Home » इंटरनेशनल » communist party of nepal withdraw his support form oli govt
 

काठमांडू की तरक्की की राह में काठ बहुत हैं, मखमल कम है

सीके लाल | Updated on: 15 July 2016, 14:30 IST

आम धारणा यही है कि नेपाल की सत्तागत राजनीति में जो अकेली चीज निश्चित है वह है यहां निरंतर बनी रहने वाली अनिश्चितता. प्रधानमंत्री खडग प्रसाद शर्मा ओली की सरकार 12 जुलाई को संसद में बहुमत खोने के बाद अल्पमत में आ गई है.

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) ने सत्तारुढ़ गठबंधन का साथ छोड़ते हुए तुरन्त प्रभाव से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी.

अल्पमत में आने के दो दिन पहले तक ओली बड़बोलेपन में कह रहे थे कि उनकी सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी और अगले चुनाव का परिणाम ही वर्तमान सरकार का भविष्य तय करेगा.

वह कैबिनेट का विस्तार कर रहे हैं. इस लिहाज से ओली ने अब पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया है, लेकिन उन्होंने कानूनी आधार पर इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है.

पढ़ें: क्या नेपाल सचमुच चीन के करीब जा रहा है?

उन्होंने तय किया है कि वे संसद में अपनी क्षमता प्रदर्शित करेंगे. संसद ही उनका फैसला करेगी. उनके इस फैसले से नई सरकार के गठन में अड़चन पैदा होगी और नई सरकार बनने में कई हफ्ते लग जाएंगे.

अविश्वास प्रस्ताव पारित होने में संख्या बल कोई समस्या नहीं है. प्रस्तावित माओवादी-नेपाली कांग्रेस गठबंधन को संसद के पटल पर बहुमत साबित करने के लिए अन्य पार्टियों के केवल दस मतों की जरूरत है.

मधेसी दल पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि वे सरकार में शामिल हुए बिना बाहर से समर्थन देंगे. ऐसे में प्रधानमंत्री बनने के इंतजार में बैठे पुष्प कमल दहल प्रचंड को अपने सहयोगी दलों को कैबिनेट में मंत्री पद देने में काफी आसानी भी होगी.

सत्ता का हस्तांतरण

सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया नई समस्याओं को जन्म दे सकती है. यदि सीपीएन (यूएमएल) जो संसद में दूसरा सबसे बड़ा दल है, सरकार में बने रहने के लिए कानूनी पेंच निकालने लगा तो जितने लम्बे समय तक चाहे वह सरकार के गठन को टाल सकता है.

कानून पर पूरी तरह नियंत्रण, मीडिया और एनजीओ के साथ मिलीभगत कर यूएमएल राष्ट्रवाद के नाम पर सरकार का गठन कर सकती है.

नेपाली राजनीति की एक और सच साजिशों या षडयंत्रों के चलते अदालतों का सत्ता पर हावी रहना भी है जिसका अक्सर परिणाम यह निकलता है कि कई समझौतों पर रोक लग जाती है.

पढ़ें: चीन-नेपाल गठजोड़ और भारत के कूटनीतिक जाम में फंसी बुद्ध की विरासत

नेपाल के राजनीतिक दलों ने संविधान का मसौदा तैयार करने के विवादित मुद्दे पर लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध को खत्म करते हुए आठ जून 2015 को 16 सूत्री समझौते को मूर्त रूप दिया था.

इस समझौते में नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-यूएमएल, यूसीपीएन (माओवादी) और मधेसी पीपुल्स राइट फोरम-डेमोक्रेटिक (एफपीआरएफ-डी) दल शामिल थे.

समझौते के अनुसार राष्ट्रपति का पद यूएमएल और नेपाली कांग्रेस के पास जाना था तथा प्रधानमंत्री का पद माओइस्ट के पास रहना था.

नेपाली कांग्रेस के कुछ प्रस्तावों के चलते उत्तरार्ध का भाग क्रियान्वित नहीं हो सका और यह समझौता संवैधानिक मुद्दों को हल किए बिना ही खत्म हो गया.

पढ़ें: कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए सैकड़ों तीर्थयात्री नेपाल-तिब्बत सीमा पर फंसे

नेपाली कांग्रेस ने इसका प्रतिकार करने में कुछ वक्त लिया लेकिन उसकी कोशिश यूएमएल से बदला लेने की रही. उसने इसी साल मई में माओवादियों के साथ नौ सूत्रीय समझौते पर दस्तखत किए.

इस कठिन समय में दहल ने खुद को अलग-थलग रखा. बताते हैं कि चीन की उन पर तीखी निगाह थी और यह समझौता निरर्थक हो गया.

तब ओली ने पद पर बने रहने के लिए माओवादियों के साथ नौ सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए. हालांकि इस समझौते की प्रतिबद्धता को क्रियान्वित करने का उनका कोई इरादा नहीं था.

अब राजनीतिक प्रतिबद्धता के नाम पर काफी संख्या में स्वीकारे जाने वाले अन्य मुद्दे भी हैं. इनका भविष्य भी कुछ निश्चित नहीं दिखाई देता. इस लिहाज से सरकार का बदलना तय दिख रहा है.

सुधारों की गुत्थी

नेपाल की दो तिहाई आबादी में मधेसी और आदिवासी आते हैं. मधेसी और जनजाति नए संविधान के कुछ निश्चित मूल उपबंधों में संशोधन के लिए आंदोलन कर चुके हैं.

उनकी प्रमुख मांगों में, प्रांतीय सीमाओं का पुनर्गठन, जनसंख्या आधारित चुनाव क्षेत्रों का गठन आदि शामिल है. उनके प्रदर्शनों के दौरान हिंसक घटनाएं भी हुई हैं जिनमें लोगों की जानें भी गईं हैं.

कहा जाता है कि गत 11 जुलाई को जो सात्र सूत्रीय समझौता हुआ है उसमें मधेशियों, जनजातियों और दलितों की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है. हालांकि संविधान में संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत का होना जरूरी है.

ऐसे किसी भी कदम के लिए यूएमएल का साथ मिलना कठिन है क्योंकि यूएमएल का अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ गठबंधन को बढ़ाना असंभव सा है.

पढ़ें: सत्ताधारी कुलीनों के कुचक्र में फंसा नेपाल-भारत संबंध

गवर्नेन्स में सुधार भी मुश्किल है. हालांकि प्रधानमंत्री ओली अपने पद पर केवल नौ माह से ही हैं लेकिन इस अंतराल में ही उन्होंने यूएमएल के निष्ठावान लोगों के साथ आंतरिक सरकारी तंत्र को अपने पक्ष में करने में कामयाबी पाई है.

नई सरकार के लिए अपने विरोधी राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली के साथ प्रभावी तरीके से काम करना बहुत ही कठिन होगा.

मुद्दों की अंदरुनी कहानी

प्रधानमंत्री ओली की अस्पष्ट और गैरजवाबदेह प्रचार योजना से भी समस्या बने रहने की आशंका है. प्रधानमंत्री ओली ने ढेर सारे आश्वासन भी दिए हैं.

जैसे कि हर घर में पाइप लाइन के जरिए गैस आपूर्ति, इस पाइपलाइन को ल्हासा से लुंबिनी तक पाइप लाइन से जोड़ा जाना है, अंतरिक्ष में नेपाली सैटेलाइट को भेजना, नेपाली जहाजों को महासागरों तक भेजना आदि.

उन्हें लगता है कि उनकी राष्ट्रवादी सरकार अनिश्चित अवधि तक सत्ता में बनी रहेगी. हाल ही में उनकी एक और मूखर्तापूर्ण योजना चीन से कोयला और पेट्रोलियम आयात कर उसे नेपाल में आपूर्ति करने की थी.

पढ़ें: नेपाल में फिर सुलगा मधेशी आंदोलन

कहना न होगा कि नेपाली लोगों का रोजमर्रा का जीवन काफी कष्टमय हो गया है. इसके चलते नई सरकार के सामने कई कठिन चुनौतियां उत्पन्न होंगी.

मानसून के दौरान देश के ज्यादातर हिस्सों में बिजली सात से आठ घंटे तक नहीं आती है. पानी की आपूर्ति भी ठीक से नहीं हो पाती है. राजधानी काठमांडू में ही बहुत कम पानी मिलता है और वह भी अनियमित तरीके से.

महंगाई की दर दो अंकों में चल रही है. सरकारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था बेहद बुरी दशा में पहुंच चुकी है और स्वास्थ्य सुविधाओं पर तो कोई बोलने वाला भी नहीं है.

पढ़ें: महबूबा की मांग: पूर्व आतंकियों की नेपाल के रास्ते घर वापसी हो

सीपीएन (एमसी) ने राष्ट्रीय सहमति वाली सरकार के गठन हेतु पहल के लिए अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचण्ड को अधिकृत किया है.

सात सूत्रीय जो समझौता हुआ है, उसके अनुसार दहल केवल नौ से दस महीने तक ही सत्ता में रहेंगे. उसके बाद वह सत्ता की बागडोर शेर बहादुर देउबा को सौंप देंगे.

उम्मीद फिर जगी

ओली के जाने से मधेशियों में कुछ आशा का संचार हो सकता है क्योंकि ओली के शासनकाल में पिछले साल पांच दर्जन से ज्यादा मधेशी प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है.

नई सरकार इनकी शिकायतों के निराकरण के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सकती है लेकिन वह कम से कम अपना दिखावटी प्रेम तो दिखाएगी ही.

नई सरकार से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों में भी कुछ उम्मीद जग सकती है. प्रधानमंत्री ओली के नेतृत्व में कुछ ही लोगों द्वारा लिए जाने वाले निर्णय संदेहपूर्ण रूप से इतने उलझे होते थे कि पूछिए मत.

पढ़ें: नेपाल में प्रचंड फिर बनेंगे प्रधानमंत्री!

उत्पाद संघ के मालिकों, सिंडीकेट ऑपेरटर्स और सभी तरह के नए पैसेवालों का यह घालमेल था जिसकी वजह से लोग अक्सर कारोबार करने से मुंह फेर लेते थे.

कम्युनिस्टों के अधीन काम करने की कठिनाइयों का अक्सर उल्लेख भी किया जाता रहा है. हालांकि वास्तविक कारण यही है कि ओली के शासनकाल में सत्ताधारी वर्ग और नव धनाढ्य वर्ग की ही चलती थी.

राजनीतिक हिसाब से देखा जाए तो काठमांडू में हिंदुत्व और राजशाही समर्थक वर्ग के प्रति नरेंद्र मोदी की तुष्टिकरण वाली नीतियों से उल्टा असर हुआ है. इसकी प्रतिक्रिया में कई बार नेपाली प्रतिष्ठान खुद को चीन से जोड़ता दिखता है.

पढ़ें: नेपाल: संकट में ओली सरकार, प्रचंड ने लिया समर्थन वापस

सम्प्रभुता की इस कवायद से सम्भवत: स्थिति को सामान्य बनाने में मदद मिलेगी. यदि नई सरकार भूकम्प से तबाह हुए क्षेत्र में पुनर्निर्माण कार्य शुरू करती है तो यह खुद को दोषमुक्त करने की दिशा में बड़ा कदम होगा.

इससे स्टालिनवादियों, राजशाही समर्थकों और माओवादियों के अवसरवादी गठबंधन के चंगुल से देश को बाहर करने में मदद मिली है.

गुनाहों की लम्बी सूची

प्रधानमंत्री ओली सरकार की गलतियों और अधिकारों के बेजा इस्तेमाल की एक लम्बी सूची है. यदि उनमें से केवल एक को ही लिया जाए तो वह है उनके कार्यकाल में गोरखा क्षेत्र में आए भूकम्प में फंसे लोगों की आपराधिक तरीके से उपेक्षा और लापरवाही.

पढ़ें: नेपाल के पीएम केपी ओली भारत का महत्व समझने में चूक गये

ओली ने अपने कार्यकाल में इस बात की कोई परवाह नहीं की कि उनके देश के सामाजिक ढांचे को दुनिया देख रही है. वह अपने चेहरे पर कृत्रिम मुस्कान ओढ़े रहे. आवेश में बैठी जनता सत्ता में उनके मूर्खतापूर्ण कामकाज को कभी नहीं भूलेगी.

First published: 15 July 2016, 14:30 IST
 
सीके लाल @CatchNews

The writer is a noted journalist and political columnist from Nepal.

पिछली कहानी
अगली कहानी