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भारत को अफगानिस्तान को हथियार बेचने में झिझक नहीं होनी चाहिए

विवेक काटजू | Updated on: 18 September 2016, 7:37 IST
QUICK PILL
  • अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी दो दिनों की संक्षिप्त यात्रा पर भारत आए थे और उन्होंने जो कुछ भी कहा उसे भारत ने स्वीकार कर लिया. दिल्ली में गनी ने आतंकवाद और संपर्क को लेकर अपनी बात रखी. 
  • गनी की शुरुआती नीति सुरक्षा और रक्षा के मामले में भारत को दूर रखने की थी. यह सब हामिद करजई के बाद शुरू हुआ.
  • हालांकि अब यह बात साफ हो चुकी है गनी भारत से हथियार चाहते हैं. यात्रा शुरू होने से पहले उन्होंने अपने कुछ सहयोगियों को बताया कि वह भारत से हथियारों की आपूर्ति तेज करने के लिए कहेंगे. 

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी दो दिनों की संक्षिप्त यात्रा पर भारत आए थे और उन्होंने जो कुछ भी कहा उसे भारत ने स्वीकार कर लिया. दिल्ली में गनी ने आतंकवाद और संपर्क को लेकर अपनी बात रखी. 

बलूचिस्तान के मामले को लेकर भारत के एक थिंक टैंक की तरफ से पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि यह युद्ध की तरह है और उन्होंने (पाकिस्तान को) सलाह देते हुए कहा कि ताकत से किसी को साथ नहीं रखा जा सकता. साथ ही उन्होंने कहा कि मीडिया बलोचिस्तान को पर्याप्त कवरेज नहीं दे रहा है.  

तो क्याा गनी का मौजूदा अवतार कूटनितिक चाल है या फिर वह इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं जैसा कि कुछ अफगानी राजनीतिक ताकतें कुछ वर्ष पहले किया करती थी, यह कि अफगानिस्तान के मामलोंं में पाकिस्तान का दखल खत्म नहीं होगा क्योंकि वह अफगानिस्तान की भारत नीति को तय करना चाहता है जिसकी अनुमति कोई अफगानिस्तान की सरकार नहीं दे सकती?

अगर पहली वाली बात है तो गनी पाकिस्तान की तरफ से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने पर तुरंत बदल जाएंगे. भारत के सुरक्षा प्रबंधकों ने गनी के रक्षा और सुरक्षा के प्रति नजरिये में आए बदलाव का स्वागत किया है. बेशक उन्हें इस बात की जानकारी है कि अफगानिस्तान की मौजूदा भारत नीति टैक्टिकल है.

गनी ने भारत में पाकिस्तान के बारे में टिप्पणी की और फिर पाकिस्तान ने उसका जवाब भी दिया. पाकिस्तान ने अफगान नेतृत्व के गैर सहयोगात्मक बयान पर निराशा जताई. 

पाकिस्तान ने कहा कि अफगानिस्तान का बयान पकिस्तान की कोशिशोंं का अपमान करता है. पाकिस्तान ने यह भी आरोप लगाया कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल आतंकवाद के पोषण में किया जा रहा है. बेशक पाकिस्तान का इशारा अफगानिस्तान की तरफ था. 

गनी की शुरुआती नीति सुरक्षा और रक्षा के मामले में भारत को दूर रखने की थी. यह सब हामिद करजई के बाद शुरू हुआ. करजई ने मनमोहन सिंह से यह आग्रह किया था कि भारत रक्षा सहयोग का दायरा केवल प्रशिक्षण और कम घातक हथियारों तक ही सीमित नहीं रखे. 

उन्होंने भारत को उन हथियारों की लंबी सूची सौंपी थी जिसकी जरूरत अफगानी सेना को थी. हालांकि मनमोहन सिंह इस मामले में पाकिस्तान को नाराज करना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने अफगानिस्तान की इस अपील पर कोई जरूरी ध्यान नहीं दिया.

गनी की शुरुआती नीति सुरक्षा और रक्षा के मामले में भारत को दूर रखने की थी. यह सब हामिद करजई के बाद शुरू हुआ.

गनी ने अप्रैल 2015 में भी भारत का दौरा किया. उस वक्त वह सुरक्षा रिश्तों को बढ़ाने को लेकर इच्छुक नहीं थे. यह दोनों सरकारों की तरफ से जारी संयुक्त बयान में भी दिखा. 

जुलाई 2015 में गनी को यह बात समझ में आ गई कि पाकिस्तान ने मुल्ला उमर की मौत के बारे में खुलासा नहीं किया. बल्कि उसने तालिबान और अफगानिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच बैठक कराई. 

हालांकि अब यह बात साफ हो चुकी है गनी भारत से हथियार चाहते हैं. यात्रा शुरू होने से पहले उन्होंने अपने कुछ सहयोगियों को बताया कि वह भारत से हथियारों की आपूर्ति तेज करने के लिए कहेंगे. 

इससे पहले अफगानिस्तान सेना के प्रमुख कदम शाह शाहीमम ने भारत का दौरा किया था और खबरों के मुताबिक उन्होंने भारत से और अधिक लड़ाकू हेलिकॉप्टर और टैंकों की मांग की थी.

संयुक्त बयान में कहा गया कि दोनों नेताओं ने आतंकवाद निरोधी प्रयासों को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है. साथ ही दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को मजबूती देने पर बल दिया गया है जिसे भारत अफगानिस्तान रणनीतिक साझेदारी समझौते के तहत पूरा किया जाएगा.

विदेश सचिव जयशंकर ने हालांकि रक्षा सहयोग के मामले में मोदी और गनी के बीच हुई बातचीत का ब्योरा देने से मना कर दिया. यह चौंकाने वाली बात नहीं है क्योंकि सार्वजनिक तौर पर ऐसी बातों पर चर्चा नहीं की जाती. 

अफगानिस्तान सेना के प्रमुख कदम शाह शाहीमम ने भारत से और अधिक लड़ाकू हेलिकॉप्टर और टैंकों की मांग की थी

हालांकि यह साफ है कि रणनीतिक तौर पर हथियारों की आपूर्ति को लेकर कोई दिक्कत नहीं है. ऐसा होता तो लड़ाकू हेलिकॉप्टर नहीं भेजे जाते. अब सेना को यह तय करना है कि अफगानिस्तान में क्या भेजा जा सकता है और वहां किन साधानों का रख रखाव किया जा सकता है.

मोदी अफगानिस्तान में एक अरब डॉलर की आर्थिक सहायता की घोषणा कर चुके हैं. भारत की छवि अफगानिस्तान के लोगों के बीच बेहतर है क्योंकि भारत की नीति अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में दखल देने की नहीं है.

मोदी और गनी पिछले दो सालों के भीतर देश और विदेश में छह बार मिल चुके हैं. इस साल उनकी और मुलाकात होनी तय है. यह सही है लेकिन भारत को अफगानिस्तान में अपने पुराने सहयोगियों को नहीं भूलना चाहिए. भारत को अफगानिस्तान के सभी तबके में पहुंच बनानी ही होगी. 

First published: 18 September 2016, 7:37 IST
 
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