Home » इंटरनेशनल » Break point: are the US and Britain working to Balkanise Syria?
 

वारसा की तर्ज पर सीरिया को बांटने की जुगत में अमरीका और ब्रिटेन?

नीरज श्रीवास्तव | Updated on: 25 June 2016, 8:13 IST

सीरिया में पांच साल से ज्यादा वक्त से लड़ाई चल रही है. हमारे समय की यह सर्वाधिक दुखद घटनाओं में से एक है. इस युद्ध में भारी संख्या में लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है और विध्वंस भी बहुत हुआ है. 

पांच लाख लोगों से ज्यादा की जान जा चुकी है. इनमें निर्दोष लोगों की संख्या सर्वाधिक है. लगभग एक करोड़ बीस लाख लोग जान बचाकर दूसरे देशों में शरण ले चुके हैं. 

टर्की और लीबिया से यूरोप पहुंचने की कोशिश में सैंकड़ो लोग भूमध्यसागर में डूब गए. सीरिया में पहली बार 27 फरवरी से प्रभावी संघर्षविराम लागू किया गया है. 

इस विराम को देश में जारी विनाशकारी संघर्ष के बीच हिंसा को कम करने के लिए सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय कदम बताया जा रहा है पर सभी पक्ष खुद को मजबूत करने की खातिर और ज्यादा हथियार इकट्ठा कर रहे हैं और जमीनी स्थिति को अपने पक्ष में कर रहे हैं.

भविष्य में किसी समझौते पर पहुंचा जा सकेगा, यह कहना बहुत मुश्किल है

ठीक इसी समय बशर-अल-असद और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में जिनेवा में कुछ विपक्षी संगठनों के बीच शांति वार्ता भी चल रही है. इन शांति वार्ताओं का कोई परिणाम नहीं निकला है. इसकी वजह यह है कि विपक्षी समूह चाहता है कि राष्ट्रपति असद तुरन्त इस्तीफा दें जबकि सीरियाई सरकार यह मांग खारिज कर चुकी है.

भविष्य में किसी समझौते पर पहुंचा जा सकेगा, यह कहना बहुत मुश्किल है. क्या सीरिया के भविष्य का निर्णय युद्धक्षेत्र में ही होगा?

गत तीन मई को अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी ने सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद को विभिन्न पक्षों के बीच हुए शांति समझौते का पालन करने के लिए चेताया है. इसके लिए उन्होंने एक अगस्त 2016 तक का समय दिया है. उन्होंने कहा है कि यदि असद ऐसा कर पाने में नाकाम रहते हैं, तो उन्हें इसके संभावित परिणामों के लिए भी तैयार रहना चाहिए.

संभावित परिणाम क्या होंगे? कैरी ने इसका खुलासा नहीं किया है. इसके पहले 23 फरवरी को कैरी ने अमरीकी सीनेट की फॉरेन रिलेशन्स कमेटी को बताया था कि जिनेवा में चल रही वार्ता से दोनों पक्षों को मान्य कोई हल नहीं निकलता है तो अमरीका 'प्लान-बी' पर विचार कर सकता है.

इससे एक सवाल खड़ा होता है कि कैरी का सीरिया को लेकर 'प्लान बी' क्या है? कई विश्लेषकों का मानना है कि प्लान बी मुख्यत: पूरे सीरिया को धार्मिक और जातीय आधार पर टुकड़ों में बांट देने का हो सकता है. इस तरह का विचार पहले अमरीका के एक पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेड बरजेजनिस्की, ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के रिसर्च फैलो मिखाइल ओ हनलोन दे चुके हैं.

अमरीकी इंस्टीट्यूट फॉर पीस एंड विल्सन सेन्टर की स्कॉलर रॉबिन राइट का भी यही विचार है. इसी तरह का विचार असाधारण रूप से इजराइली पत्रकार ओडेड इनोन भी दे चुके हैं. ओडेड इनोन का प्लान 1982 में सामने आया था.

खतरनाक विचार

1998 में प्रकाशित अपनी किताब 'दि ग्रांड चेसबोर्ड: अमेरिकन प्राइमेसी एंड इट्स जियोस्ट्रेटजिक इम्पेरटिव्स' में जेड बरजेजनिस्की ने छोटे राज्यों के बारे में विस्तार से लिखा है. उन्होंने लिखा है कि जातीय, धार्मिक और अन्य पहचान के आधार पर छोटे राज्यों का गठन किया जाना चाहिए जो कमजोर और अशक्त होंगे.

बड़े राष्ट्रों, गठबंधनों, बैंकिंग और औद्योगिक निगमों को इन पर काबू पाना आसान होगा. ओ हनलोन ने जून और अक्टूबर 2015 में प्रकाशित कई लेखों में सीरिया पर अपने विचार लिखे हैं. 

एक लेख में उन्होंने लिखा है कि भविष्य का सीरिया कई खंडों का एक परिसंघ हो सकता है. इसमें एक बड़ा खंड अलावित (असद का खुद का खंड) का होगा जो भूमध्यसागर तक होगा.

टर्की सीमा के पास उत्तरी और उत्तरपूर्व एक अन्य कुर्दिश कॉरिडोर, तीसरा दक्षिण पश्चिम में द्रुज और चौथा सुन्नी मुसलमानों का होगा. इसके बाद दमिश्क से लेकर अलेप्पो तक सेन्ट्रल जोन होगा जिसमें देश की मुख्य आबादी रहेगी. आखिरी जोन को सम्भवत: स्थिर करना कठिन होगा किन्तु अन्य को स्थिर करना इतना मुश्किल नहीं होगा.

उन्होंने पूर्वानुमान लगाया था कि इसकी पूरे क्षेत्र में व्यापक प्रतिक्रिया होगी

ध्यान देने लायक बात यह है कि हनलोन ने एक सम्प्रभु राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े करने से पड़ने वाले मानवीय प्रभाव जैसे हजारों निर्दोष नागिरकों के मारे जाने, लाखों के बेघर होने के बारे में कभी भी विचार नहीं किया. सितम्बर 2013 में न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में रॉबिन राइट ने लिखा था कि सीरिया को तीन क्षेत्रों में बांट देना चाहिए.

हर क्षेत्र का अपना झंडा हो और सुरक्षा बल हो. उन्होंने पूर्वानुमान लगाया था कि इसकी पूरे क्षेत्र में व्यापक प्रतिक्रिया होगी. पांच राष्ट्र की जगह चौदह राष्ट्र हो जाएंगे. उन्होंने नए राज्यों का नक्शा भी प्रस्तावित किया था.

तो कैसे इनोन प्लान की रोशनी में इन प्रस्तावों को देखा जाए जो उन्होंने ग्रेटर इजराइल के लिए बनाए थे. कहा जाता है कि इस प्लान को इजराइल के राजनीतिक, सैन्य और खुफिया प्रतिष्ठानों में काफी सराहा गया था?

प्लान इस विचार पर आधारित था कि इजराइल अपने भू राजनीतिक माहौल को फिर से विशेष उद्देश्य के लिए तैयार करे. हालांकि अब यह स्पष्ट है कि अमरीकी विदेश मंत्री केरी का सीरिया के वास्ते प्लान बी क्या है- सीरिया को जातीय, धार्मिक, विशेष सम्बंधों और अन्य पहचान के आधार पर कई छोटे-छोटे राज्यों में बांटना.

इस बात के सबूत भी हैं जो पहले से ही आकार ले रहा है. सीरियाई सरकार की अनुमति के बिना पिछले माह सीरिया में 300 अमेरिकी सैनिक तैनात कर दिए गए. ये सैनिक कुर्दिश की सहायक सेना के साथ पहले से ही रक्का में हैं. 

रक्का को आतंकी संगठन आईएस का गढ़ माना जाता है. इनका उद्देश्य रक्का को मुक्त कराकर उसे अपने नियंत्रण में लेना है. इस कदम से तो यही लगता है कि सीरिया को तोड़ने के प्रयास पहले से ही शुरू हो गए हैं.

ब्रिटेन का साथ

अमेरिका के इस कदम को ब्रिटेन का समर्थन मिला हुआ है. टाइम्स ने छह जून को खबर दी थी कि आईएस के रोजाना के हमले से निपटने के लिए ब्रिटेन की विशेष फौजें सीरिया में प्रवेश कर गईं हैं. ये विद्रोहयों का साथ देंगी. इस गरम देश में किसी भी अभियान में भाग लेने का ब्रिटेन का यह पहला उदाहरण है. 

कोई आश्चर्य नहीं होगा कि ब्रिटिश सेना का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी सैनिकों के समन्वय से सीरियाई अधिकार वाले इलाके को अपने कब्जे में लेकर उस पर नियंत्रण करना है. अमरीकी सैनिकों ने पहले से ही कुर्दिश नियंत्रण वाले उत्तर पश्चिम सीरिया में अबु हजर एयरपोर्ट पर सैन्य ठिकाना बना लिया है.

उधर, सीरियाई सेना रूसी वायु सेना की सहायता से अमरीका और कुर्दों से पहले ही रक्का को आईएसआईएस से छीनने की दौड़ में है. रक्का पर नियंत्रण रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य में कतर के उत्तरी क्षेत्र से टर्की तक और इसके बाद यूरोप तक गैस पाइप लाइन निकलनी है.

अमेरिका विदेश विभाग के अधिकारियों ने एक और विलक्षण चाल चल दी है

राष्ट्रपति असद 2009 में ईरान की इस पाइपलाइन पर अपनी रुचि जता चुके हैं. यह विश्व की सबसे बड़ी गैस पाइपलाइन होगी. असद ने जुलाई 2012 में एक समझौते पर दस्तखत भी कर दिए हैं. यह पाइपलाइन सीरिया, लेबनान होते हुए यूरोप तक जाएगी.

अमेरिका विदेश विभाग के अधिकारियों ने एक और विलक्षण चाल चल दी है. उन्होंने एक आंतरिक मेमो के जरिए अपनी सरकार से असद को बलपूर्वक हटाए जाने की मांग कर डाली है. यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत अवैध है. ओबामा यह करना नहीं चाहते हैं. हालात तभी बदल सकते हैं जब हिलेरी क्लिंटन सत्ता में आएंगी.

अभी देखना बाकी है कि अमेरिका का नया कदम क्या होगा. विदेश मंत्री कैरी ने एक अगस्त की तारीख तय की है. यह मुश्किल है कि ओबामा अपने राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल के आखिरी महीनों में सीरिया पर अपनी नीतियों में बदलाव लाएंगे. जैसा कि कहा जा चुका है कि जो कुछ होगा, अमेरिका में नए राष्ट्रपति के पद संभालने के बाद ही होगा.

नया राष्ट्रपति जनवरी में पद संभालेंगा. असद को बलपूर्वक हटा देने की अमेरिका और उसके गठबंधन की सीधी सैन्य दखलंदाजी तब वास्तविक संभावनाएं बन जाएगी. तब रूस अपनी कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा? यह देखना भी दिलचस्प होगा.

(लेखक डेनमार्क और यूगांडा में भारत के पूर्व राजदूत, अमेरिका, सीरिया, लीबिया, सउदी अरब और कनाडा में राजनयिक मिशनों में भी कार्यरत रहे हैं)

First published: 25 June 2016, 8:13 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी