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हमारे क़िस्सों और दास्तानों का एक शहर अलेप्पो दफ़न हो गया

नग़मा सहर | Updated on: 16 December 2016, 7:52 IST
(फ़ाइल फोटो )
QUICK PILL
  • तक़रीबन साढ़े चार साल पहले सीरिया के सबसे पुराने शहर अलेप्पो में शुरू हुई जंग अब ख़त्म हो गई है. 
  • इस जंग ने ना सिर्फ़ हज़ारों सीरियाई नागरिकों का खून बहाया बल्कि सुनहरे इतिहास वाला एक शहर भी लगभग ज़मींदोज़ हो गया.

सीरिया के सबसे पुराने और ख़ूबसूरत शहर अलेप्पो में बशर अल असद की सरकार दोबारा क़ाबिज़ हो गई है. चार साल चार महीने से चल रही अलेप्पो की जंग तुर्की और रूस के बीच हुई एक डील के तहत महज़ चंद घंटों के लिए थमी. अलेप्पो के बाशिंदों ने अमन की सांस ली ही थी कि गोलियां फिर चलने लगीं...बम फिर बरसने लगे और क़रार टूट गया. 

असद की सरकार ने उन लोगों के नामों की लिस्ट मांगी जो अलेप्पो छोड़ कर जाने वाले थे. तुर्की इसके लिए तैयार नहीं था क्योंकि अलेप्पो खाली करवाने के बहाने उसे अपने भी लड़ाकों को शहर से बाहर निकालना था. 

सीरिया में यह जंग छह साल पहले शुरू हुई. यहां आतंकी कौन है और विद्रोही कौन, ये भी इस पर निर्भर करता है कि आप किस के हवाले से ख़बर पा रहे हैं. पश्चिमी मीडिया जिसमें सीएनएन, बीबीसी सभी शामिल हैं, वो असद के ख़िलाफ़ लड़ने वालों को विद्रोही मानते हैं. मगर सीरियाई न्यूज़ एजेंसी, रूस या ईरान की न्यूज़ एजेंसी इन्हें आतंकवादी मानती है.

यहां आतंकी कौन है और विद्रोही कौन, ये इस पर निर्भर करता है कि आप किस के हवाले से ख़बर पा रहे हैं

असद के ख़िलाफ़ लड़ने वालों में इस्लामिक स्टेट के अलावा 140 और गुट हैं. जैसे फ्री सीरियन आर्मी और जबहात अल शाम जो पहले सीरिया में अल क़ायदा का सहयोगी था. इनके लड़ाकों में सीरियाई कम अफ़गानिस्तान, सूडान, पाकिस्तान के लोग ज़्यादा हैं. 

असद की सेना ने लोगों को बाहर निकालने के लिए हुई डील तोड़ी तो लोगों को लाइन में खड़ा करके ख़त्म कर दिया गया. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि इंसानी हक़ों को यहां दफ़न कर दिया गया है. सीरिया की सरकार संयुक्त राष्ट्र को इजाज़त नहीं दे रही कि अलेप्पो को खाली करवाने का काम उसकी निगरानी में हो.

बग़ावत के बीज

छह साल पहले असद के ख़िलाफ़ जो बग़ावत शुरू हुई उसमें अमेरिका ने विद्रोहियों को खड़ा किया और हुक़ूमत के ख़िलाफ़ उनका समर्थन किया. सीरिया को जंग का अखाड़ा बनाकर रूस और अमेरिका की नूराकुश्ती यहां चल रही थी. जबकि रूस हमेशा से असद के साथ रहा. वो नहीं चाहता कि असद की सरकार जाए. असद सत्ता से हटते तो वहां की गैस पर किसी और का क़ब्ज़ा हो जाता जो रूस के हित में नहीं है. वो यूरोप को अपनी गैस पर निर्भर रखना चाहता है.

नतीजा यह हुआ कि असद के ख़िलाफ़ विद्रोह पूरी तरह से इस्लामिक आतंकियों के हाथ में चला गया. इस्लामिक स्टेट से लेकर फ्री सीरियनन आर्मी तक. इसने इस पूरे इलाक़े में इस्लामिक कट्टरपंथ को और बढ़ावा दिया. 

अगर आप पश्चिमी मीडिया को पढ़ेंगे तो अलेप्पो की तबाही के ज़िम्मेदार तीन लोग हैं. पुतिन, असद और ईरान. 2011 में असद ने विद्रोहियों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के ख़िलाफ़ एक खूंखार जंग छेड़ दी. 4 लाख सीरियाई नागरिक मारे गए और लाखों यूरोप में पनाह मांगने पहुंचे. मगर सवाल यह है कि क्या असद पुतिन और कुछ हद तक ईरान की मदद के बग़ैर टिक सकते थे?

अब ट्रंप साहब जो पुतिन से हमदर्दी रखते हैं, क्या पुतिन से इस ख़ून-ख़राबे को बंद करने की अपील करेंगे? यहां यह भी याद दिलाना ज़रूरी है कि अमेरिका ही ने असद के ख़िलाफ़ विद्रोहियों को खड़ा किया और ओबामा ने उन्हें हथियार दिए. 

अब जब इन सियासी विद्रोहियों और इस्लामिक स्टेट में फर्क़ मुश्क़िल है तो अमेरिका उनके ख़िलाफ़ लड़ रहा है. टकराव की शुरुआत में जब सुरक्षा परिषद में असद पर कूटनीतिक दबाव डाला जा सकता था, रूस ने अपना वीटो इस्तेमाल कर असद को आलोचना से बचाया. यहां अमेरिका और रूस का खेल चल रहा था पर पिस रहे थे आम सीरियाई.

अक्टूबर 2015

अक्टूबर 2015 में जब लगने लगा कि असद हार रहे थे तो रूस अपने जंगी जहाज़ और सैनिक भेजकर सीधे लड़ाई में कूद पड़ा. असद सरकार की तरफ़ से रूस उन गुटों से लड़ने लगा जो अमेरिका और अरब देशों ने तैयार किए थे. ईरान के समर्थन से हिज़्बुल्लाह ने भी अपने 5 हज़ार लड़ाके यहां तैनात कर दिए और नतीजतन इस्लामिक स्टेट ने सीरिया में अपनी जड़ें और मज़बूत की. 

इसके बाद ओबामा ने असद से गद्दी छोड़ने की मांग की लेकिन अमेरिकी कांग्रेस और लोगों को मंज़ूर नहीं था कि अब अमेरिका किसी नए देश में मिलिट्री दख़ल दे. सीरिया का हल निकाले बिना प्रेसिडेंसी को अलविदा कहना ओबामा को चुभता रहेगा. 

मगर इस जंग की बहुत भारी क़ीमत चुकानी पड़ी है सीरिया के लोगों को. अलेप्पो जैसा शहर तहस-नहस हो गया. ना विरासत बची ना इंसानियत. बल्कि पश्चिमी एशिया में चल रही इन जंगों ने ईराक़, सीरिया के उन तमाम इतिहास को ख़त्म कर दिया जिनसे हमारे क़िस्से और दास्तान बुने गए थे. 

अलेप्पो पर हुक़ूमत की जीत इस 6 छह साल की जंग में बहुत अहम है लेकिन इससे ना हिंसा ख़त्म होगी और ना ही असुरक्षा के हालात. इस जीत ने असद को ईरान और रूस का और मोहताज बनाया है. 

मुल्क़ बरबाद हुआ, उसका सामाजिक तानाबाना बिखर गया, ये अलग किस्म का दर्द है. 

हिंसा यहीं नहीं रुकेगी. अगली बारी पलमेयरा पर वापस क़ब्ज़े की है. 

First published: 16 December 2016, 7:52 IST
 
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