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इस प्राचीन शहर मोसुल पर हुक़ूमत किसकी होगी?

आरएस काल्हा | Updated on: 27 October 2016, 7:56 IST
(एजेंसी)
QUICK PILL
  • मोसुल इराक का दूसरा सबसे बड़ा शहर है. यह शहर राजधानी बगदाद से उत्तर की दिशा में लगभग 390 किमी दूर है.
  • मोसुल बगदाद से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. दोनों शहरों को जोड़ने के लिए सड़क की चार लेन की कनेक्टिविटी है.
  • यह सड़क मार्ग तुर्की-इराक सीमा पर स्थित झाखू के पास जाकर खत्म होता है. यहां हुकूमत किसकी होगी, इसके लिए जंग जारी है.

यह नवजात इराकी राष्ट्रवाद का केन्द्र है और ऐसा शहर भी जहां से इराकी सैन्य अधिकारी रहकर अपनी योजनाओं का सफलतापूर्वक संचालन करते हैं. सन 1932 में ब्रिटेन ने इराक को स्वतंत्र घोषित किया था लेकिन इराक़ी मामलों में ब्रितानी दख़ल बना रहा. 1958 में हुए सैनिक तख्तापलट की वजह से इराक में गणतांत्रिक सरकार बनी, पर 1968 में समाजवादी अरब आंदोलन ने इसका अंत कर दिया.

बाथ पार्टी इस आंदोलन की प्रमुख रही जिसका सिद्धांत देश को दुनिया के नक्शे पर लाना और आधुनिक अरबी इस्लामिक राष्ट्र बनाना था. सद्दाम के कार्यकाल में, उन्होंने मोसुल को हमेशा ही राजनीतिक रूप से सतर्क बनाए रखा. इराकी सेना की मोसुल बिग्रेड पर कमांड के लिए उनके अति विश्वसनीय सैन्य अधिकारी ही तैनात थे.

मोसुल

मोसुल एक अति प्राचीन शहर है. इस शहर की पहचान असीरियान काल से ही महान सभ्यता के रूप में रही है. नीनवा के ऐतिहासिक स्थल अपनी सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन सभ्यता के लिए मशहूर हैं. प्राचीन असीरियाई साम्राज्य के खंडहर अभी भी मौजूद हैं. 

प्राचीन काल से ही मोसुल रणनीतिक भौगोलिक स्थिति के कारण व्यापार और व्यापार का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है. मध्य एशिया, पर्सिया और भारत से आने वाले व्यापारियों का कारवां इसी रास्ते से गुजरता था. यूरोप जाने के लिए भी यहीं से जाना पड़ता था. वस्तु विनिमय का मुख्य जरिया कपड़ा था. मलमल के कपड़े को अंग्रेजी में  'मसलिन'  कहा जाता है. इसी के आधार पर शहर का नाम मोसुल पड़ा है.

शुरुआती दिनों में इराक में सर्वाधिक जनसंख्या इसाइयों की थी. यहां चर्च, मस्जिद, किले, महल, मठ और कई प्राचीन ऐतिहासिक स्थल थे जो इस शहर की सुन्दरता में चार चांद लगाते थे. सचमुच में यह बहुत बड़ी त्रासदी ही होगी कि अगर आईएसआईएस अपनी गतिविधियां वहां फैला लेता है. वह मोसुल की प्राचीन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को तबाह कर रहा है. यह मानवता का बहुत बड़ा नुकसान होगा.

इस्लामिक स्टेट

कहा जाता है कि आईएसआईएस बड़ी आसानी से मोसुल को इराकी सेना से अपने कब्जे में ले सकता है. शिया और सुन्नी का झगड़ा जगजाहिर है. शिया की अगुवाई वाली बगदाद सरकार इसके लिए आंशिक रूप से तैयार थी. अमरीका द्वारा वर्ष 2003 में सैन्य कार्रवाई में सद्दाम सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद से इराकी शियाओं ने जश्न मनाया था. 

सुन्नी अपने सभी सैन्य और सरकारी अधिकारों से वंचित हो गए थे. उत्तरी इराक के इस हृदयस्थल से भी सत्ता से बेदख़ल होने को सुन्नी कभी पचा नहीं सके. इसके अलावा वे बगदाद सरकार के शियाओं से नफरत करने लगे. उनका शियाओं के नेतृत्व वाली बगदाद सरकार के कामों में रुकावट डालना जारी रहा. 

इसका सीधा नतीजा उस कुबूलनामे के रूप में देखा सकता है जो फल्लुजा, रमादी और खालीडिया के सुन्नियों के साथ घटित हुआ है. सुन्नी बाहुल्य इन शहरों को बगदाद सरकार की शिया नागरिक सेना द्वारा 'स्वतंत्र' घोषित किया गया था. अधिकांश सुन्नी इन शहरों के बाहर बने शिविरों में रहने को मजबूर हैं.

इराकी सेना ने वर्तमान में आईएस को उसके गढ़ मोसुल से खदेड़ने के लिए अब तक का सबसे बड़ा अभियान छेड़ा हुआ है. इराकी सेना में 90 फीसदी शिया हैं जिन्हें अमरीकी विशेष बलों, कुर्दिश पेशमेरगा और कुर्द बलों का समर्थन हासिल है. ये बल मोसुल से सटे उत्तर में तैनात हैं. 

अमरीकी वायु सेना भी इसमें सक्रियता से हिस्सा ले रही है. आईएसआईएस के ठिकानों पर बमबारी के लिए दोनों बल मिलकर निशाना साध रहे हैं और अमरीका हवाई और जमीनी मदद मुहैया करा रहा है. इस लड़ाई में भारी संख्या में जनहानि हुई है, मोसुल के भवनों को भी काफी नुकसान पहुंचा है. मोसुल में कितना कुछ बच सका होगा, यह कोई भी अंदाजा लगा सकता है.

अमेरिका

यह तुलना दिलचस्प है कि किस तरह से पश्चिमी देशों के अधिपत्य वाला अंतर्राष्ट्रीय प्रेस सीरिया में पूर्वी एलप्पो और इराक के मोसुल में लड़ाई पर अपनी खबरें दे रहा है. दोनों ही शहरों को सरकारी बलों ने घेर रखा है और उन्हें विदेशी हवाई मदद भी मिली हुई है. कहा जाता है कि पूर्वी एलप्पो में 2,50,000 नागरिक और लगभग 8,000 आतंकी हैं. मोसुल में 10 लाख लोग और लगभग 5,000 आईएसआईएस के लड़ाके हैं. 

अगर हम दोनों संघर्षों की खबरें पढ़ें तो मोसुल में आईएसआईएस को नागरिकों की हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है. पूर्वी एलप्पो में रूसी बमबारी में निर्दोष लोगों को बर्बर तरीके से मौत के घाट उतारा जा रहा है. कोई भी इसका ज़िक्र नहीं करता कि

इराकी शहर रमादी, जो यूफरेट्स नदी के किनारे स्थित है, का 80 फीसदी हिस्सा 2015 में अमरीकी बमबारी में तबाह हो गया था और वहां के सुन्नी आज भी रमादी नहीं लौट सकते हैं क्योंकि उन्हें वहां तैनात हिंसक शिया नागरिक सेना से डर है. इसी तरह 30,000 की आबादी वाले खालीडिया शहर अमरीकी बमबारी में पूरी तरह तबाह हो गया है. यहां सिर्फ चार घर बचे हैं. 

ईरान

हालांकि, असली सवाल फिर भी अनसुलझा रह जाता है कि कौन मोसुल पर शासन करेगा और कब इसे 'स्वतंत्र' किया जाएगा.

इस सवाल का जवाब अमरीका से जल्द नहीं मिलने वाला है. मोसुल को शियाओं की अगुवाई वाली बगदाद सरकार को सौंपने का मतलब होगा कि वह आख़िर में ईरान के प्रभाव में आ जाएगा. शियाओं के पवित्र स्‍थान इराक में करबला, कुफा और नजफ में हैं. बगदाद सरकार की असल ताकत का यही केन्द्र है. ऐसे में ईरान के सह-धार्मिक लोगों के साथ उनकी निकटता बढ़ जाएगी.

ऐसा नहीं हुआ तो इराक की मौलिक एकता को बरकरार नहीं रखा जा सकेगा. और, किसी भी तरह मोसुल को कुर्दों को नहीं सौंपा गया तो इसके खिलाफ टर्की की हिंसक प्रतिक्रिया होगी. अमरीका के लिए किसी भी अरब सुन्नी नेता के हाथों इसे सौंपना काफी मुश्किल होगा जो सभी को स्वीकार्य होगा और जिसे नाम के लिए ही सही मोसुल का गवर्नर बनाया जा सकता हो. इसमें दिक्कत यह होगी कि नए गवर्नर को बगदाद सरकार की बात माननी होगी?

यह अमरीका की दुविधा बन चुकी है कि वह थर्ल्ड वर्ल्ड से कैसे निपटे. इराक तेल से समृद्ध अरब देश है और एक मजबूत केन्द्रीयकृत इराक अमरीकी हितों के लिए हमेशा हानिकारक है. एक कमजोर विखंडित इराक का हमेशा बेजा फायदा उठाया जाता है. हाल के समय मे इराक की कहानी अमरीकी अनिश्चय, हिचकिचाहट की कहानी है. आने वाले समय में इसका कोई साफ़ जवाब नहीं मिलने वाला है.

First published: 27 October 2016, 7:56 IST
 
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