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अगले 15 सालों तक पेरिस जलवायु समझौते की गूंज सुनाई देगी

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • \r\n\r\n\r\n \r\n \r\n \r\n \r\n\r\n\r\nग्लोबल\r\nवार्मिंग के मसले पर पेरिस\r\nमें आयोजित संयुक्त राष्ट्र\r\nजलवायु सम्मेलन में हुए समझौते\r\nको ऐतिहासिक कहा जा रहा है.
  • \r\nपेरिस\r\nसमझौता ग्लोबल वार्मिंग को\r\nदो डिग्री\r\nसे नीचे रखने और 1.5 डिग्री\r\nके लक्ष्य को पाने की दिशा में\r\nकदम बढ़ाने के लिये तत्पर है.

बेहद ऐतिहासिक रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन का समापन 12 दिसंबर को पेरिस में हुआ.

दो सप्ताह तक चली वार्ताओं के दौर के बाद आखिरकार भारतीय समयानुसार अर्धरात्रि के करीब और पेरिस के समयानुसार शाम 7:30 बजे अंतिम समझौते को पूर्ण सहमति के साथ अपनाया गया. विभिन्न कारणों के चलते वार्ताओं का यह दौर पहले ही एक दिन के लिये बढ़ा दिया गया था और करार के मसौदे को अंतिम रूप देने में भी लगभग दो घंटे से अधिक की देरी हुई.

वर्ष 2020 से लेकर 2030 तक अमल में आने वाला यह जलवायु संबंधित समझौता एक ऐसा समझौता है जिसके बारे में आप आने वाले 15 वर्षों तक सुनेंगे.

यह पेरिस समझौता बिजली के निर्माण से लेकर अन्य कई चीजों पर कड़ी नजर रखेगा जिनमें मुख्य होगा कि किस प्रकार से कुछ चुनिंदा अमीर मुल्क बाढ़, सूखे और तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निबटने में गरीब राष्ट्रों की मदद करते हैं.

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन मानव जीवन के अस्तित्व के लिये सबसे बड़ी चुनौती है. 18वीं शताब्दी में प्रारंभ हुई औद्योगिक क्रांति ने हमें मुख्यतः जीवाश्म ईंधन पर निर्भर बना दिया है और हम बिजली से लेकर कारखानों और कृषि तक पूरी तरह से इसी पर निर्भर हैं. लेकिन यह इंधन बहुत बड़ी मात्रा में ऐसी गैसों का उत्सर्जन करते हैं जो सूरज की रोशनी को पूरी तरह तक धरती पर आने से रोकते हैं और उसे वातावरण में ही रोक देते हैं.

यही ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण है. इसके चलते धरती के तापमान में पहले से ही करीब 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है.

ग्लोबल वार्मिंग के चलते समूचे विश्व की जलवायु में परिर्वन देखने को मिल रहे हैं और साथ ही समुद्र का स्तर निरंतर बढ़ता जा रहा है

भयंकर तूफान आ रहे हैं और काफी बड़ी संख्या में जानवर और पेड़-पौधे असमय काल के ग्रास मे जा रहे हैं.

वास्तव में यह संपूर्ण मानवता के लिये एक बहुत बड़ा खतरा है और पेरिस समझौता मूलतः इस चुनौती से निबटने के बारे में ही है. बीते चार वर्षों से इस समझौते को तैयार करने और लागू करने के प्रयास निरंतर जारी थे.

एक बात बिल्कुल साफ है कि यह बहुत विस्तृत ध्येयों की पूर्ति करने वाला एक ऐतिहासिक समझौता है. आखिरकार यह अपने ध्येय की पूर्ति करने में कितना सफल रहा है?

इसकी खासियत क्या हैं?

1. विभिन्न जिम्मेदारियां

यह विकासशील देशों, विशेषकर भारत द्वारा की जाने वाली प्रमुख मांगों में से एक थी. चूंकि विकसित देश बड़ी मात्रा में इस जीवाश्म ईंधन का प्रयोग करते हुए अमीर और विकसित होने में सफल हुए हैं और इस क्रम में इन्होंने ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते हुए स्तर की परवाह नहीं की. ऐसे में इन देशों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने वाली गैसों के उत्सर्जन में कटौती करने के अलावा जलवायु परिवर्तन से निबटने में गरीब देशों की मदद करना इन विकसित देशों का नैतिक कर्तव्य है जिससे ये दूर नहीं भाग सकते.

जलवायु परिवर्तन को लेकर होने वाली अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं के लिये एक तरह से संविधान का दर्जा रखने वाले संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन का एक हिस्सा होने के बावजूद ये अमीर देश इस सिद्धांत को अपने हिसाब से बदलने और इसे दोबारा लिखने के प्रयास करते रहे हैं.

आखिरकार इस सिद्धांत को समझौते में शामिल किया गया लेकिन इसमें एक नुक्ता शामिल कर दिया गया, कि इसे वैश्विक स्तर पर लागू किया जाएगा लेकिन ‘‘विभिन्न राष्ट्रीय परिस्थितियों के आलोक में’’.

2. 1.5 डिग्री का लक्ष्य

पूर्व में इनका इरादा पूर्व-औद्योगिक युग के तापमान के मुकाबले ग्लोबल वार्मिंग में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि तक सीमित करने का था. लेकिन इसका सीधा सा मतलब था कि कम से कम तीन द्वीपीय राष्ट्र और असंख्य तटीय गांव और शहर समुद्र के पानी के नीचे समा गये होते और यह वहां के निवासियों के लिये मौत की सजा के समान होता.

उनके लिये 1.5 उिग्री का लक्ष्य बिल्कुल सटीक लक्ष्य है और पेरिस समझौता पहली बार इसपर स्वीकृति की मोहर लगाता है. इसका उद्देश्य तापमान को 2 डिग्री से जितना हो सके नीचे रखना है और 1.5 डिग्री के लक्ष्य को पाने के लिये प्रयास करते रहना है.

3. दीर्घकालिक जीवनशैली

इस समझौते की प्रस्तावना में ही दीर्घकालिक जीवनशैली का विस्तार से उल्लेख करने के अलावा यह लिखा है कि कैसे अमीर मुल्कों को इसे पाने में अपने कदम आगे बढ़ाने चाहियें. इसे भारत के लिये एक छोटी सी जीत के रूप में भी देखा जा सकता है जो हमेशा से ही पश्चिम की पारिस्थितिकी का विनाा करने वाली आदतों और जीवनशैली को लेकर विभिन्न मंचों पर अपना विरोध प्रकट करता आया है.

पेरिस समझौता ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री से नीचे रखने और 1.5 डिग्री के लक्ष्य को पाने की दिशा में कदम बढ़ाने के लिये तत्पर है

4. पारदर्शिता

यह समझौता विभिन्न देशों के जलवायु संबंधित कृत्यों को और अधिक पारदर्शी बनाने पर भी जोर देता है और इन्हें अमीर देशों के लिये और अधिक कठोर बना देता है. इसके अलावा इसे प्रत्येक देश की ‘परिस्थितियों’ के अनुसार लचीला रखते हुए इस प्रकार तैयार किया गया है कि यह गरीब देशों को काफी छूट प्रदान करता है.

एक बार फिर यह भारत के लिये एक जीत की तरह है क्योंकि भारत का हमेशा से ही इस बात पर जोर रहा है कि अमीर देशों के और अधिक पारदर्शी होने की आवश्यकता है और विकासशील देशों को समय के साथ इनका साथ देना चाहिये.

5. कुछ और अधिक करने का अंतिम मौका

पहली बार सीओपी21 ने ग्लोबल वार्मिंग में कटौती करने के लिये राष्ट्रों को अपने स्वयं के लक्ष्य निर्धारित करने की अनुमति प्रदान की है. लेकिन अधिकांश देशों ने जो इस दिशा में जो प्रतिबद्धता जाहिर की है वह पर्याप्त नहीं है क्योंकि इसके बावजूद भी वार्मिंग में करीब 3 डिग्री का इजाफा होगा.

इस पेरिस समझौते का कहना है कि इस समझौते के अस्तित्व में आने से दो वर्ष पहले यानि वर्ष 2018 तक देश चाहें तो और अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य भी प्रस्तुत कर सकते हैं.

क्या नहीं है

1. विकसित/विकासशील देशों की परिभाषा

दिलचस्प बात यह है कि सीओपी21 ने विकसित और विकासशील देशों की मौजूदा परिभाषा को लगभग पीछे ही छोड़ दिया है.

वर्ष 1992 में यूएनएफसीसीसी ने विकसित देशों को परिभाषित करते हुए एक सूची जारी की थी. इस सूची में इन देशों को ‘एनेक्स-1’ देश के नाम से दर्शाया गया था. लेकिन इन नए समझौते में एनेक्स-1 देशों के बारे में कुछ भी उल्लिखित नहीं है. इसमें इन्हें सिर्फ विकसित देश कहा गया है.

क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया के निदेशक संजय वशिष्ठ कहते हैं, ‘‘नई परिभाषा में कुछ भी स्पष्ट नहीं है हालांकि समझौता यह साफ तौर पर कहता है कि इस बात का विषयनिष्ठ मूल्यांकन किया जाएगा कि कौन किस श्रृेणी के अंतर्गत आएगा.’’ उनका कहना है कि यह सऊदी अरब और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को विकसित राष्ट्रों की कतार में शामिल करने का एक रास्ता है क्योंकि इन्हें वर्ष 1992 की सूची में शामिल नहीं किया जा सका था.

2. हानि और क्षति

इसमें शामिल ‘‘हानि और क्षति’’ की धारा के चलते अमीर मुल्क ग्लोबल वार्मिंग के फलस्वरूप होने वाले नुकसान के लिये उत्तरदायी ठहराये जा सकेंगे. साथ ही इसके फलस्वरूप गरीब देशों को ऐसे सभी नुकसानों की गणना करने और मौद्रिक क्षतिपूर्ति का दावा करने की भी छूट मिल जाती. लेकिन इन अधिकारों को बाहर करते हुए समझौते के मसौदे में इसे सिर्फ दिखावे के लिये शामिल किया गया है.

इसे बांग्लादेश जैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिये सबसे असुरक्षित देशों के लिये एक बड़े नुकसान के रूप में देखा जा रहा है

कोस्टल एसोसिएशन फाॅर सोशल ट्रास्फाॅर्मेशन ट्रस्ट (कोस्ट) के कार्यकारी निदेशक रेजाहुल करीम चैधरी कहते हैं, ‘‘बांग्लादेश जैसे देश अमीर मुल्कों से सहायता पाने में सक्षम नहीं होंगे और उन्हें सामने आने वाली आपदाओं का सामना अकेले ही करना पड़ेगा. इस धरती को सबसे अधिक प्रदूषित करने वालों को इस समझौते के मसौदे में बिना किसी दण्ड के छोड़ने का प्रवधान दिया गया है.’’

भारत ने अमीर देशों को दीर्घकालिक जीवनशैली अपनाने की ओर प्रेरित करने का एक बिंदु उठाया था जिसे स्वीकार किया गया.

3. कोई निर्धारित लक्ष्य नहीं हैं

इस समझौते में शामिल दीर्घकालिक लक्ष्य सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिये हैं कि वर्ष 2050 से 2100 के बीच उत्सर्जन अपने शिखर तक पहुंचने में कामयाब रहेगा और फिर उसके बाद यह कम होने लगेगा. यह पुराने मसौदों के मुकाबले बहुत ही कमजोर होने के साथ अपने लक्ष्य से दूर है क्योंकि पूर्व के मसौदे वास्तव में इसका बिल्कुल खुलकर उल्लेख करते थे कि वर्ष 2050 से 2100 के बीच कुल मिलाकर कितना उत्सर्जन कम होना चाहिये.

ग्रीनपीस ने एक बयान जारी कर जीवाश्म ईंधन को लेकर लचर रवैया अपनाए जाने पर इस समझौते की आलोचना की है. विशुद्ध रूप से शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने की दिशा में उनका कहना है, ‘‘इसे कम करने का सिर्फ एक ही तरीका है कि हम वर्ष 2050 तक जीवाश्म ईंधन के प्रयोग में जितनी संभव हो सके उतनी अधिकाधिक कटौती करें.’’

4. फाईनेंस

विकासशील देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्वयं को स्वच्छ ऊर्जा स्त्रोतों के उपयोग की तरफ बढ़ाने में आने वाली वित्तीय संसाधनों की कमी को लेकर आती है और इससे पार पाने के लिये वे अमीर देशों की तरफ वित्तीय सहायता की आस लगाए देखते हैं. इस चुनौती की तरफ अबतक खुले दिल से ध्यान ही नहीं दिया गया है. इसमें कहा गया है कि विकसित देश वित्तीय सहायता प्रदान करेंगे और विकासशील देश चाहें तो स्वैच्छिक रूप से ऐसा कर सकते हैं. इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं.

एक्शनऐड इंटरनेश्नल के चीफ एक्ज़ीक्यूटिव एड्रियानो कैम्पोलिना कहते हैं, ‘‘इस मसौदे में कई स्थानों पर जानते-बूझते बड़े अच्छे शब्दों के माध्यम से कुछ चूकों को शामिल किया गया है और उन्हें बिना किसी कानूनी अर्थ के बड़े ध्यान से शामिल किया है.’’

First published: 14 December 2015, 8:52 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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