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ब्रेग्जिट: क्यों इतना आसान नहीं होगा यूूरोपीय यूनियन से ब्रिटेन का निकलना?

अलीशा मथारू | Updated on: 17 March 2017, 8:21 IST

ब्रेग्जिट को गति देने वाला चक्का अंतत: अब घूमना शुरू हो चुका है. 13 मार्च को ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे को एक अहम जीत हासिल हुई जिसके अंतर्गत ब्रेग्जिट बिल को संसद के दोनों सदनों ने एक भी संशोधन किए बिना पारित कर दिया. इससे एक बात साफ हो गई कि यह कोई आसान ब्रेकअप नहीं होने जा रहा.

बिना किसी खास चुनौती के यह बिल हॉउस आॅफ कॉमंस से पारित हो गया. हॉउस आॅफ लॉर्डस ने इसमें दो संशोधन किए. पहला यह कि जब भी कोई निगोशिएन यानी सौदेबाजी से जुड़ी बातचीत होगी तो इसमें संसद की आवाज को प्रमुखता से सुना जाएगा. दूसरा यह कि यूरोपियन यूनियन के नागरिकों को यूनाइटेड किंगडम में बने रहने का पूरा हक होगा.

लेकिन जब बिल फिर से हॉउस आॅफ कामंस में लौटा तो बिल को अपने मूल रूप में ही 118 वोटों पर 274 वोटों के बहुमत से पारित कर दिया गया.

अब बिल को राज परिवार की सहमति मिलने का इंतजार है, जो कि ब्रेग्जिट सचिव डेविड डेविस के अनुसार 16 मार्च को मिल जाएगी. मे के अुनसार उनकी योजना मार्च के अंत तक लिस्बन संधि के अनुच्छेद 50 को फिर से लागू करने की है. इसका आशय है कि 2019 तक ब्रिटेन आधिकारिक रूप से अलग हो जाएगा, लेकिन जानकारों का कहना है इसमें इससे अधिक समय लग सकता है. कुछ के अनुसार तो यह समय छह साल भी हो सकता है.

तब तक ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन एक दूसरे से रोज-रोज उलझते रहेंगे. मीडिया रिपोर्टस के अनुसार अनौपचारिक बैठकों की श्रृंखला में नई व्यापार संधियों, सुरक्षा और सीमा के दोनों ओर नागरिक अधिकारों के संबंध में नए जटिल नियम बनाने को लेकर पहले ही तनातनी का माहौल बना हुआ है.

कुछ भी आसान नहीं है

संसद की इस जीत के पीछे भी प्रथम स्कॉटिश मंत्री निकोला स्टुर्जियन की वह घोषणा है कि 2019 के पहले जबकि ब्रेग्जिट वार्ता किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचेगी स्कॉटलैंड दूसरा जनमत संग्रह कराने की सोच रहा है. ब्रिटेन पहले ही अब उस तरह की गुडविल नहीं रखता जैसी कि वह जनमत संग्रह के पहले यानी 23 जून, 2016 के पहले रखता था.

इस जनमत संग्रह में 71.8 %  टर्नआउट के साथ तीन करोड़ लोगों ने ब्रेग्जिट के मुद्दे पर वोट दिया था और 51.9 % मतदाताओं ने यूरोपियन यूनियन छोड़ने के पक्ष में मतदान किया था जबकि 48.1 प्रतिशत मतदाताओं ने यूरोपियन यूनियन में बने रहने के लिए मतदान किया था. लेकिन इसमें प्रमुख रूप से इंग्लैंड और वेल्स ने ही ब्रेग्जिट के लिए वोट दिया था. यहां ब्रेग्जिट समर्थकों को क्रमश: 53.4 % तथा 52.5 % वोट मिले थे.

इसका आशय है कि इंग्लैंड को उससे कहीं अधिक सौदेबाजी करनी होगी जितना कि उसने आरंभ में सोचा था. ब्रिटेन समेत 28 देशों के यूरोपियन यूनियन में से अब तक किसी देश ने इसके पूर्व यूनियन नहीं छोड़ा है. इस सबको देखते हुए यह प्रक्रिया अत्यंत मुश्किल होने वाली है.

इसका अर्थशास्त्र

सबसे बड़ी चिंता का विषय इस सारी स्थिति का अर्थशास्त्र है. आने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार अनुभवों को सोचकर पूरे यूके में कंपनियों के सीईओ अपनी रातों की नींद गंवा चुके हैं. ब्रिटिश पीएम मे की प्राथमिकता सूची में इन दिनों फ्री ट्रेड डील करना ही टॉप पर बना हुआ है. जनवरी में उन्होंने कहा था कि खराब डील होने से अच्छा है कि कोई डील ही न हो.

इस तरह की किसी डील के बिना ब्रिटेन पूरे यूरोपीय यूनियन के साथ डब्ल्यूटीओ की शर्तों पर ही कारोबार कर पाएगा. इसका आशय है नये प्रकार के टैक्स और टैरिफ, यहां तक कि पूरे यूरोप में कारों के निर्यात पर भी इसके बाद 10 प्रतिशत टैरिफ देना होगा. बैंक आॅफ अमरीका मैरिल लिंच की एक रिपोर्ट के अनुसार आशंका तो यह है कि ब्रेग्जिट से लंबे समय में यूरोपीय यूनियन के लिए होने वाला ब्रिटेन का निर्यात 25 प्रतिशत तक गिर सकता है.

इसके साथ ही ब्रेग्जिट से निपटने के लिए बनने वाले नये नियमों में प्रतिबंधित आप्रवास के चलते कामगरों की आवाजाही पर पड़ने वाला असर ही चिंता का एक बड़ा कारण बना हुआ है. बड़ी कॉस्मैटिक्स कंपनी लश के अनुसार उसके 80 फीसदी से अधिक कर्मी जो कि बड़ी संख्या में प्रवासी थे, ने ब्रेग्जिट की झटके के बाद दूसरे देशों में नौकरी ले ली है क्योंकि वे इसके बाद ब्रिटेन में अनामंत्रित तथा असहज महसूस कर रहे थे.

इतना ही नहीं, जनमत संग्रह के दौरान अलग होने की वकालत करने वाले समूह का दावा था कि यूरोपीय यूनियन से अलग होने पर करदाताओं का 350 मिलियन पौंड अथवा 440 मिलियन डॉलर प्रत्येक सप्ताह बचेंगे, लेकिन द फाइनैंसियल टाइम्स में थिंक टैंक, सेंटर फॉर यूरोपियन रिफॉर्म्स के हवाले से प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार यह बचत 24.5 बिलियन यूरो या 26.1 बिलियन डॉलर से लेकर 72.8 बिलियन यूरो के बीच में कुछ हो सकती है.

मुसीबतों का बक्सा

कम ब्याज दर होने के कारण लाभ कमाने में असमर्थ यूरोप में बैंक पहले से ही कठिन दौर से गुजर रहे थे. 13 मार्च को बिल के पारित होने के बाद पौंड पर भी इसकी प्रतिक्रिया देर से देखने को मिली. लेकिन समाचारों की मानें तो यूके में रोजमर्रा की चीजों के दाम धीरे-धीरे चढ़ते ही जा रहे हैं. जानकारों की मानें तो ब्रिटेन डॉलर की तुलना में पौंड के तेज अवमूल्यन की स्थिति का सामना कर सकता है और पौंड के दाम 1.20 डॉलर तक नीचे आ सकते हैं.

साथ ही दो जापानी बैंक मिझुओ फाइनैंशियल समूह और मित्शुबिशी यूएफजे फाइनैंशियल समूह अपना संचालन एमस्टरडम शिफ्ट करने की तैयारी में हैं. यहां तक कि आॅक्सफोर्ड विवि ने भी चेतावनी जारी की है कि अगर ब्रेग्जिट होता है तो उसे मूल्यवान लैक्चरर्स तथा रिसर्चर को गंवाना होगा.

इस कदम का विरोध करने वाले पहले ही ब्रेग्जिट को पैंडोरा बॉक्स का नाम दे चुके हैं. इसके बाद किस तरह की मुश्किल स्थितियां पैदा होंगी यह तो बाद में ही पता चलेगा, पर इतना तय है कि इससे कोई खुशनुमा अनुभव नहीं होने जा रहा.

First published: 17 March 2017, 8:12 IST
 
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