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ऑस्ट्रेलिया में कोयला खनन को लेकर बुरे फंसे हैं गौतम अडानी

आदित्य मेनन | Updated on: 23 November 2015, 9:37 IST
QUICK PILL
  • अडानी माइनिंग के वर्तमान  सीईओ जनकराज पर जांबिया में एक खनन परियोजना के जरिए वहां की एक पूरी नदी को जहरीला बनाने का आरोप है. उनके दागदार इतिहास को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया में अडानी की परियोजना का विरोध हो रहा है.
  • गौतम अडानी की कारमाइकल कोयला खान परियोजना ऑस्ट्रेलिया की सबसे बड़ी कोयला खनन परियोजना है. इसके लिए उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से भारी रकम लोन पर ले रखा है.

गौतम अडानी को बहती हवा के विपरीत चलने की आदत है. 2002 में हुए दंगों के बाद जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भारतीय उद्योग जगत के दीपक पारेख, राहुल बजाज, अजीम प्रेमजी और एनआर नारायणमूर्ति जैसे दिग्गजों की आलोचना का सामना करना पड़ा था. तब मोदी के समर्थन में अडानी खड़े हो गए थे.

तब उनका बचाव करते हुए अडानी ने कुछ अन्य गुजराती उद्योगपतियों के साथ मिलकर कंफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री को छोड़ देने की धमकी दी थी. इस विरोध ने उन्हें मोदी के नजदीक पहुंचा दिया. अगले 12 वर्षों में अडानी समूह का कारोबार 20 गुना बढ़ गया. यानी 2001-02 वित्तीय वर्ष के 3,741 करोड़ रुपये से कारोबार 2013-14 में 75,659 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. 

मोदी के भारत का प्रधानमंत्री बनने के बाद अडानी के व्यापार को अंतरराष्ट्रीय पंख मिल गए. वो अक्सर प्रधानमंत्री के व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल का एक हिस्सा बनते हैं. लेकिन इससे भी आगे निकलते हुए समूह ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को अंतरराष्ट्रीय बना लिया. 

क्वींसलैंड, ऑस्ट्रेलिया स्थित कारमाइकल कोयला खदान जैसी परियोजना अडानी के अंतरराष्ट्रीय विस्तार की एक छोटी सी मिसाल है. मध्य क्वींसलैंड के गैलिली बेसिन के उत्तर में स्थित यह कोयला खदान की परियोजना ऑस्ट्रेलिया और विश्व की सबसे बड़ी खनन परियोजनाओं में से एक है. 

यहां पर भी अडानी हवा के रुख के खिलाफ खड़े थे. शीर्ष अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने पर्यावरणीय लागत देखते हुए इसे वित्तीय मदद देने से साफ मना कर दिया. अडानी पर्यावरणविदों और मूल समुदायों के खिलाफ पूरी तरह से कमर कसकर मोर्चा खोल चुके हैं. सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड के एक स्तंभकार माइकल वेस्ट ने इस परियोजना को "सफेद हाथियों में सबसे सफेद" करार दिया है. 

फिर भी अडानी परियोजना के साथ आगे बढ़ते दिख रहे हैं. 

अडानी माइनिंग के सीईओ जयकुमार जनकराज (जेजे) पर जांबिया की एक नदी को जहरीला बना देने का आरोप है. 

अडानी ने इस काम के लिए उन्हीं का चुनाव किया है. यह सोचा-समझा फैसला है. ऑस्ट्रेलिया परियोजना का संचालन अडानी माइनिंग के सीईओ जेजे संभाल रहे हैं. इस महात्वाकांक्षी परियोजना में जेजे को दो वजहों से चुना गया है. पहला वेदांता की सहायक कंपनी स्टरलाइट इंडस्ट्रीज में उनका ट्रैक रिकॉर्ड और दूसरा खनन उद्योग से जुड़ा उनका विशाल अनुभव. वो स्टरलाइट में तस्मानिया प्रॉपिएटरी लिमिटेड के सीईओ और स्टरलाइट में सीएमटी थे. 

इतने चमकदार ट्रैक रिकॉर्ड वाले जेजे, अडानी के सामने पैदा हुई समस्या का एक हिस्सा बन चुके हैं. 

जेजे पर जांबिया की काफुए नदी में प्रदूषण फैलाने और उसकी अनदेखी करने का आरोप लगाया गया है. पर्यावरण के लिए काम करने वाले एक समूह एन्वायरमेंटल जस्टिस ऑस्ट्रेलिया द्वारा जारी एक रिपोर्ट में यह आरोप लगाया गया है.

जनकराज के खिलाफ आरोप

अडानी माइनिंग में शामिल होने से पहले जनकराज जांबिया स्थित कॉन्कोला कॉपर माइंस (केसीएम) के सीईओ थे. वेदांता रिसोर्सेज की सहयोगी केसीएम में वे 2008 में संचालन निदेशक के रूप में जुड़े. इसके बाद मार्च 2011 में उन्हें केसीएम का सीईओ बनाया गया. वे इस पद पर 2013 तक रहे. इसके बाद वे अडानी समूह से जुड़े. 

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जयकुमार जनकराज

केसीएम द्वारा "प्रेगनेंट लिकर सॉल्यूशन" छोड़ने के कारण अक्तूबर 2010 के अंत तक काफुए नदी ने अपना रंग बदलना शुरू कर दिया. प्रेगनेंट लिकर सॉल्यूशन का मतलब कॉपर माइनिंग से निकलने वाला अत्यधिक अम्लीय, धातुयुक्त जल होता है. इस दौरान जेजे केसीएम में संचालन निदेशक थे. 

इसके अगले महीने जांबिया सरकार ने इस नुकसान के लिए केसीएम पर मुकदमा दायर किया. पहले तो केसीएम ने इसके बारे में अनभिज्ञता जताई लेकिन बाद में माना कि कॉपर माइनिंग के लीच प्लांट की वजह से यह प्रदूषण फैला. सरकार ने केसीएम पर चार आरोप लगाए.

1. पर्यावरण प्रदूषण

2. जलीय वातावरण में जहरीले और कचरे को फेंकना

3. जान बूझकर पर्यावरण प्रदूषण की जानकारी छुपाना

4. डिस्चार्ज मैटेरियल के लिए तय मानकों का पालन करने में विफलता

केसीएम को सभी चारों आरोपों में दोषी पाया गया. दिलचस्प बात यह है कि इसके कुछ माह बाद केसीएम ने जनकराज को सीईओ बना दिया. 

जांबिया में चिंगोला कॉपर माइन के नजदीक स्थित चार गांवों के करीब 1800 निवासियों ने आरोप लगाया कि 2004 से लेकर 2014 तक केसीएम द्वारा सल्फ्यूरिक एसिड और अन्य जहरीले रसायनों को जलाशयों में प्रवाहित करने के कारण तमाम लोगों की मौत के साथ ही फसलों की तबाही हुई. 

उन्होंने ब्रिटेन की अदालत में केसीएम पर मुकदमा दायर किया. उन्होंने दावा किया कि केसीएम द्वारा फैलाए गए प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारी से लोगों की मौत हुई और वहां की जमीन बंजर हो गई. उन्होंने यह भी कहा कि इससे पानी का रंग नारंगी हो गया और उसमें से बदबू आने लगी.

जांबिया में कॉपर माइनिंग में व्यापक शोध करने वाले डॉ. रोहित नेगी कहते हैं, "जांबिया की अर्थव्यवस्था काफी कुछ खनन पर निर्भर करती है. यह इस देश में रोजगार का प्रमुख स्रोत है. इसलिए किसी माइनिंग कंपनी के खिलाफ इस तरह की सामूहिक कार्रवाई काफी महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व है."

जांबिया की एक अदालत ने केसीएम की आलोचना करते हुए उसे "लापरवाह" और इंसान, वनस्पति और पशुओं की परवाह नहीं करने वाली कंपनी बताया.

अब जब जनकराज केसीएम के साथ नहीं हैं, तब यह मुद्दा फिर से उन्हें और उनके मौजूदा मालिक को परेशान करने के लिए वापस लौट आया है. 

ऑस्ट्रेलिया के पर्यावरणविदों में अब यह बहस छिड़ गई है कि केसीएम के पूर्व सीईओ जनकराज की पृष्ठभूमि को देखते हुए अडानी समूह पर यह भरोसा नहीं किया जा सकता कि वो पर्यावरण कानूनों का पालन करेगी.

एन्वायरमेंटल जस्टिस ऑस्ट्रेलिया के मुताबिक, "जनकराज का पिछला इतिहास पर्यावरण और समुदायिक स्वास्थ्य एवं कल्याण की सुरक्षा के नजरिए से मेल नहीं खाते हैं." संगठन ने इस पर भी शक जताया है कि अडानी समूह ऑस्ट्रेलिया के पर्यावरण कानूनों और नियमों का पूरी तरह से पालन करेगा.

जनकराज पर जबाव बढ़ाते हुए संस्थान कहता है, "इस तथ्य को जानते हुए भी कि एक व्यक्ति पर पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन करने के तमाम गंभीर आरोप थे औऱ उसका अपराध भी साबित हो चुका था, अडानी समूह ने उसे ऑस्ट्रेलिया में अपना संचालन का प्रमुख बना दिया गया है. यह ऑस्ट्रेलियाई सरकार के लिए जांच का एक महत्वपूर्ण मुद्दा है." संस्था ऑस्ट्रेलिया सरकार और क्वींसलैंड प्रशासन को "अडानी समूह और इसके कार्यकारी अधिकारी के पर्यावरणीय इतिहास" की अनदेखी करने का आरोपी मानती है.

इसने ऑस्ट्रेलिया में अडानी समूह को खनन की अनुमति देने से जुड़े जोखिम का पुनर्आकलन करने और जरूरत पड़ने पर इस परियोजना को रोकने का आग्रह भी सरकार से किया है.

लेकिन केवल पर्यावरणविदों द्वारा ही विरोध का झंडा नहीं उठाया जा रहा है. 

ऊर्जा और वित्त विशेषज्ञ टिम बकले के मुताबिक, "यह बताना बहुत जरूरी है कि ऑस्ट्रेलिया में अडानी माइनिंग के सीईओ, इससे पहले जांबिया की उस माइनिंग कंपनी के सीईओ थे जिसे कई पर्यावरणीय उल्लंघनों के लिए दोषी करार दिया गया था." बकले एनर्जी फाइनेंस स्टडीज, ऑस्ट्रलेशिया के निदेशक हैं. 

उनके मुताबिक कारमाइकल माइन ऑस्ट्रेलिया के इतिहास में सबसे बड़ी खनन परियोजना है, इसलिए यह गड़बड़ी बहुत बड़ा जोखिम उठाने जैसा है. 

बकले ने कैच न्यूज़ को बताया, "अडानी जैसी कंपनी जिसने इतने बड़े स्तर पर कभी कोयला खनन का काम नहीं किया है, या ऐसी कंपनी जिसके पास ऑस्ट्रेलिया में काम करने का व्यापक अनुभव नहीं है, उसके लिए यह एक बड़ा जोखिम है."

ग्रेट बैरियर रीफ को नुकसान

जनकराज की पृष्ठभूमि का फिर से सामने आना ही पर्यावरणविदों और कारमाइकल माइन के बीच की वर्तमान लड़ाई का मुख्य मुद्दा है. 

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ग्रेट बैरियर रीफ

पर्यावरणविदों को इस बात का डर है कि इस परियोजना का ग्रेट बैरियर रीफ (दुनिया में मूंगा चट्टानों की सबसे बड़ी श्रृंखला) पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा. यूनेस्को की इस विश्व विरासत स्थल में मूंगा की 400, मछलियों की 1500 और मोलस्क (रीढ़विहीन जंतुओं की श्रेणी) की 4000 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं. यह स्थान विलुप्तप्राय डुगॉन्ग और विशालकाय हरे कछुओं का भी निवास स्थान है. कारमाइकल माइंस से कोयला निकालने के लिए एबॉट प्वाइंट कोल पोर्ट पर नए टर्मिनल और समुद्री सतह पर ड्रेजिंग की जरूरत होगी. 2011 से अडानी द्वारा संचालित किए जा रहे कोल पोर्ट, ग्रेट बैरियर रीफ के नजदीक के कुछ बंदरगाहों में से एक है. दिसंबर 2013 में ऑस्ट्रेलियाई पर्यावरण मंत्री ग्रेग हंट ने ड्रेजिंग के लिए एबॉट पोर्ट पर तीन शिपिंग टर्मिनल बनाने की परियोजना को मंजूरी दी थी.

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कारमाइकल माइंस

सिडनी स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेेसर डॉ. हेजर गूडॉल ने कैच न्यूज को बताया, "ऑस्ट्रेलियाई जनता के लिए ग्रेट बैरियर रीफ प्रतिष्ठा का विषय है. सभी इसकी अद्वितीय और नाजुक प्रकृतिक सुंदरता के कायल हैं. कोल पोर्ट के निर्माण के दौरान कोरल रीफ पर कीचड़ डंप किया जाएगा और इसे ले जाने के लिए बड़े-बड़े जहाजों की आवाजाही बढ़ेगी. इस तरह रीफ पर यातायात बढ़ने के साथ ही जहाजों से निकलने वाली गंदगी और अन्य मलबा इसके लिए खतरा बन जाएगा."

इसके द्वारा करीब 80 किलोमीटर तक के क्षेत्र की समुद्री घास और कोरल पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी भी बंद हो जाएगी. इस मलबे से समुद्री घास या कोरल के पूरी तरह खत्म हो जाने की भी संभावना है. 

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एबॉट प्वाइंट

मूलनिवासियों का विरोध

मध्य क्वींसलैंड के मूलनिवासियों ने भी इस परियोजना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. उनको लगता है कि इससे "जमीन की आत्मा ही खत्म हो जाएगी."

वंगन और जगलिंगाऊ समुदाय के प्रतिनिधियों ने संयुक्त राष्ट्र की स्पेकुअल रैपोर्टियर में याचिका दायर कर मूलनिवासियों के अधिकारों के हित में क्वींसलैंड सरकार से इस परियोजना को रोकने का आग्रह किया है. 

परियोजना से तुरंत हाथ खींचने के लिए अडानी को लिखे एक खुले पत्र में उन्होंने कहा है, "हमारी पैतृक जमीन पर कारमाइकल माइन के लिए हमारी सहमति नहीं है. हमारी जमीन, हमारे अधिकारों और हितों को हस्ताक्षर कर देने के अडानी के प्रस्ताव को हम स्वीकार नहीं करते हैं. हम मुंह बंद करने के लिए उनके पैसे भी नहीं लेंगे."

परियोजना के विरोध में पत्र आगे कहता है, "इस माइन (खदान) का मतलब है कि इसका हमारे नाम, पैतृक जमीन, जल, पेड़ों, जानवरों, पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा. यह प्रभाव टाला नहीं जा सकता. हमारी जमीन विलुप्त हो जाएगी."

वित्तीय रूप से अव्यवहारिक

बकले जैसे विशेषज्ञों के लिए इस परियोजना का वित्तीय रूप से व्यवहारिक न होना बड़ी चिंता का विषय है. उन्होंने कहा, "कोयले के मौजूदा दाम देखते हुए यह परियोजना व्यावसायिक रूप से मुनाफे का सौदा नहीं है और एक बेकार की संपत्ति है."

उनका तर्क है कि कारमाइकल का कोयला "कम ऊर्जा और ज्यादा राख" देने वाला है. माइन से निकले कोयले को बेचने से मिलने वाली रकम परियोजना की विशाल लागत की तुलना में काफी कम होगी. शायद यही वजह है जिसके चलते दुनिया के 13 शीर्ष कोल फाइनेंसर और अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने इस परियोजना को ऋण देने की संभावना से इनकार कर दिया था. सिटीग्रुप, जेपी मॉर्गन चेस, गोल्डमैन सैक्स, ड्यूश बैंक, रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड, एचएसबीसी और बार्कलेज जैसे प्रतिष्ठित बैंकों ने सार्वजनिक रूप से इस परियोजना में रकम लगाने से मना कर दिया था. 

इनमें कुछ बैंकों द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण काफी खतरनाक हैं. 

उदाहरण के लिए, गोल्डमैन सैक्स ने कहा, "वो ऐसी किसी भी परियोजना को ऋण या वित्तीय मदद नहीं देगा जिसके कार्यों से एक महत्वपूर्ण और नाजुक प्राकृतिक परिवेश में व्यापक बदलाव या गड़बड़ी हो जाए."

ज्यादातर बैंक मानते हैं कि कारमाइकल माइन परियोजना से जुड़ने और एबॉट प्वाइंट के विस्तार से उनकी प्रतिष्ठा को धक्का लगेगा.

आईईईएफए की एक रिपोर्ट में अवीवा इंवेस्टर्स, ब्रिटेन के प्रतिनिधि अबीगैल हेरॉन के मुताबिक, "कारमाइकल परियोजना से जुड़ने का जोखिम अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर लगाना है. प्रमुख ऋणदाताओं ने इसे सही सेे पहचानते हुए परियोजना से अपने हाथ खींच लिए."

जब कारमाइकल परियोजना को कोई भी बैंक ऋण देने को तैयार नहीं था. ऐसे में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) ने आगे आते हुए अडानी को 6500 करोड़ रुपये का ऋण दिया. संयोग से, इस समझौते (एमओयू) पर हस्ताक्षर तब किए गए थे जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गत वर्ष नवंबर में ऑस्ट्रेलिया यात्रा पर गए हुए थे. एसबीआई द्वारा दिए गए ऋण ने अडानी को क्वींसलैंड सरकार से मंजूरी मिलने में मदद की. 

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इस वर्ष सितंबर में यह अफवाह फैली कि एसबीआई अडानी को दिए गए ऋण को बंद कर देगी लेकिन बैंक की अध्यक्ष अरुंधति भट्टाचार्य ने इस अफवाह को खारिज कर दिया. वास्तव में, पर्यावरण और वित्तीय व्यवहारिकता पर हर ओर बढ़ती चिंता और आलोचना के बीच भट्टाचार्य कारमाइकल परियोजना का बचाव करने की कोशिश कर रही थीं. 

हालांकि बकले मानते हैं कि एसबीआई द्वारा दिए गए लोन पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता. बकले ने बताया, "नवंबर 2014 को अडानी ने एसबीआई की ओर से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि बैंक कारमाइकल परियोजना के लिए 6500 करोड़ रुपये का ऋण देगा. हालांकि, एसबीआई केवल 6500 करोड़ रुपये का ऋण देने की संभावना के मूल्यांकन के लिए प्रतिबद्ध था. तब भी, यह इस शर्त पर होता कि अडानी द्वारा एबॉट प्वाइंट कोल टर्मिनल निर्माण के लिए पहले से लिए गए 5200 करोड़ रुपये का ऋण चुका दे."

इस बात पर जोर देते हुए कि क्रेडिट कमेटी के मानकों पर ऋण अस्वीकार कर दिया गया, उन्होंने जोड़ा, "इसके तकरीबन छह माह बाद सूचना मिली कि क्रेडिट कमेटी ने इस ऋण प्रस्ताव को खारिज कर दिया. भट्टाचार्य ने इस सूचना को खारिज किया. इसके कुछ सप्ताह बाद ही अडानी ने यह कहा कि क्योंकि उन्होंने कभी औपचारिक रूप से ऋण के लिए आवेदन किया ही नहीं था इसलिए ऋण खारिज करने का सावाल ही नहीं उठता."

आईईईएफए की एक रिपोर्ट के मुताबिक अडानी का ऑस्ट्रेलिया में निवेश पूरी तरह ऋण आधारित है. रिपोर्ट बताती है, "कंपनी द्वारा 19,500 करोड़ रुपये की संपत्ति होने का दावा किया गया है. जबकि अडानी पर ऑस्ट्रेलिया में तकरीबन 19,500 करोड़ रुपये का कर्जा भी है."

स्वामित्व पर संदेह

ऑस्ट्रेलिया की प्रतिष्ठित मीडिया कंपनियों में से एक फेयरफैक्स मीडिया की रिपोर्ट ने एबॉट प्वाइंट पोर्ट के ऑस्ट्रेलिया में संचालन को लेकर अडानी के स्वामित्व पर भी सवाल उठाया है. देखिए क्या कहती है रिपोर्टः

ऑस्ट्रेलिया में कोयला खनन को लेकर अडानी का तमाम कंपनियों के साथ एक जटिल जाल फैला हुआ है. इसमें सिंगापुर की कम टैक्स देने वाली सत्ता से लेकर केमैन द्वीप के टैक्स दिग्गज तक शामिल हैं. 

कंपनी के दस्तावेज एबॉट प्वाइंट पोर्ट के अंतिम स्वामित्व को स्पष्ट नहीं करते हैं. 

ऐसा लगता है कि ऑस्ट्रलिया में अडानी समूह के कोयला खनन उद्यमों से जुड़ी तमाम कंपनियों को गौतम अडानी सीधे नियंत्रित नहीं करते हैं. इसके बजाय तमाम दस्तावेज एबॉट प्वाइंट लीज का स्वामित्व उनके बड़े भाई विनोद शांतिलाल अडानी को बताते हैं. भारत में दी गई वार्षिक रिपोर्ट समेत कंपनी के कई दस्तावेज बताते हैं कि अडानी एंटरप्राइजेज ने वर्ष 2013 में सिंगापुर की एक निजी कंपनी एबॉट प्वाइंट पोर्ट होल्डिंग्स को 1527.50 करोड़ रुपये में अपना हिस्सा बेच कर इससे दूरी बना ली थी. 

सिंगापुर में दर्ज कंपनी के रिकॉर्ड बताते हैं कि एबॉट प्वाइंट पोर्ट होल्डिंग्स के एकमात्र निदेशक विनोद शांतिलाल अडानी हैं.

अडानी समूह इस घलमेल में कुछ भी गलत नहीं मानता. उसके मुताबिक ऐसा केवल विनियामक और वित्तीय व्यवस्था सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया गया है. 

राजस्व खुफिया और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा यहां भारत में विनोद अडानी के नाम से एक आपराधिक शिकायत दर्ज की गई है. यह मामला भारतीय खाताधारकों के 6500 करोड़ रुपये को हेराफेरी करके अडानी की तीन कंपनियों के विदेशी खातों में भेजने से जुड़ा है. (यह नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से पहले जनवरी 2014 का मामला है.)

अडानी की सफाई

इस पर प्रतिक्रिया लेने के लिए कैच ने अडानी माइनिंग से संपर्क किया. हमने उनसे दो दिनोंं में जवाब मांगा था, लेकिन कंपनी की तरफ से अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.

लेकिन एक प्रतिक्रिया आडानी समूह ने अपने सीईओ जनकराज के संबंध में ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन को दी थी. पूरा बयान कुछ इस तरह है-

"दृढ़ विश्वास के साथ पर्यावरण प्रबंधन में बेहद सक्रिय योगदान देने के लिए जनकराज के पास व्यापक अनुभव है. यह ऑस्ट्रेलिया में उनके शुरुआती अनुभव पर आधारित है, जहां पर कठोर प्रबंधन का सम्मान करना उस कार्य संस्कृति का हिस्सा था. 

विरासत के मुद्दों का प्रबंधन करना कितना कठिन होता है इस मसले से वो प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में जुड़े रहे हैं. इसमें अफ्रीका में विरासत संबंधी मुद्दों में सहायता के लिए जरूरी बातें भी शामिल हैं. उन्हें इस बात का पूरा भरोसा है कि उन्होंने हमेशा कार्य के तरीकों में सुधार किया और जिस स्थिति में परियोजना से जुड़े थे उससे बेहतर बनाकर बाहर आए.

इसलिए अडानी की ऑस्ट्रेलियाई परियोजना में उस अनुभव को शामिल किया गया है. पूरा दल अब तक ऑस्ट्रेलिया में लागू किए गए सबसे कठोर पर्यावरणीय नियमों को ध्यान में रखते हुए उसके अंतर्गत काम कर रहा है. अडानी द्वारा एबॉट प्वाइंट पोर्ट का प्रबंधन लिए जाने से पहले दशकों से अब तक ड्रेज्ड मैटेरियल को तट से पहले ही डिस्पोज किया जा रहा था. लेकिन अडानी ने इसको तट पर डिस्पोज सुनिश्चित करने के लिए नए विकल्प की तलाश शुरू की.

क्या काम कर सकता है और किसमें सुधार की जरूरत है, इसके व्यापक अनुभव के साथ ही जनकराज के पास ऑस्ट्रेलिया में बेहतर प्रबंधन की उपलब्धियां भी हैं. इससे अडानी ने एबॉट प्वाइंट पोर्ट के बेहतर प्रबंधन को मजबूत और सक्रिय बनाए रखा है. 

केसीएम के संचालन से संबंधित प्रश्नों के लिए सीधे मूल कंपनी यानी वेदांता रिसोर्सेज से संपर्क किया जाना चाहिए." 

First published: 23 November 2015, 9:37 IST
 
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