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अब अफगानिस्तान में भी अल्पसंख्यकों पर अत्याचार

कैच ब्यूरो | Updated on: 24 June 2016, 14:15 IST
(एजेंसी)

अफगानिस्‍तान में कट्टरपंथियों पर उन्माद इस कदर हावी हो चुका है कि हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों को रोजाना धमकी दी जा रही है कि इस्लाम अपना लो, नहीं तो मार दिए जाओगे.

कुछ इसी तरह की घटना काबुल शहर में जगतार सिंह के साथ हुई. जब वह अपनी हर्बल शॉप में बैठे थे, उसी दौरान एक शख्‍स आया और सीधे उनके गले पर चाकू तान दिया. युवक ने चेतावनी भरे लहजे में जगतार सिंह से कहा कि, इस्‍लाम अपना लो, नहीं तो तुम्हारा गला काट देंगे. आस-पास खड़े लोगों और दूसरे दुकानदारों ने उस युवक से जगतार सिंह की जान बचाई.

इस महीने के शुरुआत में हुई यह घटना अफगानिस्तान में तेजी से अल्पसंख्यकों पर बढ़ रहे हमलों का ताजा मामला है. इस्‍लामिक उग्रवाद और आर्थिक चुनौतियों के कारण अफगानिस्तान में असुरक्षा की भावना घर करती जा रही है.

आतंकवाद के खौफ के कारण यहां अब केवल गिनती के सिख और हिंदू परिवार बचे हैं. धार्मिक भेदभाव और असहिष्‍णुता के कारण कई ऐसे परिवारों ने अपने जन्मस्‍थान को छोड़कर बाहर भागने में ही भलाई समझी.

अपनी छोटी से दुकान में बैठे जगतार बताते हैं, "हमारे दिन की शुरुआत खौफ के साथ ही होती है. यदि आप मुस्लिम नहीं हो तो कट्टरपंथियों की निगाह में आप इंसान ही नहीं हैं. समझ में नहीं आ रहा, मैं क्‍या करूं और कहां जाऊं?"

सदियों से हिंदू और सिख समुदाय ने अफगानिस्‍तान के व्यापार और आर्थिक मामले में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं.

'नेशनल काउंसिल ऑफ हिंदूज एंड सिख्‍स' के चेयरमैन अवतार सिंह के मुताबिक, अब ऐसे परिवारों की संख्‍या 220 से कम हो गई है, जबकि 1992 में काबुल सरकार के गिरने से पहले तक दो लाख से अधिक सिख और हिंदू यहां रहते थे.

सिंह ने बताया कि एक समय पूरे अफगानिस्‍तान में फैले यह परिवार अब मुख्‍य रूप से राजधानी काबुल, नांगरहार और गजनी में रह रहे हैं.

हालांकि अफगानिस्तान मुस्लिम देश है लेकिन 2001 में अमेरिकी फौज द्वारा तालिबान सरकार को बेदखल करने के बाद यहां सैद्धांतिक रूप से अल्‍पसंख्‍यकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गई है. लेकिन सही मायनों में यह धार्मिक स्वतंत्रता केवल कागजों पर ही है.

अवतार बताते हैं, "तालिबान के समय और भी हालात बदतर थे. तब इस्लामी कानून सख्‍ती से लागू किए जाते थे. सरेआम लोगों को सजा यहां तक कि फांसी दी जाती थी और लड़कियों को स्कूल जाने की मनाही थी.

हिंदू और सिखों को पीले रंग वाले कपड़े होते थे, ताकि उन्हें आसानी से पहचाना जा सके. पुराने अच्‍छे दिन चले गए, जब हमें अफगान की तरह ही माना जाता था, बाहरी नहीं.' हमारी जमीन सरकार के प्रभावशाली लोगों ने ले ली है. हमें धमकियां मिल रही हैं और हमारी जनसंख्‍या लगातार कम होती जा रही है."

First published: 24 June 2016, 14:15 IST
 
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