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इमैनुएल मैक्रों के सामने बंटे हुए फ्रांस को एकजुट करने की घड़ी

रिचर्ड महेर | Updated on: 9 May 2017, 10:27 IST
एएफपी/ थॉमस सैमसन

फ्रांसीसी राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल निर्दलीय उम्मीदवार इमैनुएल मैक्रों फ्रांस के नए राष्ट्रपति होंगे. मैक्रों दक्षिणपंथी नेशनल फ्रंट की उम्मीदवार मरीन ला पेन को मतों के भारी अंतर से हरा कर फ्रांस के सबसे युवा राष्ट्रपति कहलाने के हकदार बन गए हैं. 

अपने दम पर जीते सबसे युवा स्वयंभू नेता 

फ्रांस और यूरोपीय यूनियन के इस महत्वपूर्ण चुनाव में मैक्रों की जीत निर्णायक कही जा सकती है. इससे लगता है कि तथाकथित ‘रिपब्लिकन फ्रंट’ का दबदबा अब भी कायम है. 1940 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब केंद्रीय वाम और दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लाखों वोटरों ने दो हफ़्ते पहले संपन्न हुए चुनाव के पहले चरण में दूसरे उम्मीदवारों का समर्थन किया, मैक्रों के लिए रैलियां की ताकि धुर दक्षिणपंथी फ्रांस में सत्ता पर काबिज न हो सकें.

इन चुनाव परिणामों ने मैक्रों को फ्रांस के राजनीतिक पटल का चमकता हुआ सितारा बना दिया है. इससे पहले उन्हें बमुश्किल ही कोई जानता होगा, जब फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने उन्हें तीन साल पहले वित्त मंत्री बनाया था. उसके बाद जब पिछले साल उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की घोषणा की तो कई विशेषज्ञों की राय उनके पक्ष में थी.

हालांकि मैक्रों ख़ुद काफ़ी प्रभावशाली व्यक्ति हैं. इसके बावजूद उन्होंने ना तो अपना कोई चुनाव कार्यालय बनाया और न ही फ्रांस की किसी मुख्य पार्टी से जुड़े. वे एक स्वयंभू बाहरी नेता के तौर पर चुनाव लड़े. 39 साल के मैक्रों फ्रांस के द्वितीय रिपब्लिक(1848 से 1851) के राष्ट्रपति रहे लुई नेपोलियन बोनापार्ट (1808-1873) के बाद देश के सबसे युवा राष्ट्रपति हैं.

मत परिणाम

फ्रांस के बड़े शहरों पेरिस, लियॉन, मर्सिलेस, तौलुस और नानतेस में अच्छा प्रदर्शन करते हुए मैक्रों ने 65 फीसदी मत हासिल किए. मैक्रों को हालांकि शुरू से फेवरेट उम्मीदवार के तौर पर देखा जा रहा था. परन्तु कुछ विशेषज्ञों का आकलन था कि मत प्रतिशत कम रहने से प्रतिस्पर्द्धा कड़ी हो सकती है. पिछले बुधवार को दोनों फाइनलिस्ट के बीच टीवी पर हुई बहस में ला पेन का प्रदर्शन बेहद ख़राब रहा. फ्रेंच पोलिंग फर्म आईपीएसओएस ने मैक्रों को ला पेन पर 26 पॉइंट्स की बढ़त के साथ 37 के मुक़ाबले 63 फीसदी मत हासिल करने वाला बताया था.

मैक्रों की ज़बरदस्त जीत से एक बात तो साबित हो गई कि पिछले शुक्रवार को मैक्रों के बारे में लीक हुए रिपोर्ट्स और ईमेल का चुनाव नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ा. शुक्रवार मध्य रात्रि चुनाव प्रचार समाप्त होने से ठीक पहले मैक्रों प्रचार गुट ने घोषणा की कि उन्हें ‘‘सामूहिक हैकिंग’’ का शिकार बनाया गया.

मैक्रों समूह ने एक बयान जारी कर कहा कि ‘‘गलत जानकारी और संदेह जताकर की गई यह हैकिंग फ्रांसीसी राष्ट्रपति चुनाव को अस्थिर करने की एक कोशिश थी.’’ हालांकि इस बात के कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं लेकिन फ्रेंच अधिकारियों को संदेह है कि इन हैकर्स का संबंध रूसी गुप्तचर एजेंसी से हो सकता है और यह वही ग्रुप है, जिसने पिछले साल अमेरिका के डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी के कम्प्यूटर सिस्टम को अपना निशाना बनाया था.

 

सत्ता चलाने की क्षमता

फ्रांस के इस ऐतिहासिक और ध्रुवीकरण वाले राष्ट्रपति चुनाव के बाद अब मैक्रों की बारी है कि वे इस देश को एक करेें. अपने समर्थकों को दिए भाषण में उन्होंने कहा, ली पेन के समर्थकों द्वारा जताए गए संदेह और चिंताओं के बारे में वे बेहतर समझते हैं. अब उन्हें अपने सुधारवादी एजेंडे पर काम करना है. परन्तु वे ऐसा कर पाएंगे कि नहीं, यह फ्रांस के नेशनल असेम्बली के चुनाव नतीजों पर निर्भर करेगा. फ्रांस के इस निचले सदन और सबसे शक्तिशाली विधान परिषद के लिए चुनाव जून में होंगे.

मैक्रों का बाहरी नेता होना हो सकता है उस वक्त भारी पड़े. फ्रांस में संसदीय चुनाव पर पारंपरिक तौर पर केंद्रीय वाम और दक्षिण पंथी दलों का प्रभुत्व रहता है. चूंकि मैक्रों ने हाल ही एक साल पहले एन मार्शे नाम से अपनी पार्टी शुरू की है. इसलिए पार्टी के पास फिलहाल संसद में कोई सीट नहीं है. पार्टी देशभर में अपने कई उम्मीदवार खड़े कर रही है लेकिन उनमें से कई युवा और अनुभवहीन हैं. इसलिए ऐसी संभावना भी बहुत कम हैं कि पार्टी बहुमत के लिए जरूरी 289 सीटें जीत ले.

फ्रांस में सरकार का मुखिया होने के नाते प्रधानमंत्री को संसद में बहुमत दिखाना होता है. इसका मतलब है प्रधानमंत्री राष्ट्रपति की पार्टी से अलग पार्टी का भी हो सकता है. फ्रांसीसी इसे ‘‘साझेदारी’’ कहते हैं. 1958 के बाद से तीन बार ऐसा हुआ है.

ऐसी स्थिति में मैक्रों के लिए अपने सुधारों को लागू करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है. राष्ट्रपति ओलांद को संसद में बहुमत हासिल था लेकिन फिर भी वे अपने एजेंडा को ठीक प्रकार से लागू नहीं कर पाए और उनकी रेटिंग काफी निम्न स्तर पर रही.

 

ऐतिहासिक और ध्रुवीकरण वाले राष्ट्रपति चुनाव के बाद अब मैक्रों की बारी है कि वे इस देश को एक करेें.

फिलहाल यह कहा जा सकता है कि इन चुनावों ने जून में होने वाले असेम्बली चुनाव के लिए मैक्रों की पार्टी को अग्रिम पंक्ति का दावेदार बना दिया है. ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि जून में होने वाले चुनावों में मैक्रों की एन मार्शे को 249 से 286 सीटें मिलेंगी, जबकि केंद्रीय और कंजर्वेटिव पार्टी को 200 से 212 सीटें, समाजवादियों को 28 से 43 और ला पेन की नेशनल फ्रंट को 15 से 25 सीटें मिल सकती हैं.

सीमाओं की अहमियत

मैक्रों की जीत एक प्रकार से यूरोपीय यूनियन की सीधी जीत है. ला पेन ने यूरो जोन छोड़ने, यूरोप के शेनजेन सीमा मुक्त यात्रा क्षेत्र को छोड़ने को मुद्दा बनाया है और फ्रांस के ईयू की सदस्यता पर जनमत संग्रह करवाने की मांग की है. मैक्रों आर्थिक और राजनीतिक रूप से एकीकृत यूरोप के पक्षधर हैं और कई बार कह चुके हैं कि एकीकृत यूरोप में फ्रांस की स्थिति अधिक मजबूत है.

मैक्रों की जीत से यूरोप को भले ही बल मिला हो लेकिन ईयू को अब भी विरोधियों से तो ख़तरा बना ही हुआ है. यह अब तक का शानदार राष्ट्रपति चुनाव कहा जा सकता है. ली पेन के पिता 15 साल पहले जैक्स शिराक से बुरी तरह हारे थे. उस वक्त उनके पास केवल 18 फीसदी ही वोट थे और अब 7 मई को ला पेन के पास अपने पिता के मत प्रतिशत से दोगुना भर प्रतिशत ही मिल सका.

अगर मैक्रों अपना राजनीतिक एजेंडा, खास तौर पर फ्रांस के आर्थिक विकास को गति देना और बेरोजगारी कम करने पर कामयाब नहीं रह सके तो वोटर अगले राष्ट्रपति चुनाव में धुर दक्षिणपंथी या वामपंथी उम्मीदवार को भी चुन सकता है. हालांकि इस साल के राष्ट्रपति चुनाव में ऐसे उम्मीदवारों को करीब-करीब 50 फीसदी वोट मिले.

 

मैक्रों की जीत अनिश्चितता का नतीजा है बहुत से मतदाताओं ने उन्हें दूसरे चरण में वोट किया.

इस राष्ट्रपति चुनाव में फ्रांस की तस्वीर एक बंटे हुए देश के तौर पर उभर कर सामने आती है. मैक्रों की जीत फ्रांस को अंतरराष्ट्रीय, बहिर्गामी, ईयू समर्थक और मुक्त बाजार वाले देश के रूप में स्थापित करती है, जबकि ला पेन का राजनीतिक उत्थान फ्रांस को राष्ट्रीय, संरक्षणवादी, ईयू विरोधी और बाहरी लोगों को संदेह की नजर से देखने वाला देश बताता है.

आज पूरे पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में यही राजनीतिक परिदृश्य दिखाई देता है. पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत और ब्रिटिश मतदाताओं द्वारा ईयू से बाहर रहने का चयन इसी का संकेत है. मैक्रों की जीत अनिश्चितता का नतीजा है. बहुत से मतदाताओं ने उन्हें दूसरे चरण के मतदान में वोट किया, जिनका मकसद सिर्फ ला पेन को हराना था.

ला पेन की कोशिशें भले ही नेशनल फ्रंट को कमज़ोर करने की रही हों, लेकिन बहुत से लोगों का मानना है कि यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ख़तरा है. इस 7 मई को मैक्रों ने निजी और राजनीतिक तौर पर नया कीर्तिमान स्थापित किया. परन्तु असल काम अब शुरू होगा. जितने लोग एक मजबूत और संगठित यूरोप के पक्ष में हैं, उन्हें उनकी सफलता की कामना करनी चाहिए.

(लेखक रिचर्ड महेर यूरोपियन यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट के रॉबर्ट शूमैन सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडीज में ग्लोबल गवर्नेंस प्रोग्राम के रिसर्च फेलो हैं.)

First published: 9 May 2017, 10:18 IST
 
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