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सांगीन पर तालिबान का कब्ज़ा: अफगानिस्तान, अमरीका और भारत के लिए इसके मायने

विवेक काटजू | Updated on: 29 March 2017, 9:26 IST


अफगानिस्तान के लोगों ने अपना नया साल नौरोज 21 मार्च को मनाया. नया साल वसन्त की शुरुआत होता है और नई उम्मीद की किरण भी. हालांकि, अफगान सरकार के लिए इस साल यह उत्सव गहरे तौर पर उत्साहहीन रहा होगा क्योंकि नौरोज के एक दिन बाद ही तालिबान लड़ाकों ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण दक्षिण-पश्चिम में स्थित हेलमंड प्रांत के सांगीन जिले पर नियंत्रण कर लिया. सबसे खतरनाक युद्धक्षेत्र माने जाने वाले सांगीन जिले पर कब्जा ऐसे समय हुआ है जब तालिबान हेलमंड में अपना विस्तार करने में जुटा हुआ है.

तालिबान ने नौरोज उत्सव के माहौल में सांगीन पर कब्जा करने का जो समय तय किया, उसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं कहा जाएगा क्योंकि इस्लामिक अनुमोदन के बिना यह कब्जा नहीं हो सकता था, और वैसे भी जब 1996-2001 के दौरान अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन रहा था, उस समय तालिबान ने सभी रीति-रिवाजों, उत्सवों पर रोक लगा दी थी.

 

जान की कीमत कुछ भी नहीं


सांगीन जिला पहले भी युद्ध का गवाह रह चुका है. पूर्व में, तालिबान लड़ाकों और ब्रिटिश सैनिकों और बाद में अमरीकी बलों के साथ लड़ाई में दोनों ओर से काफी जनहानि हो चुकी है. तालिबान और अफगानी सुरक्षा बल महीनों तक युद्धरत रहे थे.

अफगानिस्तान और अमरीकी सरकार के प्रवक्ता जोर-शोर से कहते हैं कि हालात बेहतर हों, इसलिए सरकारी बलों को वापस बुला लिया जाएगा, लेकिन हालात यह है कि वर्तमान में जिला मुख्यालयों पर भारी विध्वंस हुआ है और लोग पीड़ित हुए हैं. यहां जीवन मूल्य बहुत ही कम हैं.

यह सही हो सकता है लेकिन तथ्य यही हैं कि सेना वापसी की खबर खुद में अफगानी लोगों के लिए एक हवा के झोंके की तरह है. किसी को भी यह महसूस हो सकता है कि पूरे देश में सुरक्षा हालात बहुत ही नाजुक हैं. जनवरी के आखिर में जारी की गई एक रिपोर्ट में अफगानिस्तान में पुननिर्माण कार्यों के लिए नियुक्त अमरीका के स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल जॉन सोप्को ने खुलासा किया था कि नवम्बर 2016 में अफगानी भू-भाग के 10 फीसदी हिस्से पर तालिबान का कब्जा था और उसके लड़ाके अन्य 20 फीसदी हिस्से पर कब्जे के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं.


अफगानिस्तान में नाटो बलों के मुखिया जनरल निकोल्सन ने भी अफगानी सुरक्षा बलों और तालिबान को लेकर कुछ ऐसा ही कहा था. 2016 में तालिबान अफगानिस्तान की राजधानी से जुड़े हेलमंड, फराह, उरुजगेन और सराह-ए-पुल समेत महत्वपूर्ण प्रांतों के नजदीक तक आ गया था.

गत 23 मार्च को दिए अपने भाषण में स्पेशल इंस्पेक्टर ऑफ अफगान रिकन्स्ट्रक्शन (एसआईजीएआर) जॉन सोप्को ने अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति को बयां किया. उन्होंने कहा कि 2016 में लड़ाई के समय कई कोशिशों के बावजूद तालिबान अपना प्राथमिक लक्ष्य हासिल करने और एक भी प्रांतीय राजधानी हासिल करने में समर्थ नहीं हो सका. फिर भी अफगानिस्तान के सबसे अच्छे 3,20,000 सुरक्षा बलों ने अफगानिस्तान के आसपास तालिबानों का पीछा करना शुरू कर दिया था. इसमें उग्रवाद के खिलाफ खतरनाक कार्रवाई करने के बजाए क्षेत्र के महत्वपूर्ण प्रान्त और शहरों को फिर से लेना भी था.

 

नियंत्रण का खेल

 

क्षेत्र पर नियंत्रण करने का खेल जब खत्म हो गया तो तालिबान ने सर्दियों में काबुल समेत अफगानिस्तान के कई शहरों में आतंकी हमले शुरू कर दिए. इसके अलावा कई आतंकी हमले आतंकी संगठन आईएसआईएस द्वारा भी कई शहरों में किए गए. आईएसआईएस द्वारा किया गया सबसे बदतर हमला 8 मार्च का था जो उसने सैन्य अस्पताल पर किया था. लोगों का एक छोटा समूह आतंकियों के छद्म रूप में आया और उसने सैन्य अस्पताल पर अंधाधुंध हमला कर दिया. हमले में चिकित्सक और मरीज समेत 40 लोग मारे गए. इस क्रूर हमले के बाद भी आईएस तालिबान के रूप में अभी भी यहां मौजूद है.

अफगानिस्तान के दक्षिण-पूर्वी प्रान्त नांगरहर के कुछ इलाकों में आईएस की अभी भी मजबूत मौजूदगी है. कुनार प्रांत में सलाफिज्म की परम्परा है. (सलाफी, इस्लाम की एक बेहद कट्टर धारा है. सलाफी इस्लामी कानून शरियत को कड़े ढंग से लागू करने की बात करते हैं.) इन लोगों की शाखा पख्तून आदिवासियों ऑर्कजाई की है. ये लोग डूरन्ड रेखा के दोनों ओर रहते हैं.

ऑर्कजाई आईएस को अपना समर्थन दे सकते हैं. हालांकि, तालिबान का मुख्य समूह तहरीक-ए-तालिबान से विश्वासघात कर निकले हुए लोगों का है. इनमें से कुछ अफगान तालिबान ने आईएस से हाथ मिला लिया है और कुछ आतंकी संगठनों में शामिल हो गए हैं.

 

बड़े मुद्दे


अफगानिस्तान के लिए परेशान और चिन्तातुर होने वाली बात रूस का एक फैसला है. इससे उसकी सुरक्षा चिन्ताएं बढ़ गईं हैं. रूस ने आईएस पर अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया है. चीन का भी समर्थन उसे मिला हुआ है और उसने तालिबान को लगभग क्लीनचिट दे दी है. रूस का कहना है कि अफगानिस्तान का वास्तविक खतरा आईएस है. अनुमान है कि अफगानिस्तान के सत्तागत ढांचे में वह तालिबान का सह-विकल्प चाहता है. अमरीका समेत अन्य पश्चिमी देश भी तो यही चाहते हैं.

हालांकि, तालिबान ने राष्ट्रपति अशरफ घानी और मुख्य कार्यकारी अब्दुल्लाह की अगुवाई वाली नेशनल यूनिटी सरकार से समझौता करने का कोई इरादा नहीं दिखाया है. उसने अपने से अलग होते जा रहे दलों के बजाए सैन्य सफलता पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है.

रूस के कदम से उसकी कट्टरता को बढ़ावा मिला है. सांगीन में उसे सफलता मिली है भले ही आंशिक रूप से और अस्थाई ही सही. यह मायने रखता है. इस सफलता से केवल वह और कट्टर हुआ है. ज्यादा अधिक तो यह कि सम्भवतः तालिबान के कुछ धड़ों को ईरानी अपने माल के जरिए उसका समर्थन कर सकते हैं.

दूसरी ओर पाकिस्तान द्वारा तालिबान को भौतिक रूप से समर्थन करना जारी है. पाक द्वारा उसे सहायता दी जा रही है. अफगानिस्तान में पाकिस्तान उसका सहयोग लगातार कर रहा है. पाकिस्तान का कहना है कि वह अफगान सरकार और तालिबान के बीच मेल-मिलाप कराना चाहता है लेकिन ऐसा करने के लिए उसने कभी प्रभावशाली दबाव नहीं बनाया. ऐसी स्थिति में कोई वजह नजर नहीं आती कि तालिबान अपना मकसद हासिल करने में सैन्य कार्रवाई को त्याग देगा.

आने वाले महीने अफगान सुरक्षा बलों और सरकार के लिए परीक्षा के होंगे. तालिबान को वापस भेजने में उसके लिए अमरीका का सहयोग लेना आवश्यक होगा. ट्रम्प प्रशासन को अभी यह दिखाना बाकी है कि वह इस मामले से निपटने के लिए कौन सी नीतियां अपनाता है क्योंकि अमरीका का यह सबसे लम्बा युद्ध बन गया है. मेल-मिलाप पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा, कोई विकल्प भी नहीं है लेकिन यह तो सुनिश्चित करना होगा कि तालिबान फिर से अपना पैर न फैला सके.

इस बीच, ऐसी भी खबरें हैं कि अभी जो 8,500 सैनिकों की जो टुकड़ी है, उसमें कुछ हजार और सैनिक भेजे जा सकते हैं. अमरीकी नीतियों में और स्पष्टता तब आएगी जब आने वाले महीनों में रक्षा मंत्री मैटी और एनएसए मैकमास्टर अफगानिस्तान की यात्रा पर जाएंगे.

भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अफगानिस्तान के साथ सुरक्षा व खुफिया सहयोग बनाए रखे. जरूरी सहायता-सहयोग जारी रखे और तालिबान के साथ भी खुले ताल्लुकात रखे. अभी यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि अफगान सरकार के लिए उसका समर्थन कमजोर होता जा रहा है. शतरंज के बोर्ड पर अफगानिस्तान की क्या स्थिति होगी, यह तो वक्त ही बताएगा, विशेषकर कि जब अफगानिस्तान में गर्मियों में लम्बा और खतरनाक संघर्ष का अंदेशा हो. ऐसे वक्त में सुरक्षा और राजनयिक तरीके से निपटने की जरूरत होती है.

First published: 29 March 2017, 9:26 IST
 
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