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पर्रिकर ने परमाणु हमले की धमकी जान-बूझकर दी

अचिन विनायक | Updated on: 13 November 2016, 2:12 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने की नीति भारतीय परमाणु सिद्धान्त का हिस्सा है. 
  • इसके ढोंग, छल-कपट और परमाणु मोर्चे पर वास्तविक तैयारियों पर विचार करने के सबसे पहले सिद्धान्त समझना चाहिए कि यह सिद्धांत अपनाया क्यों गया है. 

रक्षा मंत्री के पद पर रहते हुए मनोहर पर्रिकर का पहले परमाणु हमला न करने की भारत की नीति बताना, प्रतिबद्धता पर सवाल उठाना और इस बयान पर आलोचनाओं के बाद अपने दावे को निजी विचार बताना, सोची-समझी चाल और दांव-पेंच है.  हालांकि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में भी कहा था कि वह इस 'सिद्धान्त' पर पुनर्विचार करेगी.

कहना गलत नहीं होगा कि कई अन्य मुद्दों पर भी भाजपाई मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री अधिकतर भड़काऊ बयान देते रहते हैं. उनका उद्देश्य उन प्रतिबद्धताओं को तर्कसंगत और जन स्वीकार्य बनाना होता है जिस विचार को पहले ही सीमा से परे समझा गया है. इससे 'सामान्य अनुभूति' पैदा करने में मदद मिलती है और राष्ट्रवाद की अवधारणा की अति महत्वाकांक्षा (असहिष्णुता) को बढ़ावा मिलता है जिसका भाजपा/संघ खुद को राष्ट्र का 'सच्चा पैरोकार' मानती है.

वांछित और अपेक्षित घोषणा

परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने की नीति भारतीय परमाणु सिद्धान्त का हिस्सा है. इसके ढोंग, छल-कपट और परमाणु मोर्चे पर वास्तविक तैयारियों पर विचार करने के सबसे पहले यह समझना चाहिए कि इस सिद्धान्त को हुबहू (परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों द्वारा परमाणु हथियार का पहले इस्तेमाल न करने की घोषणा) अपनाया क्यों गया है. 

यही अपेक्षित भी है. क्या इसकी केवल यह वजह है कि जब अन्य देश परमाणु शक्ति से सम्पन्न हैं तो हमें भी अपने प्रतिकार के लिए परमाणु हथियार रखने चाहिए. जबकि हमें मालुम है कि इसके इस्तेमाल से ऐसी जनहानि होगी, जिसकी कल्पना मुश्किल है, क्या दुश्मन देशों को डराने के लिए हम परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ाते जा रहे हैं?

भाजपा ऐसे ही तर्कों के जरिए इसे जनता की आपसी बातचीत का मुद्दा बनाना चाहती है.

अगर सभी परमाणु शक्ति सम्पन्न देश पहले परमाणु हमला न करने की नीति घोषणा करते हैं तो इसका अर्थ यह होगा कि सभी परमाणु शक्ति सम्पन्न देश यह कह रहे हैं कि उन्होंने जो परमाणु हथियार रख रखे हैं, वह सिर्फ दूसरों से प्रतिकार करने के लिए हैं. 

अगर सभी परमाणु शक्ति सम्पन्न देश पर्याप्त रूप से इस तर्क का पालन करते हैं तो वे धीरे-धीरे अपने परमाणु हथियारों की संख्या को कम करने पर सहमत हो सकते हैं. (इसकी शुरुआत अमरीका और रूस को करना होगी जिनके पास सबसे ज्यादा परमाणु हथियार हैं). और बाद में परमाणु जखीरा लिए हुए अन्य देश समानुपातिक रूप से इस संख्या में कमी लाएं.

इस प्रक्रिया से न केवल परमाणु हथियारों की होड़ खत्म होगी, वरन परमाणु हथियारों की दौड़ में कमी भी आएगी और परमाणु युद्ध की पूरी आशंकाएं भी खत्म हो जाएंगी. कोई आश्चर्य नहीं, पोखरन में दूसरा परमाणु परीक्षण करने के दिनों में भारत ने सभी परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों से परमाणु हथियार का पहले इस्तेमाल न करने का संयुक्त घोषणापत्र लाने की बात कही थी.

सुरक्षित रखना और नष्ट करना

पहले परमाणु हमला न करने की नीति (नो फर्स्ट यूज) का ज़िक्र, परमाणु हथियार न रखने वाले देशों पर परमाणु हमला न करने की नीति (निगेटिव सिक्यूरिटी एश्योरेन्स) के साथ ही किया जाता है. यह सभी नॉन न्यूक्लियर वेपन्स स्टेट  (एनएनडब्लूएस) के खिलाफ परमाणु हथियार का इस्तेमाल न करने की समानान्तर प्रतिबद्धता है. अभी तक केवल भारत और चीन ने ही नो फर्स्ट यूज पर प्रतिबद्धता जताई है और वे निगेटिव सिक्यूरिटी एश्योरेन्स से भी जुड़े हुए हैं.

लेकिन प्रो-न्यूक्लियर भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन की प्रतिबद्धता भारत से सुपीरियर है क्योंकि चीन का निगेटिव सिक्यूरिटी एश्योरेन्स सभी एनएनडब्लूएस के साथ बिना शर्त है. हालांकि, भारत के पास नॉन न्यूक्लियर वेपन्स स्टेट के खिलाफ किसी भी हमले का जवाब कड़े अंदाज में देने का अधिकार सुरक्षित है.

मुद्दा यह है कि पाकिस्तान और चीन को अनुत्तरदायी 'परमाणु खलनायक' के रूप में चित्रित किया जाता है जबकि भारत को उत्तरदायी 'परमाणु खलनायक' माना जाता है. सभी परमाणु शक्तियां सर्वाधिक अनुत्तरदायी इन देशों की कभी कड़ी निन्दा नहीं करतीं. और अमरीका जिसका बड़े पैमाने पर रणनीतिक समर्थन विभिन्न मोर्चों पर  'राष्ट्रीय हित' के नाम पर करता है.

दक्षिण एशिया के संदर्भ में

यह ढोंग, प्रपंच यहां तक ही नहीं रुकता. पाकिस्तान का न्यूक्लियर उपक्रम हमेशा ही भारत केन्द्रित रहता है. अगर ऐसा न होता तो पाकिस्तान क्यों 1998 के परमाणु परीक्षण के पहले और बाद में हमेशा ही दोनों देशों द्वारा द्विपक्षीय समझौतों के जरिए परमाणु निशस्त्रीकरण करने का प्रस्ताव देता. 

एक साथ परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत करने को कहता और क्यों दक्षिण एशिया को न्यूक्लियर वैपन्स फ्री जोन बनाने की बात कहता. भारत हमेशा ही ऐसे प्रस्तावों को चीन से खतरे का हवाला देकर खारिज कर देता है और पाकिस्तान की आलोचना करता है कि उसने पहले इस्तेमाल न करने पर प्रतिबद्धता नहीं जताई है.

लेकिन चीन 1964 से ही परमाणु देश है. उसके नो फर्स्ट यूज और निगेटिव सिक्यूरिटी एश्योरेन्स भारत जैसे देशों के लिए हैं जिसने केवल 1998 में ही परमाणु परीक्षण किया है. चीन ने इसके बावजूद तब न्यूक्लियर ब्लैकमेलिंग की कोशिश नहीं की और बाद में भी नहीं, जब शीतयुद्ध के बाद द्विपक्षीय रिश्ते सुधार में हो रहा था. 

तब एक न्यायोचित तर्क दिया जा सकता है कि जब भारत, चीन के नो फर्स्ट यूज और निगेटिव सिक्यूरिटी एश्योरेन्स के बाद भी उस पर विश्वास नहीं करता है तो फिर पाकिस्तान को भारत पर क्यों विश्वास करना चाहिए? पर्रिकर के बयान से निश्चित रूप से कोई मदद नहीं मिलती?

ज्यादा अधिक तो यह है कि भारत और चीन एक-दूसरे को परमाणु सामग्री पर उपदेश नहीं देते या प्रचारित नहीं करते कि वे क्या कर रहे हैं? दोनों ही घनी आबादी वाले देश हैं. एक बात तो तयशुदा है कि दोनों देश पूरी तरह से गुप्त रखे जाने वाले जो काम कर रहे हैं, वह किसी को नहीं मालूम.

रणनीतिक जोखिम

एक छोटा लेकिन काफी अर्थपूर्ण राजनयिक संकेत होगा जिसे भारत और चीन कर सकते हैं (लेकिन होगा नहीं) कि वे  फस्र्ट यूज नीति पर अन्य सभी न्यूक्लियर वेपन्स स्टेट्स को प्रतिबद्धता जताने को कहें. लेकिन भारत ऐसे कदम को आगे बढ़ाकर अमरीका को नाराज करने या उससे अलग हो जाने का निश्चित रूप से जोखिम नहीं उठा सकता. जहां तक भारत और पाकिस्तान का सवाल है तो कई मौके ऐसे आए हैं जब दोनों देशों के बीच कोई युद्ध होने की संधि किए जाने पर बात हो चुकी है.

पाकिस्तान से कई बार यह कहा जा चुका है कि वह भारत के साथ -नो वार पैक्ट- पर दस्तखत करे.

नई दिल्ली का कहना है कि वह 'नो वार पैक्ट' के लिए इसलिए नहीं कह रहा है कि वह सीमापार से आने वाले अवैध लोगों को रोकने पर जोर दे रहा है. हालांकि लोगों के छिपकर और छद्म रूप से आने का सिलसिला जारी है. वरन अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का पालन करने के लिए भी यह जरूरी है. अंतराष्ट्रीय कानूनों में सीमा पार से आने और 'युद्ध' में महत्वपूर्ण अंतर बताया गया है. सशस्त्र बलों के आधिकारिक रूप से दूसरे देश की सीमा में प्रवेश का राजनीतिक और कानूनी प्रभाव पड़ता है और एकसाथ दूसरे मतलब भी निकलते हैं.

पाकिस्तान और भारत को आपसी रिश्ते मजबूत करने के लिए राजनयिक रूप से कदम बढ़ाना होगा. भारत के -नो वार पैक्ट- को अपनी स्वीकार्यता देकर पाकिस्तान खुद ही 'नो फर्स्ट यूज' को स्वीकार कर सकता है. जंग से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है. रक्षा मंत्री के विचार को कोई तवज्जो न देते हुए हमारे दक्षिण एशिया के अधिकांश -रणनीतिक विशेषज्ञ- कहते हैं कि ऐसा नहीं होने जा रहा. हालांकि, इस बीच क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों की ओर दौड़ जारी रहेगी.

First published: 13 November 2016, 2:12 IST
 
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