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एडोल्फ हिटलर की कोडिंग मशीन को डिकोड करने वाला सुपरकंप्यूटर सामने आया

कैच ब्यूरो | Updated on: 4 June 2016, 18:38 IST

सैन्य जनरलों को विशेष कोड में लिखे संदेश भेजने वाली जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर की विशेष मशीन को एक सुपरकंप्यूटर 'कोलोसस' डिकोड कर लेता था. शुक्रवार को इसे इंग्लैंड के ब्लेचले स्थित नेशनल म्यूजियम ऑफ कंप्यूटिंग में सबके सामने पेश किया गया. इस दौरान उन बुजुर्ग कर्मचारियों ने इसे देखा जिनकी मदद से द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त करने में मदद मिली थी. 

दक्षिणी इंग्लैंड स्थित ब्लेचले पार्क में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भेजे जाने वाले गुप्त संदेशों (कोड) को तोड़ा जाता था. यही डिकोडिंग का मुख्यालय है. यहां के वैज्ञानिकों ने दोनों कोडिंग मशीन के वॉल्वो, शब्दों के घूमते हिस्सों और घूमने वाली कूटों को निकाल दिया, ताकि वो इसे फिर से बनाकर देखें कि कैसे जर्मनी की सेना के प्रमुखों द्वारा गुप्त संदेश (कोड) भेजे जाते थे और कैसे उन्हें वापस सामान्य संदेश (डिकोड) में बदलते थे.

टेड कोल्स/विकीपीडिया

बता दें कि हिटलर की लॉरेंज मशीन में 12 रोटर्स की सिरीज के चलते 16 लाख संभावित कोडिंग कॉम्बिनेशन थे, जो एनिग्मा मशीन की तुलना में 10 लाख गुना से कहीं ज्यादा जटिल थे.

एनिग्मा मशीनें इलेक्ट्रो-मैकेनिकल रोटर चिपर मशीनों की एक सिरीज थीं जिन्हें 20वीं सदी की शुरुआत से लेकर मध्य तक गुप्त व्यावसायिक, कूटनीतिक और सैन्य संचार के लिए इस्तेमाल किया जाता था.

एक इंजीनियर टॉमी फ्लावर्स की किस्मत से वैज्ञानिकों ने लॉरेंज मशीन की कार्यविधि को समझा और इसके बाद लॉरेंज मशीन के रोटर्स से चलने वाली मशीन बनाने में सफलता पाई.

लॉरेंज मशीन के रोटर्स (मैट क्रिप्टो/विकीपीडिया)

बता दें कि 'कोलोसस' को दुनिया का पहला प्रोग्रामेबल, इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल कंप्यूटर माना जाता है लेकिन इसे बहुत कम ही पहचान मिल सकी क्योंकि इस प्रोजेक्ट को दशकों तक गुप्त बनाए रखा गया. इसके चलते इसे बनाने वालों को उचित सम्मान नहीं मिल पाया. 

शुक्रवार को नेेशनल म्यूजियम ऑफ कंप्यूटिंग में कोलोसस के निर्माण में सहायता करने वाले मार्गैरेट बुलेन और युद्ध के दौरान जर्मन संदेशों को एन्क्रिप्ट करने वाली 90 साल से ऊपर की आइरीन डिक्सन इसे देखने पहुंचीं.

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युद्ध के एक दशक बाद डिस्कन ने पाया कि वो सबसे संवेदनशील जानकारियों की प्रोसेसिंग कर रहीं थीं. 

एएफपी को आइरीन ने बताया, "हमें पता चला कि हम हिटलर द्वारा अपने जनरलों को भेजे जाने वाले गुप्त संदेशों को पकड़ रहे थे. अगर हिटलर को यह पता चल जाता कि हम गुप्त संदेशों को जनरलों के पास पहुंचने से पहले ही पकड़ कर सुलझा रहे हैं, तो वे बहुत नाराज होते."

कोलोसस कंप्यूटर का पुनर्निर्माण करते हुए टोनी सेन (माल्टा जीसी/विकीपीडिया)

कोलोसस से मिलने वाली जानकारी ने मित्र राष्ट्रों की मदद की और उन्हें यह यकीन दिलाया कि हिटलर गलती से यह मानता है निर्णायक दिन कैलेस को निशाना बनाया जाएगा और विशेषज्ञों का मानना है कि सुपरकंप्यूटर ने इस युद्ध को दो साल कम कर दिया.

रॉयल नेवी की महिला शाखा की डिक्सन और अन्य को गोपनीयता का शपथ दिलाई गई थी और यहां तक ब्लेचले पार्क के कर्मचारियों को भी एक बड़े कमरे में बने सुपरकंप्यूटर के अस्तित्व के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.

डिक्सन याद करती हैं, "कई ने यह पूछा भी कि यहां (कोलोसस के कमरे के पास) इतनी गर्मी क्यों है और कुछ तो इसके बाहर अपने कपड़े सुखाते थे."

प्रमुख लॉरेंज साइफर मशीन को कुछ दिनों के लिए ऑस्लो स्थित नॉर्वेन सशस्त्र सैन्य संग्राहलय से लाया गया, लेकिन रोटर्स सको संदेश भेजने के लिए स्पेशल कीबोर्ड ताजा खोज है.

संग्रहालय के शोधकर्ता जॉन वेट्टर ने नीलामी वेबसाइट 'इबे' पर एक 'टेलीग्राम मशीन' को बिक्री के लिए देखा था और फिर महसूस किया कि वास्वत में यह तो लॉरेंज टेलीप्रिंटर था.

इसके बाद वो दक्षिण इंग्लैंड के एक कस्बे में पहुंचे और एक झोपड़ी के अंदर इस मशीन को कूड़े से ढका पाया. 

वेट्टर के मुताबिक, "हमनें उससे कहा, 'आपका बहुत शुक्रिया, इसकी कितनी कीमत थी?' इसे बेचने वाली महिला ने कहा आधा पाउंड, तब हमने कहा लीजिए 10 पाउंड का नोट और बाकी बची रकम भी रख लीजिए." 

माना जाता है कि गोपनीयता बनाए रखने के लिए 10 कोलोसस मशीनों को नष्ट कर दिया गया. लेकिन बाद में एक वैज्ञानिक स्वर्गीय टोनी सेल ने अपना जीवन एक कोलोसस के पुनर्निर्माण को समर्पित कर दिया ताकि डेवलपर्स से ब्लेचले पार्क कॉम्प्लेक्स को बचाने का प्रयास किया जा सके.

एएफपी को टोनी सेल की पत्नी मार्गैरेट ने बताया, "मुझे खुशी है कि मेरे दिवंगत पति का सपना पूरा हुआ. बीते 25 सालों में पूरी जिंदगी ब्लेचले पार्क ही बन गई थी. अधिकांश लोग यही कहते थे कि यह असंभव काम है."

First published: 4 June 2016, 18:38 IST
 
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