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'पाकिस्तान: कोर्टिंग द एबिस' पाकिस्तान पर नीति बनाने में एक अहम किताब

विवेक काटजू | Updated on: 2 January 2017, 22:13 IST

अगर भारतीय नीति निर्माता पाकिस्तान के बारे में अपनी अगली नीति बनाना चाहते हैं, तो उनके लिए तिलक देवाशर की हाल ही में आई किताब ‘पाकिस्तान: कोर्टिंग द एबिस’ उपयोगी साबित होगी. वाघा बॉर्डर पर जो भारतीय उदारवादी अपनी आंखों में उम्मीद संजोए हैं, वे भी वस्तुस्थिति जानने के लिए इस किताब को पढऩा चाहेंगे. 

भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम समुदाय, खासकर उत्तरी-पूर्वी संभ्रांत वर्ग की पीड़ा से किताब की शुरुआत करने से लेकर, राजनीतिक सत्ता का विघटन, हिंदुओं के साथ समता बनाए रखने पर जोर, हिंदुओं की विरोधी नहीं तो विशिष्ट पहचान बनाने, और पाकिस्तान के निर्माण तक, देवाशर ने बड़ी कुशलता के साथ इस जटिल सफर का ब्यौरा दिया है, जो एकदम सटीक है.

जिन गलतियों ने पाकिस्तान को त्रस्त किया, वे 1857 की विफलता के बाद मुस्लिम नेतृत्व के अदूरदर्शी फैसलों का परिणाम थीं.

मोहम्मद अली जिन्ना हिंदू-मुस्लिम एकता के कभी राजदूत रहे थे. उनका नजरिया भी गैरसांप्रदायिक सिद्धांतों पर आधारित एकता और प्रगतिशील राजनीति का था. विभाजन से पहले के मुस्लिम नेतृत्व की विफलता से पाकिस्तान जैसी उलझनभरी, धार्मिक राजनीति का होना लाजिमी ही था. यह बेहद हैरानी की बात है कि पाकिस्तान अपने लिए एक सकारात्मक, अनुकूल पहचान बनाने में अक्षम है. 

मुस्लिमों के लिए वतन की धारणा को एक इस्लामिक राज्य के पक्ष में काफी पहले छोड़ दिया था. एक शांत इस्लामिक राज्य के पक्ष में स्वर अब नहीं रहे. रुढि़वादी इस्लामिक सिद्धांतों का हिंसक होना पाकिस्तान की गिरावट है, इस संबंध में देवाशर ने काफी विस्तार से लिखा है.

भारत स्थाई दुश्मन

विभाजन के बाद पाकिस्तानी नेतृत्व का रवैया भारत को लेकर पागलपन भरा रहा. इसकी वजह से पाकिस्तानी भारत की राज्य-व्यवस्था बनाने की कोशिशों और उसकी प्रकृति को गहराई से समझ नहीं पाए. नतीजतन वे पाकिस्तान के लिए भारत के नजरिए को भी समझने में विफल रहे. विभाजन के दौरान जो खून खराबा हुआ, और कश्मीर की घाटी पर अधिकार करने का जो जुनून सवार रहा, उससे पूरे पाकिस्तान में एक किस्म की राष्ट्रीय विक्षिप्तता विकसित हुई. 

इसका तर्कसंगत विकल्प यह सामने आया कि भारत के नजरिए से एक सही दूरदर्शी नेतृत्व की जरूरत है. सही मायने में जिन्ना और लियाकत खान के निधन के बाद इस दूरी को पाटने वाला कोई नहीं रहा और वे भी भारत को लेकर अदूरदर्शी थे. नतीजतन सेना ने उस दरार पर कब्जा कर लिया. उसके साथ ही देश की सुरक्षा नीतियों के नियंत्रण में शासन, चाहे प्रत्यक्ष रहा अथवा असैनिक, पाकिस्तान ने अपनी सुरक्षा के लिए सैनिक सत्ता पर भरोसा किया.

असैनिक पदाधिकारी सेना के अधीन हो गए और अब भी हैं. देवाशर इस संबंध में बहुत ज्यादा उदार हैं, जब वे कहते हैं कि जुल्फिकार अली भुट्टो या नवाज शरीफ या आसिफ जरदारी के पास सेना के कद को कम करने के मौके थे. सच तो यह है कि राजनीतिक वर्ग और पाकिस्तानी लोगों का दृढ़ विश्वास है कि भारत उनका स्थाई दुश्मन है. 

उनमें यह धारणा सेना भरती है और जब तक जन-चेतना में यह धारणा बनी हुई है, पाकिस्तान में सेना की श्रेष्ठता बरकरार रहेगी. इस संदर्भ में देवाशर देश के असैनिक समाज की नब्ज टटोल सकते थे, यदि भारतीय उदारवादियों को उससे काफी उम्मीद हो तो. 

कमियां

पाकिस्तान में बढ़ता उग्र सुधारवाद और संप्रदायवाद के उदय में अभिव्यक्ति, हिंसक विचारधारा और आतंकवाद, और पाकिस्तान का अपनी जमीन पर इसका इस्तेमाल- इन सबके बारे में देवाशर ने लिखा है. इसमें मजहब और उलेमा की भूमिका का प्रभाव, साथ ही अरब प्रायद्वीप से आर्थिक मदद की भी ठोस भूमिका रही है. किताब में इसका उल्लेख न होना चौंकाने वाला है. किताब के अगले एडिशन में उसके उल्लेख की आवश्यकता है. 

देवाशर ने अपनी किताब में पाकिस्तान में पानी और शिक्षा की स्थिति, अर्थव्यवस्था और देश की जनसांख्यकी पर नई और महत्वपूर्ण जानकारी दी है. पाकिस्तान के हालात पर लिखे विद्वतापूर्ण आलेखों में कभी-कभार ही इन सब का समावेश होता है. इन सबको पढक़र दुख होता है कि जिस देश की जनसंख्या विश्व में छठे नंबर पर है और जिसकी सेना विश्व के आठवें नंबर पर है, वह देश बहुत ज्यादा मुश्किल में है. 

उनकी इस बात से सहमत होना मुश्किल है कि पाकिस्तान को ‘आपदा प्रबंधन के उपाय’ करने चाहिए, पर वह ऐसा नहीं कर रहा. अगर ऐसा नहीं किया, तो उनके ‘कई अंगों के विफल’ होने की आशंका है. सच तो यह है कि जब तक पाकिस्तान भारत को लेकर अपनी नीति नहीं बदलता और कश्मीर पर से अपनी काली नजर नहीं हटाता, वह अपने इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर आवश्यक ध्यान नहीं दे पाएगा.

ज़रूरत

पाकिस्तानी सेना के शीर्ष नेतृत्व को पूर्वाग्रह से मुक्त होकर देवाशर के किताब के इस हिस्से को पढक़र सबक लेने की आवश्यकता है. वे ऐसा नहीं करेंगे, तो इससे पाकिस्तान की त्रासदी होगी. दक्षिण एशिया और इस क्षेत्र पर इन संकटों का बुरा प्रभाव पड़ेगा, पर इसको सुलझाने के लिए वे कुछ नहीं कर सकेंगे क्योंकि इसे कोई और देश नहीं सुलझा सकता. 

देवाशर ने भारत, अफगानिस्तान, चीन, और संयुक्त राष्ट्र से संबंधित पाकिस्तान की विदेश नीति पर विशेष रूप से लिखा है. वे इन देशों के लिए पाकिस्तानी लक्ष्यों का खाका खींचते हैं क्योंकि ये लक्ष्य पाकिस्तान की विदेश नीति पर भारत की मुख्यधारा के चिंतन में झलकते हैं. देवाशर का लेखन इस मत को और दृढ़ करता है कि पाकिस्तान भारत के प्रति अपनी सनक के प्रिज्म से दुनिया को देखता है. वह हर संबंध का मूल्यांकन भारत के लिए अपनी नीति के नजरिए से करता है. 

भारत के संदर्भ में देवाशर सही लिखते हैं कि बुनियादी पाकिस्तानी आवेग समता चाहता है. हालांकि वे कहते हैं, कि यह भारत से मेल नहीं खा सकता. इसलिए समता का मतलब यह हुआ कि भारत को उसके वृहत आकार और संसाधनों के फायदे से इनकार करना. कम तीव्रता वाले युद्ध और अन्य गतिविधियों से लेकर भारत देश को कम आंकना और तीखा भारत विरोधी प्रचार तक, यह सब इसी मकसद से हैं. 

(रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के वरिष्ठ अधिकारी तिलक देवाशर अपनी विद्वता और ऑपरेशनल कौशल के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने अपनी इस रचना में अकादमिक खूबियां डाली हैं, जिससे पाकिस्तान को समझने में महत्वपूर्ण सहयोग मिलेगा.)

First published: 2 January 2017, 22:13 IST
 
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