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'चीन में सांस्कृतिक जनसंहार अभी जारी है'

भारत भूषण | Updated on: 4 May 2016, 23:03 IST

भारत के धर्मशाला में होने वाले सर्वधर्म सम्मेलन का आयोजन उस समय विवादों में आया जब इसमें शामिल होने के लिए आने वाले चार लोकतंत्र समर्थक नेताओं को भारत सरकार ने वीज़ा नहीं दिया. ये सम्मेलन चीनी विद्रोही नेता यांग जियानली के नेतृत्व में हो रहा था.

69 वर्षीय जियानली ने कैच को बताया कि भारत सरकार द्वारा चार लोगों को वीज़ा न दिए जाने के बावजूद आठ चीनी एक्टिविस्टों और अमेरिका के उइगर एसोसिएशन के अध्यक्ष इलशात हसन ने सम्मेलन में भागीदारी की.

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जियानली ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी की है. पीएचडी करने के बाद वो चीन जाकर अहिंसक लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए मजदूरों को संगठित करने लगे. जिसकी वजह से उन्हें  'जासूसी' के आरोप में पांच साल के लिए जेल में डाल दिया गया. संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप के बाद वो रिहा हो सके.

चार चीनी विद्रोही नेताओं को धर्मशाला सम्मेलन में आने के लिए भारत ने वीज़ा नहीं दिया

कैच ने धर्मशाला से अमेरिका जा रहे जियानली से पूरे मामले पर विस्तार से बात की. पेश है बातचीत के चुनिंदा अंश-

धर्मशाला में सर्वधर्म सम्मेलन कराने का क्या उद्देश्य था?


ये सम्मेलन सबसे पहले 2000 में आयोजित किया गया था. इसके माध्यम से पिछले एक दशक से तिब्बती लोगों से संवाद स्थापित करने की कोशिश की जा रही है. इसमें उइगर, मंगोलियाई, ईसाई, फालुन गॉन्ग के अनुयायी, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग और मकाऊ के लोग भी शामिल होते हैं.

ये सभी लोग चीन के कम्युनिस्ट शासन से छुटकारा चाहते हैं. हम ये सम्मेलन ज्यादातर अमेरिका में करते हैं. दो बार इसे ताइवान में आयोजित किया गया. अब हम इसे पूरी दुनिया में ले जाना चाहते हैं. खास तौर पर उन देशों में जो चीन के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं.

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हमें लगता है कि हमारे सम्मेलन से विभिन्न देशों और उनके सिविल सोसाइटी की चीन संबंधी रणनीति प्रभावित होगी.

चीन के लिए रणनीतिक रूप से भारत बहुत अहम है. हम दलाई लामा का उनके कार्यस्थल पर सम्मान करना चाहता थे. हमारा आंदोलन अहिंसक है. हमने 2000 में अपना सम्मेलन गांधी जयंति 2 अक्टूबर को आयोजित किया था.

चीन में जिन धार्मिक और नस्ली अल्पसंख्यकों का उत्पीडन हो रहा है उनमें साझा बात क्या है? इनमें से कुछ समुदाय धार्मिक अल्पसंख्यक हैं, कुछ नस्ली अल्पसंख्यक हैं. सबके आंदोलन का तरीका भी अलग है. उइगर आंदोलन हिंसक है, वहीं तिब्बती आंदोलन अहिंसक है. ये सभी किस एक बिंदु पर मिलते हैं?


मुझे लगता है कि हम सहिष्णुता और परस्पर समझ के सिद्धांत से एकजुट हैं. हम सब चीन के कम्युनिस्ट शासन से आजादी चाहते हैं. आपने कहा कि उइगर हिंसक हैं, लेकिन हम जिन उइगर के साथ काम कर रहे हैं वो अहिंसक हैं.

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भारत ने जिस उइगर नेता डोलकन ईसा को वीज़ा नहीं दिया वो अहिंसक आंदोलन के नेता हैं. मैं उनके संग पिछले दो दशकों से काम कर रहा हूं. वो आतंकवादी नहीं हैं, जैसा चीन कहता है.

दलाई लामा ने कहा है कि चीन दो स्वायत्तशासी क्षेत्रों शिनजियांग और तिब्बत में "सांस्कृतिक जनसंहार" किया है. क्या ये अब भी जारी है?


सांस्कृतिक जनसंहार अब भी जारी है. मसलन, अल्पसंख्यकों की भाषा गंभीर खतरे में है. अल्पसंख्यकों की भाषा पर न केवल सांस्कृतिक बल्कि आर्थिक दबाव भी है. उन्हें अच्छी नौकरी के लिए अपनी भाषा छोड़नी पड़ती है. ऐसी स्थिति बना दी गई है कि कुछ भाषाएं और धर्म समाप्ति के कगार पर हैं.

तिब्बतियों की जमीन, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधन और संस्कृतिक को विकास के नाम पर बरबाद किया जा रहा है. इन चीजों के बिना तिब्बती अस्मिता की क्या पहचान रह जाएगी?

तिब्बत के भविष्य को लेकर आप क्या सोचते हैं?


मुझे लगता है कि पहले तिब्बती भाषा और संस्कृति को बचाना चाहिए. उसके बाद ही वो अपनी भौगोलक पहचान को बचा सकते हैं और आत्म-निर्णय के अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं.

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मैं किसी राजनीतिक लक्ष्य को पाने के लिए ताकत के इस्तेमाल के खिलाफ हूं. तिब्बती किसी भी लोकतांत्रिक विकल्प का चुनाव कर सकते हैं. वो दलाई लामा के मध्यम मार्ग या किसी भी दूसरे विकल्प को चुन सकते हैं.

दलाई लामा के बाद तिब्बत आंदोलन का आप क्या भविष्य देखते हैं?


मेरे ख्याल से ऐसे होने में अभी काफी वक्त है लेकिन उसके बाद कोई आध्यात्मिक या सांस्कृतिक निर्वात नहीं पैदा होना चाहिए. वरना, चीन दलाई लामा का अपना अवतार पेश कर देगा और तिब्बती लोग विभाजित हो जाएंगे.

शायद इसीलिए दलाई लामा ने पहले से ही अपने कई अधिकार लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेताओं को दे दिए हैं. उन्होंने पहले से ही एक राजनीतिक संस्था बना दी है जिसपर तिब्बती लोग भरोसा कर सकते हैं.

14वें दलाई लामा एक विलक्षण संपत्ति हैं. उनके जैसा कोई दूसरा नहीं होगा

आपको समझना होगा कि 14वें दलाई लामा विलक्षण संपत्ति हैं. उनके जैसा कोई दूसरा नहीं होगा. इसलिए मुझे अगले दलाई लामा से अधिक मौजूदा लामा द्वारा बनाए जा रहे लोकतांत्रिक व्यवस्था में यकीन है.

उइगर नेताओं की चीन से अलग पूर्वी तुर्केस्तान की मांग कितनी विश्वसनीय है?


उनकी मुश्किल ज्यादा बड़ी है. उनके पास तिब्बतियों की तरह दलाई लामा के रूप में एक नेता नहीं है. बाकी नस्ली समूहों के लिए ऐसे निर्विवाद नेता की कल्पना भी संभव नहीं. फिर भी उन्हें अपना आंदोलन अहिंसक रूप से आगे बढ़ाना चाहिए. हिंसा से उनका कोई मकसद पूरा नहीं होगा. ये मैं केवल चीन की शक्ति के मद्देनजर नहीं बल्कि आतंकवाद को लेकर वर्तमान अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए कह रहा हूं.

क्या मध्य एशिया के देश जो चीन के पड़ोसी हैं, उइगर आंदोलन की मदद करेंगे? इन देशों में भौगोलिक विभिन्नता के बावजूद नस्ली एकता है


ये बहुत ही जटिल भौगोलिक और राजनीतिक मुद्दा है. हम ये नहीं कहते कि हमारे पास उइगर मुद्दे का कोई समाधान है. लेकिन हमें कछ साझा सिद्धांतों पर सहमत होना होगा. उइगर मुद्दे का समाधान लोकतांत्रिक तरीके से निकालना होगा.

चीन विद्रोह कर रहे सीमावर्ती प्रांतों को अपने साथ लाने में कितना सफल रहा है? क्या भविष्य में चीन सांस्कृतिक विविधता या बहुलता को स्वीकार करेगा?


मुझे लगता है कि बहुलता अनिवार्य है. लोकतंत्र की बहाली होने पर चीन की केंद्रीयकृत सत्ता खत्म हो जाएगी. मैं ये नहीं कह रहा है कि ये समूह चीन से अलग हो जाएंगे लेकिन उनका चीन की केंद्रीय सत्ता से लचीला जुड़ाव रहेगा.

अगर चीन बहुसांस्कृतिक और बहुलतावादी नहीं बनता तो क्या अहिंसक आंदोलन कोई दूसरा खतरनाक रूप ले सकते हैं?


हां, ऐसी आशंका है. बेसब्र नौजवान अहिंसा का रास्ता छोड़ भी सकते हैं. मैं अहिंसक आंदोलन का समर्थक हूं लेकिन चीन सरकार चाहती है कि ये आंदोलन चरमपंथ की राह पकड़े ले. चरमपंथी आंदोलन से निपटना सरकारों के लिए आसान होता है. ऐसे आंदोलनों के खिलाफ कार्रवाई को सरकार ज्यादा आसानी से न्यायोचित ठहरा देती है.

क्या चीन सोवियत संघ के तरह विघटित हो सकता है?


शायद. राज्यों और केंद्र का संबंध जरूर लचीला होगा लेकिन विघटन केवल एक संभावना है.

क्या आपको नहीं लगता कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय चाहता है कि चीन में स्थिरता रहे ताकि वो बाकी दुनिया के आर्थिक विकास की धूरी बना रहे?


चीन से जुड़ी विदेश नीति की बात करें तो बहुत से देश अपना अल्पकालिक हित देखते हैं. बहुत से देशों को ये लग सकता है कि चीन के विघटन से अस्थिरता फैलेगी जिससे उनका तात्कालिक नुकसान होगा. लेकिन इस तरह की अस्थिरता लंबे समय में पूरी दुनिया में हितकारी साबित होगी.

हो सकता है कि चीन के विभिन्न समुदायों में नाराजगी हो लेकिन किसी लोकतांत्रिक आंदोलन का अभाव दिखता है?


चीन में कई विरोध प्रदर्शन होते हैं. इनमें बुद्धिजीवी और विद्रोही नेता भी शामिल होते हैं, जो सरकार के खिलाफ बोलते हैं. लेकिन एक लोकतांत्रिक विपक्ष के तौर पर किसी आंदोलन का अभाव है. हम इस दिशा में काम कर रहे हैं.

चीन में कई लोग लोकतंत्र के लिए संघर्ष को लेकर भयभीत रहते हैं क्योंकि इसके लिए बहुत रक्तपात होने की संभावना है. इसलिए वो इसमें शामिल नहीं होना चाहते. आपका क्या कहना है?


चीन में रक्तपात का 100 साल लंबा इतिहास है इसलिए बहुत से लोगों के अंदर ऐसा डर है. चीन सरकार भी लोगों के अंदर ऐसा डर भर रही है. लेकिन मेरा मानना है कि चीन शांतिपूर्ण तरीके से लोकतंत्र बन सकेगा. चीनी लोगों में आत्म-संगठन की शक्ति है. बस उन्हें मौका मिलना चाहिए. मसलन, इंटरनेट को ही देख लीजिए.

आप खुद कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रह चुके हैं. आपको उभरता हुआ सितारा माना जाता था. पार्टी से आपका मोहभंग क्यों हुआ?


जब मैं छोटा था मैंने सांस्कृतिक क्रांति देखी थी. मैंने कम्युनिस्ट पार्टी का हिंसक रूप देखा. बाद में मैंने पार्टी ज्वाइन कर ली. बाद में मुझे एहसास हुआ कि पार्टी खुद को बदलने के बजाय हमें ही बदल रही है. पार्टी में मेरा काम अपने साथियों पर नजर रखना था. मुझे ये नहीं पसंद था. बाद में थियानमन चौक पर हुए नरसंहार का चश्मदीद बना. उसके बाद मेरी राह अलग हो गई.

First published: 4 May 2016, 23:03 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

Editor of Catch News, Bharat has been a hack for 25 years. He has been the founding Editor of Mail Today, Executive Editor of the Hindustan Times, Editor of The Telegraph in Delhi, Editor of the Express News Service, Washington Correspondent of the Indian Express and an Assistant Editor with The Times of India.

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