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चीन-नेपाल गठजोड़ और भारत के कूटनीतिक जाम में फंसी बुद्ध की विरासत

भारत भूषण | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST

भारत ने नेपाल में बुद्ध के 2560वें जयंति पर होने वाले कार्यक्रमों का आधिकारिक बहिष्कार करने का निर्णय लिया है. 19-20 मई को यहां अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन होगा जिसके बाद 21 मई को बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी में विशेष कार्यक्रम होगा. भारत को संदेह है कि इन कार्यक्रमों में चीन की अहम भूमिका है.

इस कार्यक्रम में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज समेत कई गणमान्य भारतीयों को बुलाया गया था. पीएम मोदी वैसे भी इस दौरान ईरान की यात्रा पर रहने वाले थे लेकिन अब कोई भारतीय अधिकारी या नेता इन कार्यक्रमों में शामिल नहीं होगा.

इस नए घटनाक्रम के कारण पहले से कमजोर होते भारत-नेपाल संबंधों को नया झटका लगेगा.

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भारतीय अधिकारी नेपाल से दो वजहों से नाराज हैं. भारतीय अधिकारियों को संदेह है कि नेपाल के संस्कृति मंत्रालय ने इन कार्यक्रमों के लिए चीन से 15 करोड़ अमेरिकी डॉलर की आर्थिक मदद ली है.

माना जा रहा है कि ये पैसा चीन के चार प्रमुख बौद्ध मंदिरों के माध्यम से दिया गया है. ये चार मंदिर हैं माउंट वुताई, माउंट ईमी, माउंट पुतुओ और माउंट जियुहुआ. अनुमान है कि इनमें से प्रत्येक मंदिर को करीब एक लाख अमेरिकी डॉलर दिए गए हैं.

नेपाल के पीएम केपी ओली के अनुसार बुद्ध की जन्मस्थली और कर्मस्थली केवल नेपाल है

इसके अलावा बुद्धिस्ट एसोसिएशन ऑफ चीन ने भी नेपाल स्थित विभिन्न चीनी होटलों और वाणिज्य केंद्रों के माध्यम से आर्थिक मदद की है. भारतीय अधिकारियों के अनुसार कुछ पैसा म्यांमार के रास्ते से भी नेपाल तक पहुंचा है.

भारत की दूसरी आपत्ति कार्यक्रम की थीम बदलने को लेकर है. पहले इस कार्यक्रम की थीम थी, "प्रिज़रवेशन एंड डेवलपमेंट ऑफ बुद्धिस्ट हेरीटेज ऑफ नेपाल" और इसकी सब-थीम थी "लंबिनी-बर्थप्लेस ऑफ बुद्ध" जिसे बदलकर "लुंबिनी- फाउंटनहेड ऑफ बुद्धिज्म" कर दिया गया.

पहली नजर में भारत की नाराजगी तुनकमिजाजी प्रतीत होती है. लेकिन गहराई से देखने पर उसकी चिंता को हल्के में नहीं लिया जा सकता.

भारत को लग रहा है कि नेपाल चीन की मदद से लुंबिनी को बौद्ध धर्म के केंद्रीय तीर्थ के रूप में विकसित करना चाहता है. अभी तक भारत स्थित गया को ही बौद्ध धर्म का सबसे प्रमुख केंद्र माना जाता है.

इन कार्यक्रमों से चीन के चार शहरों में स्थित चार प्रमुख बौद्ध मंदिरो का जुड़ना भी यही दर्शाता है कि लुंबिनी को गया के ऊपर तरजीह दिलाने की कोशिश की जा रही है.

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने मीडिया में दावा किया इस उत्सव से "भ्रम खत्म होंगे और ये स्थापित हो जाएगा कि बौद्ध धर्म और दर्शन की शुरुआत नेपाल से हुई थी."

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कुछ अति-राष्ट्रवादी नेपाली पहले भी गौतम बुद्ध को गया में ज्ञान मिलने को गलत बताते रहे हैं. ऐसे लोगों को भारत को बुद्ध की धरती बताने पर भी एतराज होता है.

नेपाली पीएम ओली ने ये भी कहा कि अगर सिद्दार्थ गौतम को लुंबिनी में ज्ञान की प्राप्ति न हो गई होती तो शायद उन्होंने अपना परिवार और राज्य छोड़ा ही नहीं होता.

नेपाल के संस्कृति मंत्री आनंद प्रसाद पोखरेल ने भी कहा कि इस सम्मेलन से ये स्थापित हो जाएगा कि बुद्ध की जन्मभूमि और कर्मभूमि नेपाल ही है. आनंद प्रसाद इस सम्मलेन के लिए नेपाल और चीन के बीच सेतु का काम कर रहे हैं.

भारत इसे नेपाल के बौद्धों में मतभेद पैदा करने की कोशिश के तौर पर देख रहा है. जबकि बुद्ध धर्म की दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों में अहम भूमिका रही है.

ऐसे में भारत मान रहा है कि कार्यक्रम की थीम में बदलाव उकसाने वाला है. भारत इसे चीन के नेपाल के तराई इलाके (लुंबिनी इसे इलाके में है) में अपनी स्थित मजबूत करने की कोशिश के रूप में देख रहा है. ये इलाका भारत-नेपाल सीमा के करीब ही स्थित है.

एक भारतीय अधिकारी कहते हैं, "लुंबिनी में इतनी बड़ी संख्या में चीनियों की मौजूदगी निस्संदेह उकसाने वाली बात है."

लुंबिनी का चीन कनेक्शन


लुंबिनी में पैर जमाने की चीन की ये पहली कोशिश नहीं है. एशिया-पैसिफिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन फाउंडेशन नामक संगठन के प्रमुक शियाओ वुनान ने भारत आकर तिब्बती नेता दलाई लामा और करमापा से मुलाकात की थी.

माना जाता है कि उन्होंने तिब्बती नेताओं से कहा था कि अगर वो भारत में खुश नहीं है तो वो उनके लिए चीनी पासपोर्ट की व्यवस्था कर सकते हैं. तिब्बती नेताओं को फुसलाने की ऐसी सस्ती कोशिश भारत को नागवार गुजरी. उसके बाद शियाओ को भारत आने की अनुमति नहीं दी गई.

शियाओ ने लुंबिनी में तीन अरब अमेरिकी डॉलर की परियोजना का प्रस्ताव दिया है. इसे जीपी कोइराला फाउंडेशन के माध्यम से अमलीजामा पहनाया जाना था लेकिन भारत की आपत्ति के बाद ये परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी.

चीन नेपाल के लुंबिनी में अपना दखल बढ़ाने की लगातार कोशिश कर रहा है

इसके बाद चीन ने कोरिया के एक कारोबारी के माध्यम से शियाओ से मिलता जुलता प्रस्ताव पेश करवाया. जिसके तहत लुंबिनी का जीर्णोद्धार, आधुनिक हवाई अड्डे, होटल और अस्पताल का निर्माण कराना शामिल था. हालांकि ये प्रस्ताव भी भारत की आपत्ति के कारण परवान नहीं चढ़ सका.

भारतीय अधिकारियों के अनुसार चीन ने म्यांमार के माध्यम से भी 2014 में ऐसी ही कोशिश की थी. तब लुंबिनी में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ था जिसे म्यांमार के एक प्रभावशाली बौद्ध भिक्षु ने डेढ़ लाख अमेरिकी डॉलर की मदद दी थी. तब लोगों ने इस बात पर हैरत जताई थी कि उन्होंने इतनी बड़ी आर्थिक मदद कैसी की और शक की सुइयां चीन की तरफ घूमने लगी थीं.

विवादित कार्यक्रम में एक नेपाली एनजीओ "हिमालयन बॉर्डर एरिया रिलेशंस डेवलपमेंट एसोसिएशन" की भी अहम भूमिका है. ये एनजीओ में नेपाल के 18 जिले और तिब्बत के कुछ जिलों के लोग जुड़े हैं. भारतीय अधिकारियों का मानना है कि इस एनजीओ को भी चीन से मदद मिलती है.

भारत स्थित इंटरनेशनल बुद्धिस्ट कॉन्फेडरेशन (आईबीसी) भी इस कार्यक्रम का सह-आयोजक है. माना जाता है कि आईबीसी को भारत सरकार का समर्थन है. आईबीसी के प्रमुख लद्दाख के लामा लोबज़ांग हैं. माना जा राह है कि चीन ने आईबीसी की इस कार्यक्रम में भूमिका पर आपत्ति नहीं जताई है लेकिन उसने नेपाल को इशारा कर दिया है कि दलाई लामा और तिब्बत का मुद्दा उसके लिए काफी संवेदनशील है र कार्यक्रम में इसका ख्याल रखा जाना चाहिए. माना जा रहा है कि लामा लोबज़ांग को लेकर भी चीन की राय् सकारात्मक नहीं है. 

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दूसरी तरफ लामा लोबजांग को नेपाल से लौटने के बाद कार्यक्रम में चीन की भूमिका के बारे में भारतीय अधिकारियों ने जानकारी दी. माना जा रहा है कि भारत ने उन्हें सुझाव दिया है कि उन्हें या किसी अन्य बौद्ध प्रतिनिधिमंडल इस कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए.

लामा लोबजांग अब खुद नेपाल नहीं जाएंगे लेकिन आईबीसी ने पांच सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल को वहां जाने के लिए नामित किया है. इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व महाबोधी सोसाइटी के चेयरमैन और पूर्व विदेेश सचिव ललितमान सिंह करेंगे.

नेपाल के मामले में प्रतीकों के महत्व को नहीं भूलाया जा सकता. 2014 में अपनी नेपाल यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में 2500 किलोग्राम चंदन की लकड़ी चढ़ाई थी. जिसका मकसद भारत और नेपाल के बीच साझा हिंदूू विरासत पर जोर देना था. बुद्ध को केवल नेपाल की विरासत बताकर नेपाली पीएम ओली इसके ठीक उलटा संदेश देना चाहते हैं.

कुछ राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ओली भारत को नेपाल के तराई इलाके से दूर रहने का संदेश देना चाहते हैं. ये अलग बात है कि उनके आलोचक कह सकते हैं कि बुद्ध पहले मधेशी हैं, बाद में कुछ और.

First published: 12 May 2016, 8:39 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

एडिटर, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में 25 से ज्यादा सालों का अनुभव. इस दौरान मेल टुडे के संस्थापक संपादक, हिन्दुस्तान टाइम्स के कार्यकारी संपादक, द टेलीग्राफ, दिल्ली के संपादक, एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस के संपादक, इंडियन एक्सप्रेस के वॉशिंगटन संवाददाता, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सहायक संपादक के रूप में काम किया.

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