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ढाका में हमले के गहरे संदेश भारत के लिए हैं

पिनाक रंजन चक्रवर्ती | Updated on: 4 July 2016, 7:41 IST

बांग्लादेश की राजधानी ढाका के एक अतिसंवेदनशील क्षेत्र में स्थित लोकप्रिय रेस्टोरेंट पर शुक्रवार की देर रात हुआ आतंकवादी हमला बिल्कुल भी अप्रत्याशित नहीं है. यह हमला बीते तीन वर्षो के दौरान बांग्लादेश में हिंदू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों के मानने वाले कई धर्मनिरपेक्ष ब्लागरों और गैर-मुसलमान धर्मगुरुओं की निर्मम हत्याओं के बाद हुआ है.

आतंकवादी रेस्टोरेंट में ‘अल्लाह-ओ-अकबर’ (अल्लाह महान है) के नारे लगाते हुए घुसे और अपने धार्मिक जुड़ाव और जिहाद के प्रति प्रतिबद्धता को लेकर किसी के भी मन-मस्तिष्क में तनिक भी संदेह नहीं छोड़ा. वे आधुनिक हथियारों से लैस थे और अपने मकसद के लिये जान देने को भी तैयार थे.

इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने इस आतंकी घटना की जिम्मेदारी ली है. इससे पहले आईएस ने मुसलमानों से रमजान के पवित्र महीने में सूर्यास्त के समय ऐसे हमले करने का आह्वान किया था क्योंकि इस समय लोग अपना दिन भर का रोजा तोड़कर सड़कों और रेस्टोरेंट इत्यादि का रुख करते हैं.

होली आर्टिसन बेकरी नामक यह रेस्टोरेंट ढाका के पाॅश आवासीय और वाणिज्यिक क्षेत्र गुलशन इलाके में स्थित है जो बरिंधारा डिप्लोमेटिक एन्क्लेव के नजदीक है. यहां अधिकतर विदेशी दूतावास स्थित हैं और विदेशियों का आवागमन यहां काफी रहता है. इसकी शानदार लोकेशन और स्वादिष्ट महाद्विपीय भोजन को देखते हुए बड़ी संख्या में बांग्लादेशी और विदेशी नागरिक इस रेस्टोरेंट की रौनक बढ़ाने पहुंचते हैं.

यानी आतंकियों ने अपना लक्ष्य बड़े ध्यान से चुना था. विदेशी नागरिकों की हत्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व सुर्खियां दिलवाती है. पश्चिमी विदेशी मीडिया ने इस आतंकी हमले कोे व्यापक कवरेज दी और कईयों ने तो इन आतंकियों को मात्र ‘‘बंदूकधारी’’ ही कहा.

अक्सर देखा गया है कि जब भी किसी गैर-पश्चिमी देश में ऐसी कोई आतंकी गतिविधि होती है तो पश्चिमी मीडिया एक सुविचारित नीति के तहत इन आतंकियों को ‘बंदूकधारी’ कहकर पेश करता है. लेकिन अगर इसी तरह की घटना पश्चिमी देशों के किसी शहर में घटी होती तो इन हमलावरों को शुरुआत से ही ‘बंदूकधारी’ नहीं बल्कि आतंकवादी कहा गया होता.

वार्ता के माध्यम से इस बंधक संकट का हल निकालने में विफल रहने के बाद बांग्लादेशी सुरक्षा बलों के कमांडों ने रविवार की अल-सुबह इस रेस्टोरेंट पर हमला बोला और छह आतंकियों को धराशायी करते हुए एक जापानी और दो श्रीलंकाई नागरिकों सहित कुल 13 लोगों को बचा लिया. इसके अलावा एक आतंकी को भी जिंदा दबोच लिया गया.

आतंकियों ने रेस्टोरेंट में कुल 20 लोगों की जान ली जो कि गैर-मुस्लिम थे. इसके अलावा उनकी गोलीबारी का सबसे पहले सामना करने वाले दो पुलिसकर्मियों को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. मरने वाले अधिकतर डाइनर इटली और जापान के नागरिक थे और वे सिर्फ इन कट्टरपंथी इस्लामवादियों के खून और हिंसा के जरिये दुनिया में अपना खौफ पैदा करने के आकर्षण के चलते मौत के आगोश में चले गए.

अपने माता-पिता के साथ ढाका में छुट्टियां बिताने गई गई एक 19 वर्षीय भारतीय युवती भी इन आतंकियों का शिकार बनी.

इसके अलावा आतंकियों ने 35 लोगों को बंधक बनाया. जिस समय यह बंधक संकट चल रहा था उसी समय पश्चिम बंगाल की सीमा से लगे सतिख्रा में एक हिंदू पुजारी की मंदिर के अंदर ही हत्या कर दी गई. इससे पहले बीते सप्ताह झेनियादाह क्षेत्र में भी एक अन्य हिंदु पुजारी की उसके मंदिर के भीतर ही हत्या कर दी गई थी.

ये कट्टरपंथी इस्लामवादी आराम से अपने निशाने चुन रहे हैं और उन्हें यह बात अच्छे से पता है कि बांग्लादेश की सरकार और सुरक्षा बल रेस्टोरेंट, माॅल और सड़कों इत्यादि जैसे सार्वजनिक स्थानों पर निकले और एकत्र हुए लोगों की रक्षा नहीं कर सकती.

आंखें खोलने का समय

ढाका में हुआ हमला बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के लिये आंखें खोलने वाली घटना साबित होनी चाहिये ताकि वे गंभीरता से देश की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को अस्थिर करने का काम कर रहे कट्टरपंथी इस्लामवादियों और उनके अंतरराष्ट्रीय समर्थकों को लेकर गंभीरता से विचार कर सकें.

यह हमला कट्टरपंथी इस्लामी हिंसा के स्तर को और आगे ले जाने के मकसद से किया गया है. पूर्व में हुए व्यक्तिगत हमले छोटे-मोटे हथियारों से लैस हमलावरों द्वारा अंजाम दिये गए थे लेकिन इस बार तो हमलावर ग्रेनेड और स्वचालित हथियारों से पूरी तरह से लैस थे.

यह हमले के निहितार्थ भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और सुरक्षाबलों के लिए भी काफी गहरे हैं. विशेषकर बांग्लादेश के सीमावर्ती राज्यों में. वास्तव में भारत सरकार ने इन सभी राज्यों को अलर्ट कर दिया है.

एक टीवी संबोधन में हसीना ने इस हमले को पूरी तरह से इस्लाम विरोधी घोषित किया. उन्होंने ऐसे हमलों से निबटने की कसम खाते हुए नागरिकों से आगे आने और सरकार का सहयोग करने की अपील की. इसके अलावा उन्होंने वही घिसा-पिटा, आतंकियों का कोई धर्म न होने वाला तर्क भी दिया. इसके बावजूद सच्चाई यही है कि इस हमले को अंजाम देने वाले इस्लाम में विश्वास करते थे और उन्हें पूरा विश्वास था कि इस हिंसक जिहाद के जरिये वे अल्लाह का दिया हुआ काम पूरा कर रहे हैं.

हसीना के शासनकाल में कई इस्लामी दलों और कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई की गई है. उन्होंने विपक्षी दलों पर इन कट्टरपंथी इस्लामवादियों और अपराधियों के साथ हाथ मिलाकर ऐसे हमलों के माध्यम से सरकार को कमजोर करने का आरोप लगाया है. जमात-ए-इस्लामी के कई नेताओं को फांसी पर लटकाने का उनका फैसला उनके इस तर्क को कुछ मजबूती देता है. हालांकि ये सभी दल और समूह इन आरोपों से इंकार करते आए हैं.

खतरे का निशान

यह अभी भविष्य के गर्भ में है कि यह ताजा हमला आईएस या अल-कायदा के निर्देश पर अंजाम दिया गया, लेकिन इस बात को लेकर कोई शक नहीं है कि हमलावर स्थानीय थे और वे अच्छी तरह से प्रशिक्षित नहीं थे. हसीना के बयान वैश्विक संबंधों की ओर इशारा करते हैं जो पाकिस्तान, कनाडा, यूके, यूएस और खाड़ी के देशों से संचालित हो रहे हैं.

माना जाता है कि एक बड़ी बांग्लादेशी आबादी इन देशों में प्रवासियों के रूप में रह रही है. कई प्रवासी वैचारिक रूप हसीना के विरोध में हैं और मानते हैं कि सिर्फ हिंसा के माध्यम से ही उनकी सरकार गिराई जा सकती है. हाल ही में सिंगापुर ने अपने देश में हिंसा की साजिश रचने में शामिल पाए गए कई बांग्लादेशी श्रमिकों को अपने यहा से वापस बांग्लादेश निर्वासित किया है.

हो सकता है कि अल कायदा या आईएस ने इस हमले के लिये उन्हें प्रेरणा दी हो, लेकिन पैसे और हथियार हसीना सरकार के विरोधी तत्वों की मदद से प्राप्त किये गए हो सकते हैं. निश्चित ही पाकिस्तान के पास पर्दे के पीछे से इस्लामी दलों के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के नेतृत्व वाली मुख्यधारा की पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सहायता से हसीना सरकार को गिराने के लिये पर्याप्त आधार है.

1971 की बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी सेना के इशारे पर अत्याचार करने के दोषी पाए गए जमात-ए-इस्लामी के नेताओं को फांसी दिये जाने के बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान के संबंध इस समय बेहद खराब स्थिति में हैं. इन फांसियों पर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने मित्रों और सहयोगियों की व्यवस्थित फांसी से काफी नाराज है.

इसके अलावा कट्टरपंथी इस्लामवादियों और भारतीय विद्रोही गुटों के खिलाफ हसीना के कड़े रुख ने पाकिस्तान की बांग्लादेशी सरजमीं के माध्यम से भारतीय पूर्वोत्तर को अस्थिर करने की नीति को झटका दिया है.

बांग्लादेश इस समय कट्टरपंथी इस्लामी हिंसा के जरिए अस्थिरता की ओर बढ़ रहा है. खुद को इनसे बचाने के क्रम में उसे बेहतर खुफिया नेटवर्क तैयार करने के अलावा उदारवादी इस्लामी समूहों को बढ़ावा देना होगा और कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी. इसका सीधा मतलब होगा कट्टरता को बढ़ावा देने वाले मदरसों और दूसरे शैक्षणिक संस्थानों की कड़ी निगरानी करना और छात्रों को कट्टरता के खिलाफ शिक्षित करना.

इस प्रयास की सफलता को सुनिश्चित करने के लिये भारत और अन्य मित्र देशों को बांग्लादेश को तकनीकी और भौतिक सहायता देने की जिम्मेदारी को भी लेना होगा. आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई बिना अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नहीं लड़ी जा सकती.

बांग्लादेश जैसे कमजोर देशों की मदद करने के अलावा वैश्विक समुदाय को उन देशों को भी चिन्हित करना होगा जो अपने भू-राजनीतिक लक्ष्यों को पाने के लिये एक उपकरण के रूप में आतंकवाद का सहारा लेते हैं और यह सुनिश्चित करना होगा के वे सभ्य समाज और विश्व के नियमों के मुताबिक व्यवहार करें.

First published: 4 July 2016, 7:41 IST
 
पिनाक रंजन चक्रवर्ती @catchnews

फ़ेलो, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन, दिल्ली. भारत के पूर्व विदेश सचिव, बांग्लादेश के पूर्व भारतीय उच्चायुक्त और थाईलैंड में पूर्व भारतीय राजदूत रह चुके हैं.

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