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बांग्लादेश में बढ़ती इस्लामिक हिंसा देश को खोखला कर रही है

पिनाक रंजन चक्रवर्ती | Updated on: 13 June 2016, 23:02 IST
QUICK PILL
  • हाल के महीनों में बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, धर्मनिरपेक्ष ब्लॉगरों, बुद्धिजीवियों और विदेशियों पर हमले तेजी से बढ़े हैं. आईएस ने अब तक इन हत्याओं की जिम्मेदारी ली है.
  • प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस्लामिक कट्टरपंथियों पर कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं. लेकिन इन हत्याओं की जिम्मेदारी अतिवादियों द्वारा लिए जाने के बाद भी इनका पर्याप्त रूप से राजनीतिकरण किया जा रहा है.
  • हिन्दुओं को निशाना बनाए जाने से एक बात तो यह साफ है कि ये अतिवादी चाहते हैं कि हिन्दू मतदाताओं में सरकार की प्रतिष्ठा कम हो और भारत के साथ उनके संबंध खराब हों.

बांग्लादेश में पिछले हफ्ते की शुरुआत में अज्ञात हमलावरों ने 65 साल के एक हिन्दू पुजारी अनंत गोपाल गांगुली की नृशंस हत्या कर दी. उनकी हत्या उस समय की गई जब वे साइकिल से मंदिर जा रहे थे. पुजारी का शव जेनिदाह जिले के नोलडंगा गांव में उसके घर के पास धान के खेत से बरामद हुआ.

गांगुली का जन्म 1947 में भारत की आजादी से ठीक तीन दिन पहले हुआ था. हत्यारों ने जिस तरह से उनकी नृशंस हत्या की है, उससे पता चलता है कि वे इसमें माहिर थे. उनकी हत्या उसी तरह से की गई है जिस तरह से पशुओं को हलाल किया जाता है.

हत्यारे मोटसाइकिल से आए और अपने काम को अंजाम देकर गायब हो गए. गांगुली की हत्या से पहले पभना शहर के हिमायतपुर में सैर पर निकले एक हिन्दू आश्रम के 60 साल के कर्मचारी नित्यरंजन पांडे की भी हत्या कर दी गई थी. यह हत्या भी उसी तरीके से की गई.

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दोनों की हत्या करने से पहले हत्यारे कुछ दूर उनके साथ पैदल भी चले. इन हत्याओं की जिम्मेदारी आतंकी संगठन आईएस ने ली है.

हत्याओं का आंकड़ा

कुछ ही दिनों पहले जेनिदाह जिले में अज्ञात हमलवरों द्वारा एक होम्योपैथिक चिकित्सक की नृशंस हत्या कर दी गई थी. चिकित्सक पहले मुस्लिम था जिसने बाद में क्रिश्चियन धर्म अपना लिाया था. स्थानीय चर्च के मुताबिक वह धर्मोपदेश देने का काम करता था.

बांग्लादेश में हिन्दुओं को उनकी सम्पत्तियों से बेदखल भी किया जा रहा है

हाल के महीनों में बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, धर्मनिरपेक्ष ब्लॉगरों, बुद्धिजीवियों और विदेशियों पर हमले तेजी से बढ़े हैं. इससे यही संकेत है कि देश में कट्टरपंथियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है. आईएस ने अब तक इन हत्याओं की जिम्मेदारी ली है. यह कहा जाता है कि वे इस्लाम में बताए गए अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहे हैं.

पुजारी गांगुली और आश्रम के कर्मचारी पांडे की किसी से दुश्मनी भी नहीं थी. उनका किसी के साथ विवाद भी नहीं था. यह टारगेट कर की गई हत्याएं हैं. पिछले दो साल से इस तरह की घटनाओं में इजाफा हुआ है.

बांग्लादेश में असुरक्षित हिंदू

बांग्लादेश में हिन्दुओं की आबादी की हिस्सा कुल आबादी का नौ फीसदी है. हिन्दुओं की यह संख्या तेजी से घटती ही जा रही है. यह हालात तब है जब बांग्लादेश एक स्वतंत्र, धर्मनिरपेक्ष देश है. हिन्दुओं को उनकी सम्पत्तियों से बेदखल भी किया जा रहा है.

इन दिनों हिन्दू महिलाओं के अपहरण, बलात्कार और धर्म परिवर्तन कराए जाने की भी घटनाएं बढ़ी हैं. इन हत्याओं का यही संकेत है कि कट्टरपंथी एक बार फिर हिन्दू अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं.

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एक अन्य घटना में ढाका के निकट एक कालेज के हिन्दू प्रिंसिपल को अपमानित किया गया. उन्हें मुर्गा बनाया गया और बाद में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया. यह कहा गया कि उन्होंने इस्लाम का अपमान किया है. दुखद तो यह है कि यह घटना जातीय पार्टी के एक सांसद के इशारे पर हुई.

जातीय पार्टी सत्तारूढ़ आवामी लीग की सहयोगी पार्टी है जिसकी मुखिया प्रधानमंत्री शेख हसीना हैं. घटना की जांच के लिए बनाए गए जांच दल ने प्रधानाचार्य के खिलाफ सभी आरोप झूठे पाए हैं.

खूनी उदाहरण

  • पिछले कुछ महीनों में एक बौद्ध भिक्षु, एक सूफी संत और एक अंग्रेजी के प्रोफेसर की हत्या भी इसी तरह से की गई.
  • फरवरी 2015 से 25 से ज्यादा लोगों को हिंसात्मक तरीके से मौत के घाट उतारा जा चुका है. इनमें से कुछ को सार्वजनिक रूप से मौत दी गई.
  • पीड़ित लोग अल्पसंख्यक समुदाय के, धर्मनिरपेक्ष, बेबाक बोलने वालों के पक्षधर और ब्लॉगर थे.
  • 12 से ज्यादा लोग हत्या की नीयत से किए गए हमलों में बाल-बाल बच गए.

हथियारबंद हमलावरों ने समलैंगिकों के अधिकारों का समर्थन करने वाले जुल्हाश मन्नान और उनके मित्र तनय फहीम की भी हत्या कर दी. हमलावर कूरियर कम्पनी के कर्मचारी के रूप में उनके फ्लैट में दाखिल हुए थे.

35 वर्षीय मन्नान अमरीकी दूतावास के पूर्व प्रोटोकोल अधिकारी थे. तनय भी समलैंगिक अधिकारवादी कार्यकर्ता थे. इन दोनों लोगों की हत्या की भी जिम्मेदारी आईएस और अल कायदा की साउथ एशिया शाखा ने लेने का दावा किया है.

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इसके अलावा एक अज्ञात संगठन जो खुद को अंसारउल्लाह बांग्ला टीम बताता है, ने भी कई हत्याओं की जिम्मेदारी ली है.

कहना न होगा कि बड़ी संख्या में होने वाली इन हत्याओं के चलते देश भर में सरकार के खिलाफ आक्रोश फैला है और प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस्लामिक कट्टरपंथियों पर कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं. पर इन हत्याओं की जिम्मेदारी अतिवादियों द्वारा लिए जाने के बाद भी इनका पर्याप्त रूप से राजनीतिकरण किया जा रहा है.

फरवरी 2015 से 25 से ज्यादा लोगों को हिंसात्मक तरीके से मौत के घाट उतारा जा चुका है

हसीना सरकार ने देश में आईएस और अल कायदा का अस्तित्व होने से ही इनकार कर दिया है. इसके बदले में खुद हसीना, उनके मंत्रिगण और सरकारी अधिकारी कहते हैं कि कुछ घरेलू संगठनों का इन हत्याओं के पीछे हाथ हो सकता है.

नजरअंदाजी के चलते आतंक का साया बढ़ता ही जा रहा है और इन संगठनों के संबंध जो अंतरराष्ट्रीय जिहादी संगठनों से जुड़े हैं, उड्डयन सम्पत्तियों को भी निशाने पर ले सकते हैं.

यह लेखक ढाका अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर उस समय आश्चर्यचकित रह गया जब उसने बोर्डिंग गेट से पहले एक विदेशी (यूरोपीय) को सुरक्षा चेक करते हुए देखा. आतंक के खतरे को देखते हुए भारत समेत अनेक देशों ने प्रतिरोधक आतंक उपायों के लिए ढाका को अपनी सेवाएं देने का प्रस्ताव भी किया है.

घर में ही बढ़ा जिहाद

बांग्लादेश में जब पहली बार उदारवादी ब्लागर की हत्या हुई थी तब हसीना ने जनता की सहानुभूति पाने के लिए शोक जताया था और वे ब्लागर के घर भी गईं थीं, पर वह धीरे-धीरे अपने पुरानी नीति पर ही लौट आईं हैं.

अब वह इस्लाम, पैगम्बर की निंदा करने वालों को बुरा-भला कहती हैं. उनके मंत्री, सरकारी अधिकारी और पुलिस भी उन्हीं के रास्ते का अनुसरण करने लगे हैं. देश की 90 फीसदी आबादी मुस्लिम है. हसीना समय-समय पर चुनावी लाभ की खातिर इस्लामिक दलों और संगठनों से तालमेल बैठाए रखती हैं.

लेकिन हसीना को याद रखना चाहिए कि कहीं उनका देश भी पाकिस्तान की राह पर न चल पड़े जहां कट्टरपंथियों का वर्चस्व हो गया है. कहना न होगा कि बांग्लादेश और पाकिस्तान का डीएनए एक ही है.

हालांकि हसीना लगातार देश में हो रही हत्याओं का आरोप दूसरों पर मढ़ती रहीं हैं. उनका कहना है कि ये इस्लामिक अतिवादियों के साथ मिलकर षडयंत्र करते हैं और इन हत्याओं को अंजाम देते हैं.

युद्ध धर्म और वोट

हिन्दुओं को निशाना बनाए जाने से एक बात तो यह साफ है कि ये अतिवादी चाहते हैं कि हिन्दू मतदाताओं में सरकार की प्रतिष्ठा कम हो और भारत के साथ उनके सम्बंध खराब हों. कोई संदेह नहीं कि भारत में हिन्दू संगठनों ने इन घृणास्पद हत्याओं की घटनाओं को गम्भीरता से लिया है और हसीना सरकार पर सवाल उठाए हैं.

इन दिनों हिन्दू महिलाओं के अपहरण, बलात्कार और धर्म परिवर्तन कराए जाने की भी घटनाएं बढ़ी हैं

बांग्लादेश के दोनों राजनीतिक दल बीएनपी और जमायते-इस्लामी ने भी हसीना सरकार के कामकाज पर रोष जताया है. जमायते-इस्लामी के शीर्ष नेता युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल द्वारा दोषी करार दिए जा चुके हैं. संगठन के मुख्य फाइनेंसर मीर कासिम को भी जल्द ही फांसी दे दी जाएगी.

उसकी अपील को हाईकोर्ट खारिज कर चुका है. बीएनपी नेता बेगम खालिदा जिया भी भ्रष्टाचार के आरोपों से अदालत में जूझ रहीं है. उनके डिप्टी तारिक रहमान पर भी भ्रष्टाचार के आरोप हैं और वह लंदन में निर्वासित जीवन जी रहे हैं. गिरफ्तारी वारंट जारी होने से वह देश में नहीं आ सकते हैं. हसीना पर आरोप है कि एक पक्ष में चुनाव होने के बाद उन्होंने अपने हाथ में सारी शक्तियां केन्द्रित कर ली हैं.

अतिवादियों की बढ़ती गतिविधियां

देखा जाए तो आईएस की गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने से देश के अतिवादी संगठनों को भी पनपने के लिए खाद पानी मिला है. इनका फैलाव अरब देशों तक हुआ है. अभी हाल में सिंगापुर में आठ बांग्लादेशियों को पकड़ा गया है जो कट्टरपंथी इस्लामिक गतिविधि में लिप्त थे.

आरोपों से नकारना अच्छी नीति नहीं होती है. हसीना सरकार को चाहिए कि वह खतरों को नेस्तानाबूद करने के लिए कठोर कदम उठाए. इस्लामिक कट्टरपंथ बांग्लादेश को अस्थिर कर सकता है और इसकी आंच भारत पर भी आ सकती है. दोनों देशों को अपनी सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए.

First published: 13 June 2016, 23:02 IST
 
पिनाक रंजन चक्रवर्ती @catchnews

फ़ेलो, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन, दिल्ली. भारत के पूर्व विदेश सचिव, बांग्लादेश के पूर्व भारतीय उच्चायुक्त और थाईलैंड में पूर्व भारतीय राजदूत रह चुके हैं.

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