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पाकिस्तान से उठ रही है बदलाव की हवा

हफीज़ चाचड़ | Updated on: 26 March 2016, 8:40 IST
QUICK PILL
  • पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान में कुछ ऐसे बदलाव हुए हैं जिसकी कभी कल्पना भी नही की जा सकती थी. जब भारत में असहिष्णुता, दक्षिणपंथ का प्रभाव बढ़ने की बात हो रही है तब पड़ोसी पाकिस्तान \r\nइसके ठीक विपरीत कारणों से सुर्खियां बटोर रहा है.
  • नब्बे के दशक के अंत तक पाकिस्तान की अंदरूनी स्थितयां बहुत खराब हो गईं. \r\nमजहबी कट्टरपंथ ने उलट कर सरकार पर ही वार करना शुरू कर दिया.
  • कुछ दिन पहले पाकिस्तानी संसद के निचले सदन में एक बिल पेश \r\nकिया गया जिसमें सरकार से मांग की गई कि पाकिस्तान में होली, दिवाली और \r\nईस्टर पर आम छुट्टी होनी चाहिए. यह बिल बिना किसी \r\nअड़चन के बहुमत से पारित हो गया.

यह अजीब विडंबना है जब भारत में असहिष्णुता, कट्टरता, गोमाता को लेकर नित नए विवाद जन्म ले रहे हैं, दक्षिणपंथ का प्रभाव बढ़ने की बात हो रही है तब पड़ोसी पाकिस्तान इसके ठीक विपरीत कारणों से सुर्खियां बटोर रहा है.

दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान के वजूद में आने के वक्त यहां कट्टरपंथ या आतंकवाद जैसी बीमारी नहीं थी. भारत की तरह ही पाकिस्तान भी एक उदार, प्रगतिशील मुल्क था. ज़ुल्फिक़ार अली भुट्टो की अगुवाई में यह बाकी दुनिया की कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा था. स्थितियां इसके बाद एकदम से बदलीं. सैन्य तानाशाह ज़िया उल हक़ ने तख़्तापलट करके जुल्फिकार को फांसी पर चढ़ा दिया और पूरा मुल्क एक उल्टी दिशा में चल पड़ा.

ज़िया ने स्टेट के स्तर पर पाकिस्तानी समाज के इस्लामीकरण की बुनियाद रखी. इसके नतीजे में आतंकवाद के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर कट्टरपंथ की एक उर्वर ज़मीन तैयार हुई. इसका नशा तो पाकिस्तान की बहुसंख्यक आबादी (मुसलमान) पर चढ़ा लेकिन इसका खामियाजा वहां कि अल्पसंख्यक आबादी ने ज्यादा भुगता. हिंदू, ईसाई और अहमदिया जैसे अल्पसंख्यक समुदाय लगभग तबाही की कगार पर पहुंचा दिए गए.

ज़िया ने स्टेट के स्तर पर पाकिस्तानी समाज के इस्लामीकरण की बुनियाद रखी

नब्बे के दशक के अंत तक पाकिस्तान की अंदरूनी स्थितयां बहुत खराब हो गईं. मजहबी कट्टरपंथ ने उलट कर सरकार पर ही वार करना शुरू कर दिया. तब पाकिस्तान को इस गलती का अहसास हुआ, थोड़ा कम ही सही. जनरल जिया उल हक द्वारा शुरू किए गए इस्लामीकरण को एक अन्य सैन्य शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने खत्म करने की शुरुआत की.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आतंकवाद के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की जंग में करीब 45 हज़ार लोग मारे जा चुके हैं जिनमें 5000फ़ौजी और 40,000 आम लोग शामिल हैं. सैंकड़ों हिंदू, ईसाई, अहमदी, शिया और दूसरे अल्पसंख्यक देश छोड़ चुके हैं. मगर पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान में कुछ ऐसे बदलाव हुए हैं जिसकी कभी कल्पना भी नही की जा सकती थी.

होली-दिवाली की सरकारी छुट्टी

कुछ दिन पहले पाकिस्तानी संसद के निचले सदन नेशनल असेंबली में एक बिल पेश किया गया जिसमें सरकार से मांग की गई कि पाकिस्तान में होली, दिवाली और ईस्टर पर आम छुट्टी होनी चाहिए. चौंकाने वाली बात यह है कि बिल बिना किसी अड़चन के बहुमत से पारित हो गया. यह बिल सत्ताधारी पार्टी मुस्लिम लीग (नवाज़) के सांसद मुकेश कुमार वांकवानी ने पेश किया. उन्होंने मांग रखी कि हिंदुओं के धार्मिक उत्सव होली, दिवाली और ईसाईयों के ईस्टर पर आम छुट्टी होनी चाहिए.

फरवरी में पाकिस्तान की संसदीय समिति ने हिंदू मैरिज रजिस्ट्रेशन बिल को मंज़ूरी दी थी

वैसे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के धार्मिक उत्सवों पर सिर्फ उनको ही छुट्टी का प्रावधान पहले से था. लेकिन इन त्यौहारों पर तमाम दफ्तर, स्कूल और दूसरे इदारे रोज की तरह खुले रहते हैं. अब पाकिस्तान सरकार एक ऐसा कदम उठाने जा रही है जिससे पाकिस्तान के अल्पसख्यकों को यह अहसास होगा कि वह भी इस मुल्क में बराबर के शहरी हैं.

हालांकि अभी तक केंद्र सरकार ने छुट्टी का नोटीफीकेशन जारी नहीं किया है. सिंध प्रांत की सरकार ने इसमें पहल करते हुए इतिहास रच दिया है और आने वाली होली पर पूरे प्रांत में आम छुट्टी की घोषणा कर दी है. यह पहली बार हुआ है कि अल्पसंख्यकों के किसी धार्मिक उत्सव पर एक इस्लामी देश में आम छुट्टी का ऐलान हुआ है. पाकिस्तान मोहम्मद अली जिन्ना के उदारवादी समाज के सपने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ चुका है.

हिंदू मैरिज रजिस्ट्रेशन एक्ट

इससे ठीक पहले फरवरी में पाकिस्तान की संसदीय समिति ने हिंदू मैरिज रजिस्ट्रेशन बिल को मंज़ूरी दी थी. सिंध असेंबली ने इस बिल को पूर्णबहुमत से पास कर दिया. कमाल की बात ये है कि उर्दू समेत पूरे पाकिस्तानी मीडिया ने इसका ज़बरदस्त स्वागत किया.

इस बिल को हिंदू समुदाय में अधिकार देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. इस बिल की वजह से हिंदू समुदाय को पासपोर्ट, पहचान-पत्र या प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने में कानूनी पेंचीदगी का शिकार नहीं होना पड़ेगा.

रजिस्ट्रार की मौजूदगी में पंडित शादी करवाएगा. सरकार के पास इनकी शादी का रिकॉर्ड होगा. उम्मीद ये भी है कि हिंदू लड़कियों की जबरन होने वाली शादी में इस कानून से कमी आएगी. कमाल ये है कि उर्दू समेत पूरे पाकिस्तानी मीडिया ने अल्पसंख्यकों को दिए गए इस अधिकार का स्वागत किया है.

कादरी को फांसी, जनभावना की कीमत पर

यह बदलाव पाकिस्तान के इतिहास का एक बड़ा हिस्सा हो सकता है. पहली बार पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून के मामले में एक हाई-प्रोफाईल फांसी की सज़ा हुई है. यह फांसी पंजाब के पूर्व गवर्नर और देश के उदारवादी नेता सलमान तासीर के हत्यारे मुमताज़ क़ादरी को हुई है. पाकिस्तान में किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि कादरी को फांसी हो सकती है.

पाकिस्तानी समाज़ पर मज़बूत पकड़ रखने वाले धार्मिक गुटों ने मुमताज़ क़ादरी की रिहाई के लिए जबरदस्त मुहिम छेड़ रखी थी. उसका दबाव केस की सुनवाई कर रहे जज पर भी हुआ था. बावजूद इसके, उनकी फांसी की सज़ा को बरकरार रखा गया और तख़्ते पर लटकाया गया.

पाकिस्तानी समाज़ पर मज़बूत पकड़ रखने वाले धार्मिक गुटों ने मुमताज़ क़ादरी की रिहाई के लिए जबरदस्त मुहिम छेड़ रखी थी

सिविलियन सरकार ने भी कादरी की सजा माफ नहीं की जबकि उसे इस बात का इल्म था कि क़ादरी को फांसी देने पर उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है, लेकिन वो पीछे नहीं हटी. फांसी की ख़बर फैलते ही दर्जनभर शहरों में तीखा विरोध भी हुआ.

एक तरफ से पाकिसतानी मीडिया ने इस मौके पर समझदारी से काम लिया और उन धार्मिक गुटों को बिल्कुल कवरेज नहीं दी जिसकी वजह से मामला तूल पकड़ने से बच गया. इसमें सरकार की बहुत भूमिका है. हालांकि कादरी की फांसी का बदला लेने के लिए आतंकियों ने पेशावर में धमाका करके डेढ़ दर्जन से ज़्यादा लोगों की हत्या भी कर दी.

इस फांसी के कुछ दिनों बाद सलमान तासीर का बेटा घर वापस पहुंच गया जिनको 2011 में उनके पिता की हत्या के कुछ महीनों बाद तालिबान चरमपंथियों ने अगवा किया था. उनकी वापसी एक बहुत बड़ी ख़बर थी. किसी ने सोचा भी नहीं था कि वो कभी वापस आएंगे. शहबाज़ तासीर की रिहाई कैसे हुई यह अभी तक रहस्य बना हुआ है.

महिला सुरक्षा बिल

चरमपंथ से इतर पाकिस्तानी समाज में महिलाओं की हालत में सुधार के लिए महिला सुरक्षा बिल लाया गया है. काउंसिल ऑफ इस्लामिक आइडियोलॉजी समेत मौलाना फज़लुर्रहमान की पार्टी इसका ज़बरदस्त विरोध कर रही है लेकिन सरकार ने घुटने नहीं टेके. पंजाब सरकार ने इस कानून को प्रभावी कर दिया है लेकिन विरोध थम नहीं रहा है.

टर्निंग प्वाइंट

पाकिस्तानी सरकार और सेना की सोच में यह बदलाव 16 दिसंबर 2014 में पेशावर स्थित आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए हमले के बाद देखने को मिला है. इस हादसे के बाद पाकिस्तान ने सिर्फ फांसी पर लगी पाबंदी को हटा लिया, बल्कि फांसी पाए आतंकियों को लटकाया भी जाने लगा.

जनवरी में सरकार ने संसद को सौंपी रिपोर्ट में बताया कि अभी तक 332 लोगों को फांसी दी जा चुकी है. एमनेस्टी समेत तमाम अंतरराष्ट्रीय संगठन लगातार दबाव बना रहे हैं कि वो फांसी पर रोक लगाए लेकिन पाकिस्तान पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है.

रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने 172 ऐसे संदिग्ध मज़हबी स्कूलों को बंद कर दिया गया है जिनके तार आतंकियों से जुड़े होने की आशंका थी. उन्मादी और भड़काऊ जानकारी फैलाने वाले 993 यूआरएल और 10 वेबसाइट भी बंद कर दी गई हैं. इसके अलावा सरकार ने 98.3 मिलियन सिमकार्ड भी बंद कर दिए जो बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे थे.

इस दौरान सरकार ने हेट स्पीच के 2 हज़ार से ज़्यादा केस रजिस्टर करके 2,195 लोगों को गिरफ्तार किया है. 70 ऐसी दुकानों को बंद कर दिया गया जहां उन्मादी तकरीरों वाली सीडी और फिल्में बिका करती थीं.

रिपोर्ट कहती है कि आर्मी स्कूल पर हुए हमले के बाद सेना की कार्रवाई से आतंकियों और अपराधियों की कमर टूटी है.

हेट स्पीच के 2 हज़ार से ज़्यादा केस रजिस्टर करके 2,195 लोगों को गिरफ्तार किया है.

भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने के भी कई अभूतपूर्व मामले सामने आ रहे हैं. महाशिवरात्रि के मौके पर पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार अब्दुल नासिर जन्जुआ ने अलर्ट जारी कर बताया कि लश्कर और जैश के 10 आतंकी गुजरात की सीमा से भारत में घुसने की कोशिश कर रहे हैं.

भारतीय सुरक्षा एजेंसियां फौरन हरकत में आईं और एक बड़ा हमला टल गया. इससे पहले पाकिस्तान ऐसे अलर्ट देना तो दूर, मामला उजागर होने पर उसे मानता भी नहीं था.

इसी तरह पठानकोट हमले में जांच के लिए 27 मार्च को आ रहे पाकिस्तानी जांच दल को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे पहले दोनों देशों के इतिहास में इस तरह का तालमेल देखने को नहीं मिलता था.

सरकार की पहल पर पाकिस्तानी टीवी चैनलों को रेग्यूलेट करने वाली संस्था पेमरा ने भी हाल में एक गाइडलाइन जारी की है. इसमें कहा गया है कि चैनल भारत विरोधी सेंटीमेंट को भड़काने से बाज़ आएं. इससे पहले संस्था ने चरमपंथियों और अतिवादियों की कवरेज को लेकर भी निर्देश जारी किया था.

समय का पहिया गोल-गोल घूम रहा है. भारत और पाकिस्तान बिल्कुल अलग-अलग दिशाओं में जा रहे हैं.

First published: 26 March 2016, 8:40 IST
 
हफीज़ चाचड़ @catchhindi

लेखक पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार और डॉक्युमेंट्री फिल्म निर्माता हैं

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