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सत्तार ईदी का निधन: हम जाकिर नाइक के कुतर्कों में उलझे रहे और एक बड़ा मुसलमान चुपचाप चला गया

कैच ब्यूरो | Updated on: 9 July 2016, 15:33 IST
(पत्रिका)
QUICK PILL
  • ईदी फाउंडेशन के चेयरमैन अब्दुल सत्तार ईदी का शुक्रवार की रात कराची में निधन हो गया. उनकी उम्र 88 साल थी. कराची के नेशनल स्टेडियम में ईदी के जनाजे की नमाज पढ़ी जाएगी और फिर उसकेे बाद ईदी गांव में उन्हें सुपुर्द ए खाक किया जाएगा.
  • ईदी अपनी विनम्रता और साफगोई के लिए जाने जाते थे. पाकिस्तान में करीब एक दशक तक रही गूंगी और बहरी गीता के भारत लौटने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईदी फाउंडेशन को एक करोड़ रुपये का चेक दिया था. 
  • करीब एक दशक तक ईदी फाउंडेशन ने गीता की देखभाल की थी. ईदी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से की गई मदद की घोषणा का आभार जताते हुए उनका चेक वापस लौटा दिया था. 

ईदी फाउंडेशन के चेयरमैन अब्दुल सत्तार ईदी का शुक्रवार की रात कराची में निधन हो गया. उनकी उम्र 88 साल थी. कराची के नेशनल स्टेडियम में ईदी के जनाजे की नमाज पढ़ी जाएगी और फिर उसकेे बाद ईदी गांव में उन्हें सुपुर्द ए खाक किया जाएगा.

2013 में ईदी की किडनी ने काम करना बंद कर दिया था. खराब सेहत की वजह से उनका ट्रांसप्लांट नहीं किया जा सका. सिंध इंस्टीट्यूट ऑफ यूरोलॉजी एंड ट्रांसप्लांटेशन में उनका इलाज चल रहा था.

जून महीने में पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने उन्हें विदेश में इलाज कराए जाने की पेशकश की थी लेकिन उन्होंने देश में ही रहकर इलाज किए जाने की जरूरत बताते हुए उनकी पेशकश को विनम्रतापूर्वक खारिज कर दिया.

ईदी अपनी विनम्रता और साफगोई के लिए जाने जाते थे. पाकिस्तान में करीब एक दशक तक रही गूंगी और बहरी गीता के भारत लौटने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईदी फाउंडेशन को एक करोड़ रुपये का चेक दिया था. 

करीब एक दशक तक ईदी फाउंडेशन ने गीता की देखभाल की थी. ईदी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से की गई मदद की घोषणा का आभार जताते हुए उनका चेक वापस लौटा दिया था.

गरीबों की मदद सत्तार ईदी का जीवन था. मरने के पहले उनके आखिरी शब्द थे, 'मेरे मुल्क के गरीबों का ख्याल रखना.'

पाकिस्तान में रहने के दौरान गीता की देखभाल सत्तार ईदी की पत्नी बिल्किस बानो ने की थी. मोदी ने कहा था, 'ईदी परिवार ने जो किया,  उसकी कोई कीमत नहीं लेकिन मैं उनके फाउंडेशन 1 करोड़ रुपये की मदद देना चाहता हूं.' गीता करीब 8 साल की उम्र में समझौता एक्सप्रेस से होते हुए पाकिस्तान पहुंच गई थी. बाद में ईदी फाउंडेशन ने गीता को गोद ले लिया था. 

गरीबों की मदद सत्तार ईदी का जीवन था. मरने के पहले उनके आखिरी शब्द थे, 'मेरे मुल्क के गरीबों का ख्याल रखना.' उन्होंने अपना शरीर के पूरे अंगों को मानवता की सेवा में दान कर दिया था.

ईदी की यात्रा

अब्दुल सत्तार ईदी का जन्म गुजरात के एक कारोबारी परिवार में हुआ था. वह बंटवारे के बाद 1947 में पाकिस्तान पहुंचे. उनकी मां लकवे से पीड़ित थी और उन्हें समुचित इलाज नहीं मिल पाया. इलाज के बिना तड़पती उनकी मां की पीड़ा ही आगे चलकर सत्तार के जीवन का मकसद बनी और उन्होंने गरीबों की मदद का बीड़ा उठाया.

उम्मीद और आदर्श से भरपूरे सत्तार ने 1951 में कराची में अपना पहला क्लीनिक खोला. अपनी किताब 'ए मिरर टू द ब्लाइंड' में सत्तार लिखते हैं, 'सामाजिक कल्याण मेरा पेशा है.'

अपने जीवनकाल के दौरान सत्तार और उनकी टीम ने हर संभव तरीके से उन लोगों की मदद की जो असहाय थे. उनके फाउंडेशन में 1,500 एंबुलेंस हैं जो दिन रात काम में लगे रहते हैं.

पाकिस्तानी नायक

ईदी ने जिनता बड़ा साम्राज्य खड़ा किया, उसमें उनके लिए कुछ भी नहीं था. उन्होंने पाकिस्तान का सबसे बड़ा कल्याणकारी संगठन खड़ा किया और यह निजी मदद के भरोसे सत्तार ने अकेले खड़ा किया.

सादगी उनके जीवन का मूलमंत्र रहा. सत्तार के पास दो जोड़ी कपड़े थे और वह बिना खिड़की के कमरे में सोते थे जबकि पास ही के उनके ऑफिस में संगरमरमर जड़ित फर्श था. सत्तार के कमरे में महज एक बिछावन और हॉटप्लेट था.

सत्तार ने अपने बच्चों के लिए घर नहीं बनाया. उनकी पत्नी बिल्किस महिलाओं और बच्चों के लिए काम करती हैं. उन्हेंं कई बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए मनोनीत किया गया. इस साल भी उनका नाम सूची में था. हालांकि पाकिस्तान से इस बार शांति के लिए नोबल पुरस्कार मलाला युसूफजई को मिला.

First published: 9 July 2016, 15:33 IST
 
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