Home » इंटरनेशनल » Akhtar Mansoor killed: what this means for US, Pakistan & Taliban
 

अख्तर मंसूर की हत्या: अमेरिका, पाकिस्तान और तालिबान के लिए क्या हैं इसके मायने

तिलक देवाशर | Updated on: 25 May 2016, 7:35 IST
(एएफपी)

तालिबान प्रमुख मुल्ला अख्तर मंसूर की पाकिस्तान के बलूचिस्तान सूबे में 21 मई को एक अमेरिकी ड्रोन हमले में हुई हत्या का अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमाई क्षेत्र में अमेरिकी नीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ने वाला है. इसके अलावा यह घटना पाकिस्तान-अमेरिका संबंध, तालिबान, अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया और पाकिस्तान पर भी असर डालेगी.

यह ड्रोन हमला अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र के प्रति अमेरिकी नीति में संभावित बदलाव का संकेत देता है क्योंकि बलूचिस्तान में यह पहला अमेरिकी ड्रोन हमला है. इससे पहले हुए हमले या तो अल कायदा को लक्ष्य बना कर किये गये थे या पाकिस्तान तालिबान को निशाने पर ले कर किये गये थे और केवल पाकिस्तान-अफगानिस्तान के कबायली क्षेत्रों तक सीमित थे. साल 2004 से अब तक किये गये 390 ऐसे हमलों में से महज चार जनजातीय क्षेत्रों के बाहर किये गये हैं. साल 2013में हंगू जिले में एक और साल 2008 में बन्नू में तीन.

बलूचिस्तान खास तौर पर अब तक ड्रोन हमलों के दायरे से बाहर रहा है इसलिए नहीं कि पाकिस्तानी संस्थाएं पश्तूनों और बलोचों से प्यार करती हैं, बल्कि इसलिए कि वहां परमाणु गतिविधियां होती हैं और वहां क्वेटा शुरा (क्वेटा में मौजूद तालिबान नेतृत्व) मौजूद है.

पढ़ें: पनामा पेपर्स ने उजागर किया पाकिस्तान के नाभिकीय हथियारों की असुरक्षा

इस बार अमेरिका ने किया यह है कि उसने बलूचिस्तान में तालिबान पर हमले कर खुद अपनी बनायी हुई सीमाओं में ढील देते हुए पाकिस्तान के अब तक वर्जित क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है. यह बात अमेरिका की पाकिस्तान के साथ बढ़ती झुंझलाहट का संकेत देती है. आतंकवाद को लेकर ढुलमुल तरीके से काम कर रहा पाकिस्तान न तो अफगानिस्तान में तालिबान के आतंकी हमलों को रोक रहा है और न ही तालिबानों को अफगान सरकार के साथ सीधी बातचीत करने दे रहा है.

यह अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्तों के लिए एक और झटके की तरह है, जो पहले से ठीक नहीं हैं. पाकिस्तान द्वारा आठ एफ-16 लड़ाकू विमान मांगे जाने के बाद अमेरिकी कांग्रेस ने इनको कम कीमत पर देने से मना कर दिया था.

मंसूर के नेतृत्व संभालने के बाद चीजें अव्यवस्थित हो गयी थीं क्योंकि अहम तालिबानी नेता इसको चुनौती दे रहे थे

अख्तर मंसूर की मौत कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने खुद हनोई से बयान जारी कर इस मौत को “मील का अहम पत्थर” बताया और साथ ही यह भी कहा कि अमेरिका ने “एक ऐसे संगठन के नेता को रास्ते से हटा दिया है जो लगातार अमेरिका और गठबंधन की सेनाओं के खिलाफ योजनाएं बनाता है और उन पर हमले करता है.”

जुलाई 2015 में मंसूर के नेतृत्व संभालने के बाद चीजें अव्यवस्थित हो गयी थीं क्योंकि अहम तालिबानी नेता इसको चुनौती दे रहे थे. उसे अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए काफी समय और ऊर्जा लगानी पड़ रही थी. उसकी मौत से तालिबान के भीतर उत्तराधिकार की एक और लड़ाई छिड़ सकती है.

मंसूर के बाद क्या?

रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 22 मई को ही तालिबान काउंसिल ने उत्तराधिकार को तय करने के लिए एक बैठक की. उसके उत्तराधिकारियों में सबसे अहम नाम सिराजुद्दीन हक्कानी का है, जो आईएसआई का करीबी रहा है और जिसे पाकिस्तान ने हाल ही में तालिबान पदक्रम में दूसरे स्थान पर बिठा दिया था.

दरअसल मंसूर के उच्च पद पर पहुंचने के पीछे एक कारण उसको हक्कानी नेटवर्क से प्राप्त समर्थन भी था जो आईएसआई ने उसके लिए तैयार किया था. हालांकि, सिराजुद्दीन को उत्तराधिकार देने की पाकिस्तान की इच्छा को भी चुनौती मिलने की संभावना है.

तालिबान आंदोलन कंधार क्षेत्र से शुरू हुआ था और पूर्वी अफगानिस्तान से आने वाले हक्कानी को थोपना आंदोलन में एक दरार पैदा कर सकता है. इस कदम से अमेरिका को भी चिढ़ हो सकती है क्योंकि इसने हक्कानी नेटवर्क को सबसे खतरनाक आतंकी समूहों की सूची में डाल रखा है और एडमिरल मुलेन ने इसे आईएसआई की वास्तविक इकाई की संज्ञा दी थी.

पढ़ें: अमेरिकी ड्रोन हमले में तालिबानी नेता मंसूर ढेर

इस बात की संभावना अधिक है कि मुल्ला उमर के बेटे याकूब, जो लीडरशिप काउंसिल में है, को मंसूर का उत्तराधिकार दे दिया जाये. लेकिन यह आईएसआई को पसंद नहीं आयेगा. इसके अलावा इस दौड़ में कई और लोग भी शामिल हैं- मंसूर का दूसरा प्रमुख सहयोगी मौलवी हैब्तुल्लाह, पूर्व तालिबानी रक्षा मंत्री मुल्ला अब्दुल कयूम जाकिर और मुल्ला उमर का छोटा भाई मुल्ला अब्दुल मन्नान उमेरी.

अफगान शांति प्रक्रिया पर असर

तालिबान में इस उठापटक के बावजूद अफगान सरकार को इस आंदोलन से अधिक राहत नहीं मिलने वाली. इसे निकट भविष्य में संभावित हमलों से निपटने के लिए तैयार रहना होगा, अन्यथा कोई नया तालिबानी नेता हमलों की झड़ी लगाते हुए अपनी साख स्थापित करने की कोशिश करेगा.

जारी शांति वार्ता के लिए यह अच्छी खबर नहीं है. खुद तालिबान के बीच ही यह विवाद का विषय है खास तौर पर उनके लिए जो अफगान बलों के खिलाफ लड़ाई में लगे हैं. घटी हुई अमेरिकी उपस्थिति और अधिकांश क्षेत्रों पर कब्जा होने के बावजूद एक ऐसी अफगान सरकार के साथ शांति वार्ता उनको बेमतलब की कवायद लगती है, जो कुछ खास देने की इच्छुक नहीं है.

इसीलिए इस बात पर कोई अचरज नहीं होना चाहिए कि चतुष्कोणीय समन्वयन समूह यानि क्वार्डिलेटरल कोआर्डिनेटिंग ग्रुप (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, अमेरिका- क्यूसीजी) द्वारा प्रायोजित शांति वार्ता किसी दिशा में बढ़ती दिखाई नहीं दे रही है.

तालिबान में इस उठापटक के बावजूद अफगान सरकार को इस आंदोलन से अधिक राहत नहीं मिलने वाली

बीती 18 मई को हुई पांचवी बैठक के बाद क्यूसीजी इस बात पर बल देने के अलावा कुछ भी नहीं कर सका कि अफगानिस्तान में शांति स्थापना के लिए राजनीतिक तौर पर किया गया समझौता ही एक व्यावहारिक विकल्प है. यह जगजाहिर है कि क्यूसीजी की ओर से चलाई जा रही शांति वार्ता नाकामयाब होती दिख रही है और मंसूर की हत्या वार्ता की ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकती है, कम से कम अभी तो यही स्थिति है.

इन ड्रोन हमलों ने पाकिस्तान को कहां ला खड़ा किया है? सच कहें तो उसे कई मोर्चों पर शर्मिन्दगी उठानी पड़ी है. पांच साल पहले ओसामा बिन लादेन को एबटाबाद में मारा गया, यह भी सच है कि साल भर पहले ही मुल्ला उमर की मौत भी पाकिस्तानी जमीन पर ही हुई थी, अब मुल्ला मंसूर की पाकिस्तान में मौत ने इसे कहीं का नहीं छोड़ा है. पाकिस्तान अब झूठ के उस जाल के पीछे खुद को नहीं छिपा सकता जो यह पिछले एक दशक से अधिक समय से बुनता रहा है.

पढ़ेंः सेना और पनामा पेपर्स नवाज शरीफ के लिए दोधारी तलवार

दुनिया में भारत की बढ़ती साख को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंचों पर मौजूदगी ही पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा हथियार रही है. हालांकि इस धोखाधड़ी से उसकी स्थिति डांवाडोल होनी शुरू हो गयी है. अगर, जैसा कि दावा किया जा रहा है, पाकिस्तान को इस घटना के बाद सूचित किया गया और पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया, तो एक बार फिर पाकिस्तानी सेना की पोल खुल गयी है, जैसा कि 2011 में ओसामा वाली घटना के दौरान हुआ था.

ऐसे में यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि इससे ‘असली शरीफ’ यानि आर्मी प्रमुख जनरल राहिल शरीफ की लोकप्रियता पर क्या असर पड़ेगा. इसके मद्देनजर एक संकेत यह भी है कि आईएसपीआर और इसके प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल असीम बाजवा, जो सेना की उपलब्धियों को ट्वीट करने के लिए बेकरार रहा करते हैं, 21 मई के बाद से सामने नहीं आ रहे हैं.

एक बात चीन के बारे में

पिछले हफ्ते जनरल शरीफ चीन में थे और 17 मई को लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा ने ट्वीट किया था, “चीन के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व ने भरोसा दिलाया है कि पाकिस्तान की संप्रभुता, अखंडता, राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास की बहाली में चीन मदद करेगा.” चूंकि पाकिस्तान ने इस ड्रोन हमले को ‘अपनी संप्रभुता का उल्लंघन’ बताया है, तो क्या अब पाकिस्तानी सेना चीन से इसकी संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए कहेगी?

First published: 25 May 2016, 7:35 IST
 
तिलक देवाशर @catchhindi

Tilak Devasher retired as Special Secretary, Cabinet Secretariat, to the Government of India. His book Pakistan: Courting the Abyss is releasing shortly.

पिछली कहानी
अगली कहानी