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महान वैज्ञानिक आइंस्टीन ने गांधी को लेकर क्यों कही थी ये बड़ी बात

आकांक्षा अवस्थी | Updated on: 15 March 2018, 11:48 IST

दुनिया के सबसे महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्म आज ही के दिन साल 1879 में हुआ था. आइंस्टीन की सबसे बड़ी खासियत उनकी सीखने की प्रवृति थी. आइंस्टीन की जिंदगी में सीखने का सिलसिला 5 साल की उम्र में शुरू हुआ. फिजिक्स की सबसे फेमस इक्वेशन यानी E=mc² को आइंस्टीन ने ही ईजाद किया था.

आइंस्टीन की महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की उनका थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी पर लिखा हुआ नोट 67 लाख में नीलम हुआ. 1928 में लिखा ये नोट 67 लाख रुपए में नीलाम हुआ. थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी में आइंस्टीन ने भौतिक विज्ञान के नियमों और प्रकाश की गति पर शोध किए थे.

आइंस्टीन के घर में थी महात्मा गांधी की तस्वीर

शुरुआती दौर में उन्होंने दो महान वैज्ञानिकों को ही अपना आदर्श माना था. और ये दो वैज्ञानिक थे- आइज़क न्यूटन और जेम्स मैक्सवेल. उनके कमरे में इन्हीं दो वैज्ञानिकों की पोर्ट्रेट लगी रहती थीं.

लेकिन अपने सामने दुनिया में तरह-तरह की भयानक हिंसक त्रासदी देखने के बाद आइंस्टीन ने अपने घर में लगे इन दोनों पोर्ट्रेट के स्थान पर दो नई तस्वीरें टांग दीं. इनमें एक तस्वीर थी महान मानवतावादी अल्बर्ट श्वाइटज़र की और दूसरी थी महात्मा गांधी की. इसे स्पष्ट करते हुए आइंस्टीन ने उस समय कहा था- ‘समय आ गया है कि हम सफलता की तस्वीर की जगह सेवा की तस्वीर लगा दें.’

आइंस्टीन महात्मा गांधी से उम्र में केवल 10 साल छोटे थे. वे दोनों व्यक्तिगत रूप से कभी एक-दूसरे से मिले नहीं. लेकिन एक बार पत्रों से उनकी बातचीत जरूर हुई थी.

आइंस्टीन के आदर्श श्वाइटज़र खुद भी महात्मा गांधी के दर्शन को एक अलग संसार मानते थे. श्वाइटज़र ने भारत पर केंद्रित अपनी पुस्तक ‘इंडियन थॉट एंड इट्स डेवलपमेंट’ में लिखा- ‘गांधी का जीवन-दर्शन अपने आप में एक संसार है’. उन्होंने आगे लिखा- ‘गांधी ने बुद्ध की शुरू की हुई यात्रा को ही जारी रखा है. बुद्ध के संदेश में प्रेम की भावना दुनिया में अलग तरह की आध्यात्मिक परिस्थितियां पैदा करने का लक्ष्य अपने सामने रखती है. लेकिन गांधी तक आते-आते यह प्रेम केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि समस्त सांसारिक परिस्थितियों को बदल डालने का कार्य अपने हाथ में ले लेता है.’

लेकिन एक बार आत्मीयतापूर्ण पत्राचार अवश्य हुआ. यह चिट्ठी आइंस्टीन ने 27 सितंबर, 1931 को वेल्लालोर अन्नास्वामी सुंदरम् के हाथों गांधीजी को भेजी थी. इस चिट्ठी में आइंस्टीन ने लिखा- ‘अपने कारनामों से आपने बता दिया है कि हम अपने आदर्शों को हिंसा का सहारा लिए बिना भी हासिल कर सकते हैं. हम हिंसावाद के समर्थकों को भी अहिंसक उपायों से जीत सकते हैं. आपकी मिसाल से मानव समाज को प्रेरणा मिलेगी और अंतर्राष्ट्रीय सहकार और सहायता से हिंसा पर आधारित झगड़ों का अंत करने और विश्वशांति को बनाए रखने में सहायता मिलेगी. भक्ति और आदर के इस उल्लेख के साथ मैं आशा करता हूं कि मैं एक दिन आपसे आमने-सामने मिल सकूंगा.’

गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गए गांधीजी ने 18 अक्टूबर, 1931 को लंदन से ही इस पत्र का जवाब आइंस्टीन को लिखा. अपने संक्षिप्त जवाब में उन्होंने लिखा- ‘प्रिय मित्र, इससे मुझे बहुत संतोष मिलता है कि मैं जो कार्य कर रहा हूं, उसका आप समर्थन करते हैं. सचमुच मेरी भी बड़ी इच्छा है कि हम दोनों की मुलाकात होती और वह भी भारत-स्थित मेरे आश्रम में.’

2 अक्टूबर, 1944 को महात्मा गांधी के 75वें जन्मदिवस पर आइंस्टीन ने अपने संदेश में लिखा था, ‘आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था’

गांधी जी की मृत्यु पर लिखे संदेश में आइंस्टीन ने कहा था, ‘लोगों की निष्ठा राजनीतिक धोखेबाजी के धूर्ततापूर्ण खेल से नहीं जीती जा सकती, बल्कि वह नैतिक रूप से उत्कृष्ट जीवन का जीवंत उदाहरण बनकर भी हासिल की जा सकती है’


गांधी जी के बारे में आइंस्टीन का कहना था, ‘उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में भी मानवीय संबंधों की उस उच्चस्तरीय संकल्पना का प्रतिनिधित्व किया जिसे हासिल करने की कामना हमें अपनी पूरी शक्ति लगाकर अवश्य ही करनी चाहिए’

आइंस्टीन ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘साइंस, फिलॉसॉफी एंड रिलीजन’ में शुद्ध धार्मिक व्यक्ति की पहचान ऐसे व्यक्ति के रूप में की थी ‘जो निजी आशाओं और आकांक्षाओं के बन्धन से मुक्त होकर चलने का प्रयास करता है. जो प्रकृति में निहित तार्किकता को विनम्रता से पहचानते हुए चलता है. जिसने स्वयं को स्वार्थों से मुक्त कर लिया है और ऐसे विचारों तथा भावनाओं में लीन रहता है, जो निज से परे होती हैं.’

गांधीजी ने इस पत्र का जवाब आइंस्टीन को लिखा. उन्होंने लिखा- ‘प्रिय मित्र, इससे मुझे बहुत संतोष मिलता है कि मैं जो कार्य कर रहा हूं, उसका आप समर्थन करते हैं. सचमुच मेरी भी बड़ी इच्छा है कि हम दोनों की मुलाकात होती और वह भी भारत-स्थित मेरे आश्रम में.’

2 अक्टूबर, 1944 को महात्मा गांधी के 75वें जन्मदिवस पर आइंस्टीन ने अपने संदेश में लिखा था, ‘आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था’

गांधी जी की मृत्यु पर लिखे संदेश में आइंस्टीन ने कहा था, ‘लोगों की निष्ठा राजनीतिक धोखेबाजी के धूर्ततापूर्ण खेल से नहीं जीती जा सकती, बल्कि वह नैतिक रूप से उत्कृष्ट जीवन का जीवंत उदाहरण बनकर भी हासिल की जा सकती है’

गांधी जी के बारे में आइंस्टीन का कहना था, ‘उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में भी मानवीय संबंधों की उस उच्चस्तरीय संकल्पना का प्रतिनिधित्व किया जिसे हासिल करने की कामना हमें अपनी पूरी शक्ति लगाकर अवश्य ही करनी चाहिए’

आइंस्टीन ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘साइंस, फिलॉसॉफी एंड रिलीजन’ में शुद्ध धार्मिक व्यक्ति की पहचान ऐसे व्यक्ति के रूप में की थी ‘जो निजी आशाओं और आकांक्षाओं के बन्धन से मुक्त होकर चलने का प्रयास करता है. जो प्रकृति में निहित तार्किकता को विनम्रता से पहचानते हुए चलता है. जिसने स्वयं को स्वार्थों से मुक्त कर लिया है और ऐसे विचारों तथा भावनाओं में लीन रहता है, जो निज से परे होती हैं.’

First published: 15 March 2018, 11:48 IST
 
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