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अमरीकियों का सपना: ट्रंप या मार्टिन लूथर किंग?

रमिन जहानबेगलू | Updated on: 24 September 2016, 7:23 IST
QUICK PILL
  • संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव के अभियान को तब तक समझना मुश्किल है, जब तक कि हम 1941 में ‘लाइफ’ मैगजीन में प्रकाशित हेनरी ल्यूस के आलेख ‘द अमेरिकन सेंचुरी’ की अवधारणा को नहीं समझ लें.
  • हेनरी ल्यूस की अपील को कइयों ने अमरीका को विश्व में सैनिक प्रभुत्व वाला देश बनाने की मांग के रूप में ले लिया. पर जो सबसे अहम है, वह यह कि ल्यूस ने अमेरिकन सेंचुरी कीएक टिपिकल अभिव्यक्ति के जरिए अमरीका में एक नई व्यवस्था के स्वप्न का प्रतिनिधित्व किया.

संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव के अभियान को तब तक समझना मुश्किल है, जब तक कि हम 1941 में ‘लाइफ’ मैगजीन में प्रकाशित हेनरी ल्यूस के आलेख ‘द अमेरिकन सेंचुरी’ की अवधारणा को नहीं समझ लें. अपने प्रसिद्ध आलेख में ल्यूस ने अमरीका को इस रूप में देखा है, ‘हरदम बढ़ते उद्यमों का गतिशील केंद्र, मानवता के कुशल सेवकों का प्रशिक्षण केंद्र, नेक आदमी, जो लेने की बजाय देने में अपना सौभाग्य मानते हैं, और स्वतंत्रता एवं न्याय के आदर्शों का पावरहाउस.’

हेनरी ल्यूस की अपील को कइयों ने अमरीका को विश्व में सैनिक प्रभुत्व वाला देश बनाने की मांग के रूप में ले लिया. पर जो सबसे अहम है, वह यह कि ल्यूस ने अमेरिकन सेंचुरी की एक टिपिकल अभिव्यक्ति के जरिए अमरीका में एक नई व्यवस्था के सपने का प्रतिनिधित्व किया. 

जो संभावनाएं ल्यूस ने 1941 में देखीं, सात दशकों से ज्यादा समय बाद भी ऐसी सच्चाई बन गई है, जिसे टाला नहीं जा सकता. ‘अमरीका को फिर से महान’ बनाने का सपना राष्ट्र का खास लक्ष्य है, जिसने देश के नागरिकों को एकजुट किया हुआ है.

डोनाल्ड ट्रंप

हमारे लिए यह अचरज की बात नहीं है कि ‘अमरीका को फिर से महान बनाएं’ को डोनाल्ड ट्रंप ने 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए नारे के तौर पर इस्तेमाल किया है. कुछ के लिए यह अंध-देशभक्ति का घिसा-पिटा नारा है, तो कुछ के लिए अच्छा जीवन और उपलब्धियों का प्रतीक. 

इस समय कुछ लोग मानते हैं कि अन्य परंपराओं और संस्कृति का विनाश करने के लिए ‘स्वप्न’ अब तक का खोजा सबसे प्रभावी हथियार सिद्ध हुआ है. 

किसी भी रूप में लें, अमरीका को फिर से महान बनाने का ट्रंप का सपना, अमरीकियों का ही स्वप्न नहीं है, बल्कि उनका भी दु:स्वप्न है, जो न्यू अमेरिकन सेंचुरी से बाहर कर दिए गए हैं. 

कार्ल मार्क्स ने एक बार लिखा था कि ग्रेट अमेरिकन सिविल वॉर के बीज संयुक्त राज्य की स्थापना के दौरान ही बो दिए गए थे. उनका मतलब था संयुक्त राज्य के संविधान में गुलामी का जिक्र नहीं था, और कोई भी श्वेत आजादी या संविधान की प्रस्तावना में ‘हम लोग’ का हिस्सा नहीं थे.

इसी तरह की बहस दक्षिण में जिम क्रो के अलगाववाद के उदय और बाद में संयुक्त राज्य में 1950 और 60 के दशक में डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नागरिक अधिकार के अभियान के दौरान चलीं.

1964-65 के नागरिक और मतदान अधिकार अधिनियम को अपनाने से अंतत: अश्वेत जीते और 44 साल बाद अमरीकियों ने संयुक्त राज्य का पहला अश्वेत राष्ट्रपति चुना. 

जन्म से नागरिकता का विवाद

निश्चित रूप से ओबामा अब तक के श्रेष्ठ राष्ट्रपति नहीं थे, लेकिन बुश प्रशासन और ईराक-अफगानिस्तान आक्रमण के बाद उनकी शख्सियत अमरीका की एक ‘उदार मानसिकता’ वाली छवि देने में जरूर सबसे ज्यादा प्रभावी रही. हालांकि, अचरज की बात नहीं है, 2008 में राष्ट्रपति चुनाव के लिए बराक ओबामा के अभियान के दौरान और उनके राष्ट्रपति काल में, षडय़ंत्र भरे कई विचार सामने आए, इस बात का गलत दावा करते हुए कि वे संयुक्त राज्य में जन्म से नागरिक नहीं हैं और इसलिए राष्ट्रपति पद के योग्य नहीं हैं. 

दूसरे शब्दों में, बराक ओबामा ‘हम लोग’ का हिस्सा नहीं थे जिसे आधुनिक अमरीका के संस्थापकों ने संविधान में रेखांकित और शामिल किया था. 

संयुक्त राज्य के 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए रिपब्लिकन पार्टी की ओर से नामित डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में अंतत: स्वीकारा कि ‘राष्ट्रपति बराक ओबामा संयुक्त राज्य में जन्मे थे’, उस विवाद से खुद को हटाते हुए, जो लगभग पांच साल चला और उन्हें अमरीका की राष्ट्रीय राजनीति में स्थान दिया. 

ट्रंप की अलगाववादी नीति

पर जन्म के विवाद को जिस तरह से ट्रंप ने उछाला, मूर्खतापूर्ण तर्क से कहीं अधिक है, जिसे एक रिपब्लिक उम्मीदवार ने सामने रखा है. यह एक वैचारिक नजरिया है, जो अमरीका में साजिश-केंद्रित और दक्षिणपंथी सीमाओं को भडक़ाता है. वैसे डोनाल्ड ट्रंप उनके निर्वाचित उम्मीदवार हैं, जो खुद को अश्वेत और आप्रवासियों के खिलाफ अमरीका के ‘हम लोग’ मानते हैं. 

इस पर ध्यान दिए बिना कि इसे कोई किस तरह देखता है, ‘हम लोग’ से बाहर किए गए लोग ट्रंप के राष्ट्र का बड़ा हिस्सा हैं...जो अमरीका को एक उच्च स्तर की जातिगत और कौमपरस्त नाराजगी का प्रयोग करके ‘फिर से महान’ देखना चाहता है.

यह समकालीन अमरीकी इतिहास का सबसे अहम समय है, वह समय जब न्यू अमेरिकन सेंचुरी की चुनौती ‘हम लोग’ के स्वप्न को, डर और प्रतिशोध के बिना साथ मिलकर रहने के आम मूल्यों के रूप में पुन: परिभाषित करने की होगी.

प्रतिशोध या आक्रोश में क्या रखा है?

चूंकि प्रतिशोध वह प्राणघाती जुनून है, जिसका किसी भी मानव समाज के लिए कोई भविष्य नहीं है. डोनाल्ड ट्रंप का नया अमरीका दादागिरी और नफरत से फिर महान बनने की सोच रहा है, पर यह उन आप्रवासियों का सपना नहीं है, जो अमरीकी बनना चाहते थे. 

विश्व के लाखों लोगों की तरह वे मानते हैं कि अमरीका ने एक सदी से ज्यादा समय से स्वतंत्रता की भूमि और एक नई नींव पर स्थापित समाज का प्रतिनिधित्व किया है, जो कट्टरता और पूर्वाग्रहों से नहीं, बल्कि उदारता और आतिथ्य से एक है. वह भूमि, जो किसी भी नए अनुभव के लिए तैयार है.

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने जोर दिया कि अमरीकी खुद आजाद नहीं हो सकते, जब तक कि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमरीका के गरीब देशों के लोग आजाद नहीं हों. सभी जानते हैं कि अमरीकी समाज में अलगाववाद के खिलाफ किंग का संघर्ष प्यार और डर पर जीत पर जोर देते हुए हाथों हाथ आगे बढ़ा.

ट्रंप के न्यू अमेरिकन सेंचुरी के स्वप्न के उलट, जो अमरीका को दो हिस्सों में बांट कर रहे हैं, दोस्त और दुश्मन की राजनीति खेल रहे हैं, किंग भली भांति समझ गए कि यदि अमरीका के बंटे समुदाय को जोड़ना है, तो सत्ता के लिए प्यार की जगह प्यार की सत्ता को लाना होगा. उन्होंने अक्सर अपने मिशन को ‘प्रिय समुदाय’ की तलाश बताया, जो मुख्य रूप से आपसी कद्र, सामंजस्य और सबको साथ लेकर चलने की भावना पर आधारित हो.

बेशक किंग का सबको शामिल करने और अंतरनिर्भरता की जागरूकता एक भिन्न अमरीकी समुदाय को परिभाषित और आकार देने के लिए आदर्श बना हुआ है.

यदि किंग ट्रंप से मिले होते, तो वे उनसे अपनी किताब ‘ट्रंपेट ऑफ कॉन्शंस’ में लिखी बात को दुहराते, ‘नफरत की इच्छा करके मैंने खुद ने काफी नफरत देखी है, और हर बार जब मैं इसे देखता हूं, खुद से कहता हूं, नफरत सहना बेहद तकलीफदेह है...हम ना केवल अपने लिए आज़ादी जीतेंगे, हम आपके दिल और अंतरात्मा से अपील करेंगे कि हम इस प्रक्रिया में आपको जिताएंगे और हमारी जीत दोहरी जीत होगी.’ 

First published: 24 September 2016, 7:23 IST
 
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