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बाइबल, कुरान और समलैंगिकता

(फाइल फोटो)

कुरान और बाइबल में समलैंगिकता के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा गया है और जो कहा भी गया है उसका इसे लेकर होने वाली आधुनिक बहस से सीधा संबंध नहीं है.

ये दोनों धार्मिक ग्रंथ ये मानकर चलते हैं कि विषमलिंगी संबंध ही प्राकृतिक हैं.

समलैंगिकता की अवधारणा तुलनात्मक रूप से नई है. हालांकि प्राचीन इतिहास में समलैंगिकता के तमाम उदाहरण मौजूद हैं. जबकि धार्मिक रूप से इसे अस्वीकार्य ही माना जाता रहा है.

धार्मिक ग्रंथों और बाद के लेखक किसी खास यौन क्रिया का तो जिक्र करते हैं लेकिन निजी यौन झुकाव का संज्ञान नहीं लेते. धार्मिक रूढ़िवादियों (मुस्लिम और ईसाई दोनों) के लिए समलैंगिकता पर की गई निंदापरक टिप्पणियां ही हर हाल में इसे पाप मानने के लिए काफी हैं.

कई उदारवादी व्याख्याकार करुणा और सहानुभूित जैसे मानवीय गुणों के तहत इस मुद्दे पर विचार करने की तरफ ध्यान दिलाते हैं. ऐसे व्याख्याकारों के अनुसार धार्मिक ग्रंथों में की गई ऐसी टिप्पणियां पूरी तरह समर्पित समलैंगिक संबंधों के बारे में नहीं हैं.

जाहिर है ऐसी सोच रखने वाले ज्यादातर लोग मानवाधिकार या लैंगिक समानता से प्रभावित होते हैं. ऐसे लोग किसी ग्रंथ की उसके संदर्भसहित समेकित ढंग से व्याख्या करने में यकीन रखते हैं.

बाइबल में समलैंगिकता

बाइबल में लेविटकस कहते हैं कि अगर एक पुरुष दूसरे पुरुष के साथ वैसे ही सोता है जैसे कि वो महिला के साथ सोता है तो दोनों को प्राणदंड देना चाहिए. यहां इस बात का ध्यान नहीं रखा गया है कि संभव है कि दोनों पुरुषों में से किसी एक के साथ जबरदस्ती की गई हो. 

हालांकि बाइबल में विवाहेत्तर संबंधों या निकट संबंधियों के बीच यौन संबंध के लिए भी ऐसी ही सजा तजवीज की गई है.

बाइबल में पॉल भी मानते हैं कि दो पुरुषों या दो महिलाओं के बीच संबंध प्रकृति के नियमों का उल्लंघन है और ये नियम गैर-यहूदियों तक को पता है बशर्ते उनका ज़हन मूर्तिपूजा से कुंद न हो गया हो.

पॉल का ये भी मानना है कि यौन क्रिया का मुख्य उद्देश्य संतानोत्पत्ति होना चाहिए.

सोडोम और सोडोमी

यहूदी, ईसाई और मुस्लिम तीनों के लिए सोडोम की कहानी का विशेष महत्व है. तीनों ही इस कहानी को पुरुष समलैंगिकता की परंपरागत आलोचना के रूप में देखते हैं. हालांकि जेनेसिस 19 के अनुसार सोडोम की कहानी पुरुषों के बीच समलैंगिकता की कहानी नहीं है, बल्कि ये बलात्कार और मेहमान नवाजी की कहानी है.

सोडोम की कहानी में लोट के घर को जब भीड़ (ये स्पष्ट नहीं है कि भीड़ में केवल पुरुष ही थे) घेर लेती है तो वो अपने मेहमानों को बचाने के लिए दो कुंवारी बेटियों को उन्हें सौंप देता है. बाइबल के अनुसार इस भीड़ में हर उम्र के लोग थे. लोट के लिए शायद अपनी बेटियों के बलात्कार से ज्यादा अपने मेहमानों की फिक्र थी.  

इंसानी भेष में आए फरिश्ते लोट और उसके परिवार को बचा लेते हैं. उसके बाद सोडोम और गोमोराह समेत अन्य शहरों पर आग और पत्थरों की बारिश करके उन्हें तबाह कर दिया गया.

बाइबल में जब सोडोम की बुराई का जिक्र आता है तो समलैंगिकता का जिक्र नहीं किया जाता है. फिर भी सोडोम की कहानी को समलैंगिकता की सजा के तौर पर देखा जाता है. 

जेनेसिस में लगभग महत्वहीन लोट का कुरान में पैगंबर लुत के तौर पर जिक्र है. अरबी में समलैंगिक गुदा मैथुन के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द लिवात उन्हीं के नाम से आया है. जबकि अंग्रेजी में समलैंगिकता के लिए सोडोमी शब्द का प्रयोग होता है जो सोडोम शहर के नाम से आया है.

परंपरागत इस्लामी नजरिया

हदीस (मोहम्मद के कर्मों और शब्दों का उनके समकालीनों द्वारा वर्णन) में कुछ जगहों पर ऐसे संकेत मिलते हैं कि सोडोम का असली गुनाह मूर्तिपूजा और धनलोलुपता था जिसकी परिणति मेहमानों के अपमान और पुरुषों के बलात्कार के रूप में हुई.

17वीं सदी के मुस्लिम विद्वान हसकफी ने पुरुषों के पुरुषों से शादी करने को गैर-कानूनी बताया है

हालांकि हदीस में समलैंगिकता की साफ शब्दों में निंदा की गई है. कुरान (4:16) में ऐसी लंपटता के दोषी पुरुषों को पश्चाताप नहीं करने पर सजा देने की बात कही गई है. 

माना जाता है कि पैगंबर ने कहा था कि इसमें शामिल पुरुषों को वही सजा मिलनी चाहिए जो ज़िना (विवाहेत्तर संबंध) के लिए मिलती है यानी ऐसे लोगों को संगसार (पत्थर से मारना) कर देना चाहिए.

अबु दाऊद की हदीस (38:4447) में अब्दुल्लाह इब्न अब्बास की एक रिपोर्ट का जिक्र किया है. उन्होंने लिखा है, "पैगंबर ने कहाः अगर तुम्हें कोई वो करते मिले जो लोट के लोग करते थे तो जो कर रहा है उसे भी मार दो और जिसके संग किया जा रहा है उसे भी." 

हालांकि इस पर संदेह है कि कुरान में महिला समलैंगिक संबंधों के बारे में भी कोई आयत है. जबकि कुरान में अभद्र महिलाओं की निंदा की गई है. कुछ लोग इसे महिला समलैंगिकता के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं. कुछ हदीस में महिलाओं को एक दूसरे को बिना कपड़ों को देखने या छूने के प्रति आगाह किया गया है.

परपरांगत इस्लामिक विधिशास्त्र में स्त्री और पुरुष की भूमिका सुनिश्चित है. 17वीं सदी के मुस्लिम विद्वान हसकफी ने पुरुषों के पुरुषों से शादी करने को गैर-कानूनी बताया है. इसके अलावा पुरुष महिला गुलामों के संग यौन संबंध बना सकता था लेकिन पुरुष गुलामों के संग नहीं.

प्राचीन इस्लामी विद्वानों ने समलैंगिकता को ज़िना के समकक्ष अपराध माना है. समलैंगिकता की सजा विभिन्न इस्लामी मतों के अनुसार अलग-अलग है. हालांकि इस अपराध को प्रमाणित करने के लिए जितने चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी जरूरी बताई गई उतने गवाह मिलना काफी मुश्किल होगा.

व्यावहारिक तौर पर इस्लामी समाज में समलैंगिकता काफी हद तक मौजूद रही है. कई जगहों पर नौजवान पुरुष वेश्याओं की मौजूदगी दर्ज की गई है. उनके प्रति लोगों को दूसरे अवैध यौन संबंधों से ज्यादा या कम दिक्कत नहीं रही है.

आधुनिक व्याख्या

पश्चिमी समाज में कुछ मुस्लिम अपनी धार्मिक स्वीकार्यता की मांग की तुलना समलैंगिकों की स्वीकार्यता से करते हैं.

न्यूजीलैंड के मुस्लिम सांसद अशरफ चौधरी के अनुसार अगर कानून एक अल्पसंख्यक तबके के संग भेदभाव करता है तो इससे बाकी अल्पसंख्यक भी असुरक्षित होते हैं. (चौधरी को शायद इस बात का अहसास नहीं कि कुरान में समलैंगिकों की संगसारी की बात नहीं कही गई है.)

कैंब्रिज के फिलॉसफर अब्दल हकीम मुराद (टिमोथी विंटर) मानते हैं कि समलैंगिक रुझान जन्मजात गुण हो सकता है फिर भी वो कहते हैं कि लेकिन इससे इसकी इजाजत नहीं मिल जाती.

टिप्पणीकार मेहदी हसन समलैंगिकता की इजाजत नहीं देते लेकिन वो समलैंगिकों से नफरत को मान्यता नहीं देते.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर तारिक रमादान ने भी अपने न्यूजीलैंड दौरे के दौरान कहा था कि मुसलमानों और बाकियों को एक दूसरे का सम्मान करना होगा और उन्हें स्वीकार करना होगा कि कानून समलैंगिक विवाह की इजाजत देता है.

रूढ़ीवादी मुसलमानों और ईसाइयों के लिए समलैंगिकता पाप है. इस्लामिक देशों में आज शायद खुलेआम समलैंगिक होना मुश्किल है लेकिन पश्चिमी देशों में कुछ समलैंगिक इमाम भी हैं.

समलैंगिकों की मदद करने वाले सहायता समूह हैं. स्कॉट कुगल (सिराज अल-हक़) जैसे लेखक मुस्लिम अस्मिता और समलैंगिक झुकाव के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहा हैं.

ऐसे लोग यहूदियों और ईसाई की ही तरह वो भी धर्मग्रंथ का 'असल' अर्थ खोज रहे हैं, जो कई पीढ़ियों के पितृसत्तात्मक, विषमलिंगी संबंधों को प्राकृतिक मानने वाली व्याख्याओं की वजह से ओझल हो गया है. वो कई परंपरागत हदीसों पर भी सवाल उठा रहे हैं. समलैंगिकता के अलावा लिव-इन संबंधों इत्यादि के लिए भी धर्म-स्वीकृति विकल्प खोजे जा रहे हैं.

कहना न होगा ईसाई समलैंगिकों ने अपनी स्वीकार्यता के लिए कठिन लड़ाई लड़ी है. उनके मुस्लिम साथी इस लड़ाई की शुरुआत कर रहे हैं.

(इस लेख के लिए केसिया अली की किताब सेक्सुअल एथिक्स एंड इस्लामः फेमिनिस्ट रिफ्लेक्शन ऑन कुरान, हदीस एंड जुरिसपुडेंस (वनवर्ल्ड पब्लिकेशन, न्यू एडिशन, 2016) से बहुत मदद मिली.)

ये आलेख मूलतः द कंवर्सेशन में प्रकाशित हुआ है. मूल लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

First published: 22 June 2016, 6:46 IST
 
क्रिस्टोफर वैन डर क्रॉट @catchhindi

क्रिस्टोफर वैन डर क्रॉट मैसी यूनिवर्सिटी में इतिहास के लेक्चरर हैं. 

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