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एनएसजी की सदस्यता में चीन का अड़ंगा

सादिक़ नक़वी | Updated on: 10 June 2016, 22:49 IST
QUICK PILL
  • वैसे तो 2008 में दोनों देशों के बीच हुए परमाणु करार के बाद अमेरिका 2010 से ही भारत का समर्थन करता आ रहा है. राजनयिकों के अनुसार अमेरिका भारत की एनएसजी सदस्यता पर गतिरोध को खत्म करने के लिए दबाव डाल रहा है.
  • चीन समेत कई देश भारत की सदस्यता का विरोध कर रहे हैं. चीन विरोध करने वाले इन देशों का अगुआ बना हुआ है. चीन को भारत और अमरीका के बीच बढ़ती दोस्ती से भी चिंता है.

परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता के दावे पर विचार के लिए एनएसजी की बैठक ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में हुई. इसमें ज्यादातर सदस्य देशों से सकारात्मक संकेत मिले हैं लेकिन चीन का विरोध एक बार फिर सामने आ गया.

हालांकि भारत की सदस्यता को लेकर फैसला 20 जून से पहले नहीं होना है, जब सियोल में एनएसजी की बैठक होगी. पाकिस्तान चाहता है कि उसे भी एनएसजी की सदस्यता मिले. 

चीन का विरोध बरकरार है, पर दो देशों टर्की और न्यूजीलैंड ने अपना रवैया कुछ लचीला किया है

उधर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पांच दिवसीय विदेश यात्रा पूरी हो गई है. अपनी इस यात्रा में उन्होंने एनएसजी की सदस्यता के लिए स्विट्जरलैंड और मैक्सिको का भी समर्थन हासिल कर लिया है.

पढ़ेंः एनएसजी में भारत के प्रवेश की राह का रोड़ा बना चीन

प्रधानमंत्री मोदी के अलावा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज समेत वरिष्ठ राजनयिक भी भारत के लिए लॉबिइंग कर रहे हैं. सचिवों ने भी दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, टर्की समेत अन्य एनएसजी देशों में जाकर भारत के लिए समर्थन मांगा है. 

खबरों के अनुसार चीन का विरोध बरकरार है, पर दो देशों टर्की और न्यूजीलैंड ने अपना रवैया कुछ लचीला किया है.

भारत के लिए क्या हैं मौके

वैसे तो 2008 में दोनों देशों के बीच हुए परमाणु करार के बाद अमरीका 2010 से ही भारत का समर्थन करता आ रहा है. अमेरिका के दखल से भारत को विशेष लाभ मिल रहे हैं. राजनयिकों के अनुसार अमेरिका भारत की एनएसजी सदस्यता पर गतिरोध को खत्म करने के लिए दबाव डाल रहा है.

अमेरिकी विदेशमंत्री जॉन केरी ने सदस्यों को पत्र लिखकर कहा है कि वे एनएसजी में भारत के दाखिले को लेकर बने मतैक्य को समर्थन दें. 

बताते चलें कि एनएसजी में प्रवेश सहमति के आधार पर होता है और विरोध करने वाला देश सदस्यता हासिल करने में देरी की वजह बन सकता है.

पढ़ेंः 'मिशन एनएसजी' में भारत को मैक्सिको का भी मिला समर्थन

एनएसजी में 48 देश शामिल हैं. मजे की बात यह है कि एनएसजी का गठन 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण करने के बाद ही हुआ था. 

एनएसजी की सदस्यता मिल जाने से भारत परमाणु से जुड़ी सारी तकनीक और यूरेनियम सदस्य देशों से बिना किसी समझौते के हासिल कर सकेगा.

भारत का कहना है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों का 40 फीसदी हिस्सा गैर जीवाश्म ईंधन से पूरी करना चाहता है. इससे जहां प्रधानमंत्री मोदी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी, वहीं एक बार सदस्य बनने के बाद भारत की अंतरराष्ट्रीय साख में भी वृद्धि होगी.

गतिरोध

चीन समेत कई देश भारत की सदस्यता का विरोध कर रहे हैं. चीन विरोध करने वाले इन देशों का अगुआ बना हुआ है. चीन को भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती दोस्ती से भी चिंता है. 

उसे डर है कि दोनों देश मिलकर इस उपमहाद्वीप में बीजिंग के प्रभाव को नहीं बढ़ने देंगे और दोनों एक रणनीतिक शक्ति के रूप में उभरेंगे.

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एक और बात है, चीन दक्षिणी चीन समुद्री क्षेत्र में अपने अधिकार को लेकर जो दावे करता है, उस पर अमेरिका की तरफ से उसे कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ेगा. 

अमेरिका ने चीन द्वारा इस क्षेत्र में मानव निर्मित द्वीप बनाए जाने और उनपर हवाईपट्टी व बंदरगाह बनाने को लेकर भी कड़ी आपत्ति जताई है. फिलीपींस समेत कई अन्य देशों ने भी चीन के इस दावे पर आपत्ति जताई है.

वैसे चीन 2008 से ही भारत का विरोध करता रहा है जब से उसे अमेरिका के दखल से परमाणु मुद्दे पर विशेष लाभ मिले. 

एनएसजी का निर्णय ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे दक्षिण एशिया में संतुलन बिगड़े

पढ़ेंः एनएसजी में सदस्यता के लिए भारत को मिला स्विट्जरलैंड का समर्थन

चीन एनएसजी में भारत की सदस्यता का विरोध वह इस आधार पर कर रहा है कि भारत ने अभी तक परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत नहीं किए हैं.

चीन का कहना है कि सिर्फ परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत करने वाले देशों को ही एनएसजी की सदस्यता मिलनी चाहिए. 

एनएसजी का निर्णय ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे दक्षिण एशिया में संतुलन बिगड़े. जबकि भारत का कहना है कि यह भेदभावपूर्ण नहीं है.

चीन खुलेआम पाकिस्तान का साथ इसलिए दे रहा है कि एनएसजी की सदस्यता मिल जाने से दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन भारत की ओर झुक जाएगा. पाकिस्तान, चीन का निकट सहयोगी है. 

पढ़ेंः एनएसजी और एमटीसीआर पर भारत को मिला अमेरिका का साथ

उसने अभी हाल में चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर बनाने के लिए बहुत बड़ी राशि पाकिस्तान को देने का प्रस्ताव किया है. चीन पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट विकसित करने में भी मदद कर रहा है.

पाकिस्तान ने भी एनएसजी में अपनी सदस्यता के लिए लॉबिइंग की है. पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सशक्त सलाहकार सरताज अजीज ने रूस, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड से समर्थन मांगा है. 

वह पहले ही कह चुके हैं कि गैर भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण के लिए पाकिस्तान का प्रयास फलीभूत होगा. वह संकेत दे चुके हैं कि पड़ोसी देश भारत को एनएसजी में शामिल करने के खिलाफ लॉबिइंग कर रहे हैं.

चीन का ये भी कहना है कि यदि किसी तरह की रियायत देकर भारत को एनएसजी की सदस्यता दी जाती है तो पाकिस्तान को भी इस संगठन की सदस्यता दी जानी चाहिए.

First published: 10 June 2016, 22:49 IST
 
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