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''मुसलमानों को भी दिल-दिमाग बड़ा करना होगा''

याकूब खा बंगस | Updated on: 14 December 2015, 8:10 IST

'रेसिप्रॉसिटी' (परस्पर समभाव) बहुत ही उपयोगी शब्द है. मेरियम-वेबस्टर डिक्शनरी के अनुसार इसका अर्थ है- ऐसी स्थिति जिसमें दो व्यक्ति या समूह एक-दूसरे के लिए समान आदर भाव रखते हो और एक-दूसरे के लिए एक समान अधिकार की बात करते हों.

वैश्विक राजनीति, पारस्परिक संबंधों या व्यक्तिगत जिंदगी के लिहाज से बहुत जरूरी चीज है. वास्तव में दुनिया परस्पर समभाव से चल रही है वरना यहां कब की अराजकता फैल गई होती.

तथाकथित मुस्लिम दुनिया बनाम बाकी धर्मों के संदर्भ में भी यह शब्द बहुत मायने रखता है.

ईसाई धर्म की सर्वोच्च पीठ में मस्जिद का निर्माण

1970 के दशक में रोम शहर में मुसलमानों के लिए एक मस्जिद बनाने का प्रस्ताव सामने आया. इस विचार में कुछ भी गलत नहीं था. रोम में बड़ी संख्या में मुसलमान रहते हैं और उन्हें शहर के अंदर अपने प्रार्थना स्थल का अधिकार था.

लेकिन इस प्रस्ताव का प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा था. मुसलिमों के लिए जितना महत्व मक्का-मदीना का वही स्थिति ईसाइयों के लिए रोम की है. यह स्थान ईसाई धर्म का हृदयस्थल है. इसे ईसाइयत का केंद्र बिंदु भी कहा जा सकता है.

सदियों से रोम को पूरी दुनिया में ईसाई धर्म के केंद्र और उसकी ताकत का प्रतीक माना जाता रहा है

यहीं से निकलकर ईसाइयत पूरी दुनिया में फैली. 1970 के दौर में दुनिया भर में मुस्लिम आबादी ईसाइयों की आबादी से कम थी इसलिए भी यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा था. शुरुआती झिझक और पसोपेश से उबरते हुए चर्च प्रशासन ने धार्मिक आजादी के सिद्धांतों को वरीयता दी. इस प्रकार रोम में पहले मस्जिद निर्माण का रास्ता साफ हो गया. 1980 के दशक की शुरुआत में मस्जिद का निर्माण शुरू हुआ.

जून 1995 में भारी धूमधाम के बीच मस्जिद का उद्घाटन हुआ. यह इस्लामी दुनिया के बाहर सबसे बड़ी मस्जिद थी. इसके गुंबद की ऊंचाई सेंट पीटर्स बैसिलिका से सिर्फ एक मीटर कम थी और इसकी वजह है कि ऊंचाई कम रखने का अनुरोध किया गया था.

बाइबिल के प्रति सऊदी अरब का रवैया

इटली के पैपल नान्शियो (चर्च के अधिकारी) ने चर्च द्वारा मस्जिद को समर्थन देने की घटना को प्रमुखता से रेखांकित किया है. कार्डिनल फ्रांसेस्को कोलासुओन्नो ने कहा था, ''परस्पर समभाव की भावना से हमने सऊदी अरब के लोगों के लिए प्रार्थना स्थल खोलने का निर्णय लिया था. अब इस्लामी दुनिया को ईसाइयों की जरूरत को भी ध्यान रखना चाहिए.''

चर्च यह उम्मीद कर रहा था कि सउदी अरब के लिए अपने दरवाजे खोलने और रोम में एक विशाल मस्जिद का निर्माण करने के बाद सउदी अरब में ईसाइयों को आसानी से रहने की इजाजत मिलेगी. साथ ही, मक्का या मदीना में या किसी और जगह छोटे से चर्च के निर्माण की अनुमति भी मिलेगी.

वह 1995 की बात है, यह 2015 का साल है. लेकिन चर्च की यह इच्छा अभी भी अधूरी है. 20 साल पहले जब सउदी सरकार यूरोप और अमेरिका में मस्जिद और इस्लामिक सेंटर के लिए पैसा दे रही थी उस समय सउदी में ईसाइयों के लिए इस तरह के कामों की मनाही थी. सउदी में आज भी बाइबिल के साथ या ईसाई रीति रिवाजों के साथ प्रार्थना करते हुए पकड़े जाने पर आप को गिरफ्तार किया जा सकता है.

घर से बदलाव हो

मुसलमान अगर पश्चिम में तेजी से खुद के हाशिये पर जाने की बात करते हैं तो उन्हें सबसे पहले अपने घर में चीजों को बदलना होगा. परिवर्तन पहले मुस्लिम देशों से शुरू होना चाहिए बाद में पश्चिम को रास्ता दिखाने की बारी आती है.

मुसलमान अगर पश्चिम के देशों में अपने साथ ही हो रहे भेदभाव को लेकर इतने मुखर हैं तो उन्हें मुस्लिम देशों में गैरमुस्लिमों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ भी आवाज उठानी चाहिए.

उदाहरण के लिए जब अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की ओर उम्मीदवारी की दौड़ में शामिल बेन कार्सन ने कहा, 'मैं इस बात की वकालत नहीं करूंगा कि किसी मुसलमान के हाथ में देश की बागडौर सौंप दी जाए. किसी भी मुस्लिम को अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं होना चाहिए.' इस बयान पर अमेरिकी लोगों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी. उम्मीदवारी की दौड़ में कार्सन अब तीसरे नंबर पर खिसक गए हैं, जबकि कई हफ्तों से वह दूसरे नंबर पर चल रहे थे.

इधर मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम कानूनी तौर पर कभी भी राज्य या सरकार के मुखिया नहीं हो सकते. मुस्लिम देश इसके लिए क्या कर रहे हैं? आश्चर्यजनक यह है कि जिन मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम पांच फीसदी से भी कम है वहां भी इसी तरह के प्रावधान है.

सिकुड़ती दुनिया

ग्लोबलाइजेशन के बाद से दुनिया का आकार छोटा हो गया है. एक दशक पहले, नीदरलैंड के लोगों ने शायद मिस्र में ईसाई उत्पीड़न के बारे में कभी नहीं जान पाते लेकिन आज की तारीख में वे वहां की तस्वीरें देख सकते हैं और सताए हुए लोगों से मिल भी सकते हैं.

कुछ समय पहले तक बोको हरम के बारे में बहुत कम लोगों ने सुना था. लेकिन अब संयुक्त राज्य अमेरिका के दूरदराज के इलाकों में भी लोगों को इस संगठन की जानकारी है.

एक-दूसरे से जुड़ी दुनिया में जहां 'मुस्लिम विश्व' और 'पश्चिम' को हिस्सों में बांटकर देखा जा रहा है. हमें दोनों तरफ से इस मुद्दे को देखना होगा

मुस्लिम देश बिना अपने में घर बदलाव किए, पश्चिम में आजादी और अधिकार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. यहां तक कि सबसे अधिक उदार माने जाने वाले मुस्लिम देश तुर्की में भी धार्मिक स्वतंत्रता सीमित है. मुस्लिम देशों को अन्य धर्मों और संस्कृतियों के साथ तालमेल बिठाने की जरूरत है.

पोप बेनेडिक्ट ने 2006 में कहा था, 'दुनिया का भविष्य ईसाई धर्म और इस्लाम के बीच एक वास्तविक बातचीत पर निर्भर करता है. हालांकि, बातचीत परस्पर समभाव के बिना सफल नहीं होगी.

First published: 14 December 2015, 8:10 IST
 
याकूब खा बंगस @BangashYK

लेखक शिक्षक और लेखक हैं, लाहौर में रहते हैं.

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