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नेपाल: माहवारी की शर्मनाक प्रथा 'चौपदी' से होने वाली मौतों का सिलसिला जारी है

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 20 December 2016, 8:11 IST
(प्रकाश मथेमा/एएफ़पी )
QUICK PILL
  • पश्चिमी नेपाल में स्त्रियों के साथ अमानवीय भेदभाव वाली परंपरा ग़ैरकानूनी घोषित किए जाने के बावजूद चल रही है. 
  • पहली माहवारी के दौरान पूरे चार दिन स्त्रियों को जानवरों की शेड या दड़बों में गुज़ारना पड़ता है जिसकी वजह से उनकी मौत भी हो जाती है. 

पड़ोसी देश नेपाल में सदियों से चल रही एक प्रथा चौपदी ने एक महीने के अंतराल पर दो लड़कियों की जान ले ली है. 18 नवंबर को पश्चिमी नेपाल के अचाम ज़िले में 21 साल की दंभरा उपाध्याय की लाश एक दड़बे में मिली थी. ठीक एक महीने बाद 19 दिसंबर की सुबह रोशनी तिरुआ मरी पाई गईं जिनकी उम्र महज़ 15 साल थी. वो नौवीं क्लास में पढ़ती थीं. 

नेपाली अख़बार द रिपब्लिका ने अचाम ज़िले के एसपी बद्री प्रसाद ढकाल के हवाले से लिखा है, 'मुमकिन है कि रोशनी की मौत दम घुटने से हुई हो क्योंकि शनिवार की रात सोने से पहले उन्होंने दड़बे को गर्म रखने के लिए आग सुलगाई थी. हो सकता है कि ऑक्सीज़न की कमी होने से नाते वो मर गई हों.'

नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ने दंभरा की मौत पर चिंता जताई थी. जब इसकी जानकारी मंत्री परिषद एवं प्रधानमंत्री कार्यालय ने अचाम के मुख्य ज़िला अधिकारी कुशलराज शर्मा को फ़ोन पर दी तो उन्होंने कहा, 'यह प्रथा ख़त्म करने के लिए वह कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.' मगर ठीक एक महीने बाद उसी अचाम ज़िले में अब 15 साल की रोशनी की मौत हुई है. 

चौपदी

नेपाल के सुदूर पश्चिमी इलाक़े में चौपदी सदियों से जारी है. 2011 में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रपट के मुताबिक हिंदू धर्म की सभी छोटी-बड़ी जातियों में इसका चलन है. स्त्री जब माहवारी से गुज़रती है तो इस दौरान उन्हें अछूत और नापाक माना जाता है. रोज़मर्रा की ज़िंदगी से वो पूरी तरह कट जाती हैं. माहवारी के चार से पांच दिन उन्हें घर के बाहर जानवरों के लिए बने शेड में गुज़ारना पड़ता है. 

2005 में नेपाल की सुप्रीम कोर्ट से पाबंदी लगने के बावजूद यह प्रथा पश्चिमी नेपाल के दादेलधुरा, बैतड़ी, धारचुला, अचाम, बझांग में जारी है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि अभी भी 95 फ़ीसदी महिलाओं को इस प्रथा का पालन करना पड़ता है. 

लड़की जब पहली बार माहवारी से गुज़रती है तो उसे चार की बजाय 14 दिन तक जानवरों के शेड में गुज़ारना होता है. बच्चे पैदा करने वाली माएं भी चौपदी के दायरे में हैं. प्रसव के फ़ौरन बाद उन्हें भी इसी शेड में रहना पड़ता है.

काठमांडू से 800 किलोमीटर दूर अचाम ज़िले के एक गांव में चौपदी की प्रथा निबाहती 13 साल की सरस्वती विश्वकर्मा (प्रकाश मथेमा)

भेदभाव

माहवारी के दौरान औरतें घर, रसोई या मंदिर में दाख़िल नहीं हो सकतीं. किसी इंसान, जानवर, फल-सब्ज़ी, पेड़-पौधे से उनका स्पर्श न हो जाए, इसका ख़ास ध्यान रखा जाता है. माहवारी के दौरान उन्हें दूध या दूध से बने किसी भी उत्पाद को खाने-पीने की इजाज़त नहीं होती. वो पानी कहां से पिएंगी या फिर नहाएंगी कहां, यह जगह भी तय होती है.

आस्था

मान्यता है कि माहवारी के नाते महिलाओं को साल में एक बार ऋषि पंचमी उत्सव मनाना चाहिए. इस उत्सव में उन्हें व्रत रखना और प्रार्थना करना होता है. यह उत्सव एक प्रक्रिया है ख़ुद को पवित्र करने की और माहवारी के दौरान हुए किसी 'अभद्र व्यवहार' के लिए क्षमा मांगने की.

अचाम के एक गांव में चौपदी के लिए ख़ासतौर पर बनाए गए दड़बे की तरफ़ इशारा करतीं पशुपति. (प्रकाश मथेमा/एएफ़पी)

अंधविश्वास

ग़ैरकानूनी घोषित होने के बावजूद सदियों से चली आ रही यह प्रथा महज़ अंधविश्वास के नाते आजतक कायम है. पश्चिमी नेपाल में माना जाता है कि अगर चौपदी से बचने की कोशिश की तो देवी-देवता नाराज़ हो जाएंगे. देवी-देवता की नाराज़गी उनके पूरे समाज पर भारी पड़ सकती है. वो वक्त से पहले मर जाएंगे, बड़े पैमाने पर मौतें होंगी. फ़सलें तबाह हो जाएंगी. माहवारी से गुज़र रही स्त्री अगर फल छू दे तो वह पकने से पहले गिर जाएगा. पेड़, पौधे सूख जाएंगे. अगर माहवारी के दौरान कुएं से पानी भरा तो वह भी सूख जाएगा. 

असर

अभी तक ऐसा अध्ययन नहीं आया है जिससे चौपदी के नाते होने वाली मौतों का सटीक आंकड़ा मिल पाए. मगर इस प्रथा से गुज़रने वाली औरतों की मौतें होती हैं, यह सच है. बीते 30 दिनों में सिर्फ़ अचाम ज़िले में दो मौतें सामने आई हैं. गोशाला या दड़बे में रहने के नाते कई बार जानवर उनपर हमला कर देते हैं और सांप काटने के मामले भी सामने आए हैं. 

चौपदी नेपाली स्त्रियों के लिए एक किस्म की शारीरिक़ और मानसिक प्रताड़ना है. गोशाला या मुर्गी के दड़बे ऐसी जगह होते हैं जहां बदबू, गंदगी और कीड़े-मकोड़े प्रजनन करते हैं. अप्रैल 2016 में द गार्डियन ने अपनी एक रिपोर्ट में चौपदी झेलने वाली कई महिलाओं के अनुभव साझा किए हैं. रिपोर्ट में एक महिला कहती हैं कि चार से पांच दिनों तक जानवरों के बीत में रात गुज़ारना बेहद तक़लीफ़देह है. माहवारी नज़दीक आते ही डर लगने लगता है. काश कि मैं इससे मुक्ति पा पाती. 

सेहत

ना सिर्फ़ इन औरतों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी से काट दिया जाता है बल्कि उन्हें सूखी रोटी और नमक खिलाया जाता है. नतीजन, उनके शरीर में पोषण की कमी हो जाती है. 

वो रात में शेड में सोती हैं और दिन में श्रम करती हैं. मिट्टी खुदने से लेकर जंगल से लकड़ी और घास काटने का काम उन्हें करना पड़ता है. नेपाल में कई सरकारी और गैर सरकारी अध्ययन बताते हैं कि इस दौरान औरतों में डायरिया, निमोनिया, श्वास संबंधी बीमारियां बढ़ जाती हैं. चौपदी उन्हें शर्मिंदगी का एहसास कराने से लेकर दुख और अवसाद की शिकार बना देती है. 

ऐसे भी कई मामले आए हैं कि शेड या दड़बे में रहने के नाते औरतें यौन हिंसा का शिकार होती हैं लेकिन अपमान और कलंक से बचने के नाते उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाता. 

मान्यता है कि चौपदी नहीं निभाने पर ज्ञान की देवी सरस्वती नाराज़ हो जाएंगी. लिहाज़ा, माहवारी के दौरान उन्हें कुछ भी पढ़ने-लिखने की इजाज़त नहीं होती और वो स्कूल भी नहीं जातीं. 

First published: 20 December 2016, 8:11 IST
 
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