी शबनम हाशमी नरेंद्र मोदी की गुजरात दंगों में भूमिका पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं.

ऐसे मे जरूरत इस बात की नहीं है कि लोगों को रज़ा की कविता के बारे में बताया जाए और इस बात पर बहस की जाए कि उसमें कोई 'राष्ट्रविरोधी' बात थी या नहीं.

जरूरत इस बात की है कि ज़ी न्यूज़ जिस तरह पत्रकारिता कर रहा है उसपर बात की जाए.

10 मार्च को 200 अकादमिशियनों और एक्टिविस्टों ने एक बयान जारी करके ज़ी न्यूज़ की निंदा की. इस बयान में कहा गया कि चैनल 'एक एक कर लोगों को निशाना बना रहा है और उनके खिलाफ लोगों के मन में नफरत पैदा रहा है.'

ज़ी न्यूज़ के एडिटर सुधीर चौधरी पर 100 करोड़ की फिरौती का मामला चल रहा है. फिलहाल वो जमानत पर रिहा हैं

रज़ा से एक दिन पहले ज़ी न्यूज़ ने जेएनयू की प्रोफेसर निवेदिता मेनन को 'राष्ट्रविरोधी' घोषित कर दिया था.

ज़ी न्यूज़ की खबरों में एक खास ढर्रा साफ दिखता है. जेएनयू विवाद में चैनल की भूमिका से ये बात परी तरह खुलकर सामने आ गयी.

जेएनयू विवाद


फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली सरकार ने ज़ी न्यूज़ पर फर्जी वीडियो चलाने का आरोप लगाया है. ज़ी न्यूज़ ने नौ फरवरी को जेएनयू में हुए कार्यक्रम के दौरान हुई नारेबाजी का एक कथित वीडियो चलाया. चैनल ने कहा कि वीडियो में कुछ लोग 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा लगा रहे हैं. दिल्ली पुलिस ने चैनल के वीडियो के आधार पर ही जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के खिलाफ मामला दर्ज किया.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नौ फरवरी को पुलिस जेएनयू कैंपस में मौजूद थी. उसने मामले का कोई संज्ञान नहीं लिया. जब 10 फरवरी को ज़ी न्यूज़ ने कथित वीडियो चलाया उसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया.

ये बात भी सामने आयी है कि नौ फरवरी को ज़ी न्यूज़ जेएनयू में घटना के कुछ ही देर पहले जेएनयू एबीवीपी नेता सौरभ शर्मा के बुलावा पर गया था. शर्मा जेएनयू छात्र संघ के ज्वाइंट सेक्रेटरी हैं.

तो क्या शर्मा और ज़ी न्यूज़ को पहले से पता था कि 'राष्ट्रविरोधी' नारे लगने वाले हैं? आखिर ज़ी न्यूज़ एक बहुत छोटे से संगठन के कार्यक्रम को कवर करने के लिए वहां क्यों पहुंचा था?

एबीवीपी और ज़ी न्यूज़ के संबंधों का पता एक और घटना से लगता है. 21 फरवरी को जब 'राजद्रोह' के अभियुक्त उमर खालिद, अनिर्बान भट्टाचार्या एवं अन्य छात्र नौ दिनों तक छिपे रहने के बाद जेएनयू परिसर में सामने आए तो एबीवीपी के नेताओं ने कथित तौर पर एनडीटीवी के पत्रकार श्रीनिवास जैन की कैंपस में मौजूदगी का विरोध किया. 

पढ़ेंः जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार से विशेष बातचीत

खबरों के अनुसार एबीवीपी के नेताओं ने कहा कि अगर श्रीनिवास जैन कैंपस से बाहर नहीं गए तो वो लोग ज़ी न्यूज़ को बुलाएंगे. इससे जाहिर है कि एबीवीपी का भरोसा किस चैनल पर है और ये भरोसा क्यों है इसके लिए समझने के लिए किसी को आइंस्टाइन होने की जरूरत नहीं.

ज़ी न्यूज़ की कवरेज की पोल उस पत्र से भी खुलकर सामने आई जो पत्रकार विश्व दीपक ने चैनल से इस्तीफा देते हुए लिखा. विश्व दीपक ने चैनल के जेएनयू मामले के 'अनैतिक' कवरेज के विरोध में इस्तीफा दिया. विश्व दीपक ने लिखा है कि वीडियो के बयान को सीनियर एडिटरों के कहने पर तोड़-मरोड़ कर चलाया गया था.

सोशल मीडिया में ज़ी न्यूज़ की छीछालेदर होने के बाद चैनल के मालिक सुभाष चंद्रा दर्शकों से मुखातिब हुए.

उन्होंने चैनल का बचाव करते हुए कहा कि ज़ी न्यूज़ 'प्रो-इंडियन' है, 'प्रो-बीजेपी' नहीं. उन्होंने इस आरोप को भी गलत बताया कि चैनल ने कोई फर्जी वीडियो चलाया था.

ज़ी न्यूज़ सांप्रदायिक चैनल नहीं इसके सबूत के तौर पर चंद्रा ने ज़ी के ज़िंदगी चैनल पर चल रहे पाकिस्तानी सीरियलों का हवाला दिया.

चंद्रा ने ये हवाला क्यों दिया ये समझ से परे है. आखिर दोनों मामलों में क्या सीधा संबंध है. कहीं ऐसा तो नहीं कि वो भी कई बीजेपी नेताओं की तरह भारतीय मुसलमानों को 'पाकिस्तानी' समझते हैं.

चंद्रा ने चैनल पर जो कुछ कहा हो, बीजेपी से उनकी नजदीकियां जगजाहिर हैं. पिछले लोक सभा चुनाव में चंद्रा ने हरियाणा के हिसार के बीजेपी कैंडिडेट कमल गुप्ता का प्रचार किया था. आप नीचे दिए वीडियो में उन्हें बीजेपी के लिए प्रचार करते देख सकते हैं.

ज़ी न्यूज़ के अखबार डीएनए में छपी खबर के अनुसार चंद्रा ने तब कहा था कि "वो हिसार के किसी भी बीजेपी प्रत्याशी का समर्थन करेंगे" और उनका "बीजेपी से दो दशकों पुराना रिश्ता" है.

उन्होंने ये दावा भी किया था कि अगर वो चाहते तो बीजेपी ने उन्हें टिकट दे दिया होता.

सुभा चंद्रा का पूरा नाम सुभाष चंद्रा गोयल है. वो मूलतः हिसार के रहने वाले हैं. हैरत की बात है कि ज़ी न्यूज़ के दो सबसे मुखर विरोधी नवीन जिंदल और अरविंद केजरीवाल भी हिसार के ही हैं. तीनों ही बनिया हैं.

पढ़ेंः मीडिया की मंडी में सबसे बड़ा रुपैय्या

कुरुक्षेत्र के पूर्व सांसद नवीन जिंदल ने 2012 में ज़ी न्यूज़ पर आरोप लगाया था कि चैनल ने उनसे 100 करोड़ रुपये मांग हैं. जिंदल के अनुसार चैनल ने कोयला घोटाले में जिंदल के शामिल होने से जुड़ी खबर न चलाने के लिए फिरौती के तौर पर ये रकम मांगी थी.

इस मामले में ज़ी न्यूज़ के सुधीर चौधरी और समीर अहलुवालिया को जेल जाना पड़ा था. दोनों बाद में जमानत पर रिहा हुए. मामला न्यायालय में विचाराधीन है.

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ज़ी न्यूज़ समेत कुछ दूसरे चैनलों पर फर्जी वीडियो चलाने के लिए कानूनी कार्रवाई करनेे जा रही है.

ऐसे में ये सवाल पूछना लाजिमी है कि, जिस चैनल के मालिक का एक राजनीतिक दल से खुला संबंध हो, जिसके एडिटरों को फिरौती के आरोप में जेल जाना पड़ा हो और जिसपर लोगों को 'राष्ट्रविरोधी' बताने के लिए फर्जी वीडियो चलाने का आरोप हो, उस चैनल के कार्यक्रमों को पत्रकारिता कहा जा सकता है?

फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता कि ज़ी न्यूज़ अपने रवैये में कोई बदलाव लाने वाला है. आखिर लोगों को 'राष्ट्रविरोधी' घोषित करना एक मुनाफ़े का सौदा बनता जा रहा है.

(लेख में व्यक्त विचार विचार लेखक के निजी हैं. संस्थान का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है)

First published: 12 March 2016, 9:21 IST
 
आदित्य मेनन @adiytamenon22

एसोसिएट एडिटर, कैच न्यूज़. इंडिया टुडे ग्रुप के लिए पाँच सालों तक राजनीति और पब्लिक पॉलिसी कवर करते रहे.

पिछली कहानी
अगली कहानी