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...तो आने वाले 10 वर्षों में बेअसर हो जाएंगी एंटीबायोटिक दवाएं

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 10 February 2017, 1:46 IST
QUICK PILL
  • बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक्स का असर कम होता जा रहा है. बहुत जल्द ही एंटीबायोटिक्स जीवन रक्षक दवा होने का तमगा खो सकती हैं. 
  • लोगों में किसी दवा और उसके सही इस्तेमाल के बारे में जागरुकता नहीं है. डब्लूएचओ के सर्वेक्षण में सामने आया कि 64 फीसदी लोग एंटीबायोटिक दवाओं को सर्दी और जुकाम की दवा के रूप में पहचानते है.

कल्पना कीजिए कि आपको बुखार, खांसी और थकान हो रही है. इन तकलीफों के लिए ली जाने वाली पैरासीटामॉल जैसी दवाओं का आप पर असर नहीं हो रहा है. ऐसे में आप एक डॉक्टर के पास जाते हैं जो बताता है कि आपको तपेदिक (टीबी) है. 

उसके बाद डॉक्टर आपसे यह कह सकता है कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है. क्योंकि इसके इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक्स दवाएं अब असरदार नहीं रही. 

आपको ये दूर की कौड़ी लग सकती हैै? लेकिन ऐसा है नहीं. अगले 10 सालों में कई बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक्स दवाएं बेअसर हो सकती हैं.

एंटीबायोटिक युग के बाद

वैज्ञानिकों के अनुसार हम 'पोस्ट-एंटीबायोटिक युग' के कगार पर हैं. आप इसे 'एंटीबायोटिक की समाप्ति' भी मान सकते हैं.

विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि तमाम रोगों के बैक्टीरिया अपनी प्रतिरोधी क्षमता तेजी से बढ़ते जा रहे हैं. कुछ बीमारियों के इलाज के दौरान देखा गया कि एंटीबायोटिक्स का बैक्टीरिया पर कोई असर ही नहीं हुआ. 

इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि लोगो की राय इस पर साफ नहीं है. कई मामलों में तो लोग इस खतरे से अनजान हैं. 

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के 12 मुल्कों के 10 हजार लोगों पर एक सर्वेक्षण कराया. इसमें से 64 फीसदी लोगों ने बताया कि उन्होंने एंटीबायोटिक के बेअसर होने के बारे में सुना तो है. लेकिन उन्हें ये नहीं पता था कि इसका उनके या उनके परिवार के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव हो सकता है. उन्हें ये भी नहीं पता था कि इससे निपटने के लिए क्या कर सकते हैं. 

सर्वेक्षण में शामिल 64 फीसदी लोगों को लगता था कि एंटीबायोटिक से सर्दी और फ्लू का इलाज संभव है. जबकि ये सच नहीं है.

लगभग 32 फीसदी लोगों ने बताया कि जब उन्हें लगने लगा कि वो सही हो गये हैं तो उन्होंने एंटीबायोटिक्स लेनी बंद कर दी. उन्होंने डॉक्टर की बताई खुराक को पूरा नहीं किया. 

रूप बदलते बैक्टीरिया

लैंसेट के एक ताजा सर्वेक्षण में कुछ चिंताजनक बातें सामने आयी हैं. 

इस शोध के अनुसार भविष्य में क्लेबसिएला निमोनिया (निमोनिया) और स्यूडोमोनस एरूजिनोसा (गुर्दा, फेफड़ा और मूत्र मार्ग में संक्रमण) के इलाज में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख दवा कोलिस्टिन चीन, मलयेशिया और लाओस के कुछ हिस्सों में बेअसर हो जाएगी. 

लैंसेट अध्ययन में शामिल रहे चीन के वैज्ञानिकों के मुताबिक उन्होंने बैक्टीरिया में होने वाले नए म्यूटेशन (आंतरिक परिवर्तन) की पहचान की है.

चीन सरकार इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए कोलिस्टिन दवा के कृषि-संबंधित उपयोग पर रोक लगाने पर विचार कर रही है

ये बदलाव पूरी दुनिया में फैल सकता है. नतीजतन दुनिया भर में बहुत तरह के संक्रमण लाइलाज हो जाएंगे.

चेन्नई स्थित अपोलो अस्पताल में संक्रामक रोग विभाग के डॉ. अब्दुल गफूर चेतावनी देते हुए कहते हैं कि भारत में बैक्टीरिया की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है. जिसके पीछे तमाम कारण हैं.

गफूर कहते हैं, "मरीजों के बीच जागरुकता की कमी है. इसके साथ ही दवा लिखने वाले चिकित्सकों और खुद को प्रयोगशाला तक सीमित रखने वाले माइक्रोबॉयोलॉजिस्ट के बीच तालमेल की कमी है. गुणवत्ता वाली दवाएं लिखने वालों के अभाव के साथ ही जनता के भले की दिशा में सोचने वाले डॉक्टरों की भी कमी है."

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक हालिया सर्वेक्षण से भी काफी निराशाजनक नतीजे सामने आए. 

यमुना नदी के छह अलग-अलग स्थानों पर लिए गए पानी के नमूनों से निमोनिया, स्कार्लेट ज्वर, आमवाती ज्वर, श्वसन और मूत्र मार्ग के संक्रमण जैसी बीमारी के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली अलग-अलग वर्गों की एंटीबायोटिक्स की मौजूदगी का पता चला. 

सर्वेक्षण में शामिल रहे एम्स में औषधि विज्ञान के प्रोफ़ेसर डॉक्टर वेल पांडियन कहते हैं यह एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी सूक्ष्म जीव शरीर में प्रवेश कर एंटीबायोटिक्स के प्रभाव को खत्म कर सकते हैं. 

डॉ. पांडियन के मुताबिक नदियों में एंटीबायोटिक्स मिलने की एक प्रमुख वजह ये है कि गैरजरूरी एंटीबायोटिक्स दवाओं को नदी में फेंक दिया जाता है. 

इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी के दिनकर सहल को हाल ही में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी माइक्रोबी के बारे में जागरुकता फैलाने के लिए एंटीबायोटिक एक्शन की तरफ से सम्मानित किया गया. 

यमुना में बड़ी मात्रा में एंटीबायोटिक्स पाए जाने पर सहल ने कहा, "इससे नदी में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी माइक्रोबी के लिए स्थितियां बहुत अनुकूल हो गयी हैं. इससे एंटीबायोटिक्स के प्रति संवेदनशील माइक्रोबी खत्म हो जाएंगे."

किन रोगों के बारे में चिंता जरूरी है?

किन रोगों के बारे में हमें तत्काल चिंता करने की जरूरत हैै?

सहल कहते हैं, "अगर एंटीबायोटिक्स-प्रतिरोधी बैक्टीरिया फैले तो पानी से होने वाले हैजा, दस्त, पेचिस जैसे रोगों बड़ी समस्या बन जाएंगे."

सहल कहते हैं कि एंटीबायोटिक्स बैक्टीरिया संक्रमण के खिलाफ कारगर हो सकते हैं लेकिन इनके दुरुपयोग से वो निष्प्रभावी होते जा रहे हैं. 

एंटीबायोटिक्स का असर कब खत्म हो जाएगा इसे लेकर विशेषज्ञ सहमत नहीं हैं लेकिन इसपर सहमत हैं कि यह होगा जरूर. इसलिए मनुष्यों को जीवन रक्षा के लिए इसके विकल्प तलाशने होंगे. 

लैंसट सर्वेक्षण का निष्कर्ष है, "इस अध्ययन के निष्कर्ष बहुत डरावने हैं. और जब तक कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं होता, डॉक्टरों को मरीजों की बढ़ती संख्या का सामना करना पड़ेगा, औऱ मजबूरन उनसे कहना होगा 'माफ कीजिए मैं आपके संक्रमण का इलाज करने के लिए कुछ नहीं कर सकता."

ये साफ है कि बैक्टीरिया और डॉक्टरों की लड़ाई में हार डॉक्टरों की हो रही है. 

म्यूटेशन का कारण?

आखिर बैक्टीरिया एंटीबायोटिक्स के ख़िलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता कैसे विकसित कर रहे हैं.

लैंसेट के सर्वेक्षण के अनुसार जानवरों पर एंटीबायोटिक्स का ज्यादा प्रयोग इसका एक बड़ा कारण है. 

ब्रितानी कैंपेन ग्रुप 'एंटीबायोटिक एक्शन' गलत मात्रा में लेने पर होने वाले एंटीबायोटिक्स के दुष्प्रभावों के बारे में जागरुकता फैैलाने का काम करता है. ग्रुप मनुष्यों और जानवरों को एक ही एंटीबायोटिक्स देने के प्रति भी आगाह करता है. 

रिपोर्ट के अनुसार चीन सरकार इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए कोलिस्टिन दवा के कृषि-संबंधित उपयोग पर रोक लगाने पर विचार कर रही है. 

तमाम स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस सभी आशंकाओं को दूर करने का प्रयास करते हुए कहते हैं कि आज भी कई एंटीबायोटिक्स के संयोजन प्रभावी साबित हो रहे हैं. लेकिन वे इस बात पर सहमति जताते हैं कि यह रिपोर्ट एक गंभीर खतरे की घंटी है.

हम हिंदुस्तानियों को क्यों हैं चिंता करने की जरूरत?

डब्लूएचओ के सर्वेक्षण में शामिल 75 फीसदी भारतीयों में यह गलत धारणा है कि एंटीबायोटिक्स सर्दी और जुकाम के इलाज में इस्तेमाल होते हैं. इसके साथ ही, केवल 58 फीसदी भारतीय जानते हैं कि डॉक्टर ने जितने खुराक एंटीबायोटिक्स लिखी है उसे पूरा खाना चाहिए. बीच में छोड़ना नहीं चाहिए. 

इससे भी बुरा यह है एक चौथाई से भी कम भारतीयों (22 फीसदी) ने "एंटीबायोटिक्स प्रतिरोध" शब्द के बारे में सुना है.

First published: 25 November 2015, 7:44 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @catchnews

एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म से पढ़ाई. पब्लिक पॉलिसी से जुड़ी कहानियां करते हैं.

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