Home » इंटरनेशनल » Exclusive interview with Balochistan Activist Karima Baloch
 

‘युद्ध अपराध छिपाने के लिए पाकिस्तान ने मुझे रॉ एजेंट और आतंकवादी घोषित कर रखा है’

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 21 August 2016, 10:11 IST
QUICK PILL
15 अगस्त के दिन लाल किले से दिए गए अपने सालाना भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलोचिस्तान, गिलगित और पीओके का जिक्र कर एकदम से नई राजनीति का सूत्रपात किया है. आम भारतीयों के जेहन में पहली दफा बलोचिस्तान किसी गंभीर मसले के रूप में अंकित हो गया है.वहां पाकिस्तान के बलोचिस्तान सूबे में भी इस बायन के बाद सरगर्मियां बढ़ गई हैं. बलोचिस्तान की आज़ादी के लिए संघर्षरत बलोचिस्तान स्टूडेंट्स ऑर्गनाइज़ेशन (आज़ाद) पाकिस्तान में प्रतिबंधित संगठन है. भारतीय ख़ुफिया एजेंसी रॉ का एजेंट होने के अलावा पाकिस्तान ने इसे आतंकवादी संगठनों की सूची में भी डाल रखा है. कई साल तक अंडरग्राउंड रहीं इसकी मुखिया 32 वर्षीय करीमा बलोच फिलहाल टोरंटो में निर्वासित जीवन जी रह रही है.लाल किले पर प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के बाद करीमा ने अपना एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया है जिसमें उन्होंने मोदी को अपना भाई बताते हुए उनसे राखी के मौके पर अपनी बहन के लिए बलोचिस्तान की आजादी के लिए समर्थन मांगा है.करीमा के संगठन, बलोची आंदोलन, हिंदुस्तानी एजेंट होने के आरोप आदि मसलों पर कैच ने उनका लंबा इंटरव्यू किया है. उनसे हुई बातचीत का अंश:

बलोचिस्तान की आज़ादी की तरहीक़ फिलहाल किस अवस्था में है?

हमारी तहरीक़ 27 मार्च, 1948 को तब शुरू हुई जब पाकिस्तान ने हमारी ज़मीन पर कब्ज़ा किया. तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद इस कब्जे को खत्म नहीं किया जा सका. साल 2003 से इसमें ख़ासी तेज़ी और तब्दीली आई है. यह तहरीक़ की शिद्दत का नतीजा है कि पाकिस्तानी आर्मी, मिलिट्री इंटेलिजेंस और आईएसआई ने बलोचिस्तान में वॉर क्राइम की बाढ़ ला दी है. बलोच क़ौम के घर चलाए गए हैं. मास डिस्प्लेसमेंट और नरसंहार को अंजाम दिया गया है.

मगर पाकिस्तान मज़बूत स्थिति में है. दुनिया उसे पाकिस्तान का सूबा मानती है. चुनाव भी तय वक़्त पर होते हैं. आपके नुमाइंदे पाकिस्तानी असेंबली में बैठते हैं.

यह आपकी गतलफ़हमी है. बलोच आवाम पर पाकिस्तान की रियासत का कंट्रोल नहीं है और ना ही उसकी शिद्दत को अब रोक पाना मुमकिन है. बीते संसदीय चुनाव का लोगों ने बायकॉट किया था. बलोच क़ौम ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया था. पोलिंग स्टेशनों पर मरघट था. वहां से चुने गए एमपी के लिए नवाज़ शरीफ़ की पार्टी के मेंबरों ने वोट डाले. मैं यहां साफ़ करती हूं कि हमारे मुल्क़ बलोचिस्तान में वज़ीर-ए-आला आवाम नहीं चुनती. यह तय करना आईएसआई और पाकिस्तानी सेना का काम है. उन्हें फैसला करना होता है कि इस बार किस किसे सीएम बनाया जाना है.

आप इतने दावे से ऐसा कैसे कह सकती हैं

गुजरे चुनाव के वक़्त मैं बलोचिस्तान में ही छिपी हुई थी. आर्मी और फ्रंटियर कोर ने मस्जिदों और बाज़ारों में जाकर वोट डालने की धमकियां दीं. उन्होंने बलोचों को ज़िंदा जलाने और दफ़्न करने जैसी धमकियां देकर दहशत फैलाने की कोशिश की लेकिन डर आवाम के ज़ेहन से निकल चुका है. बेशक़ मुक़ामी लीडर ही चीफ़ मिनिस्टर बनता है लेकिन उन पर कंट्रोल आर्मी का है. बलोचिस्तान में जो पार्लियामेंट्री फ्रेमवर्क दिखता है वह सिर्फ दिखावा है जहां पाकिस्तान रस्मी तौर पर चुनाव करवाता है.

आपकी तंज़ीम पर पाकिस्तान में पाबंदी है. उसे टेररिस्ट ऑर्गनाइज़ेशन घोषित किया जा चुका है, फिर आपकी तहरीक़ कैसे चल रही है?

आज़ाद तरीके से सरगर्मी हम कभी नहीं कर पाए. हमारी तंजीम पर शुरू से हंटर चल रहा था. हमारे वाइस चेयरमैन जाकिर मजीद को आर्मी किडनैप करके ले गई. कॉमरेड शफी को 2010 में उठाया और अगले दिन उनकी लाश मिली. कॉमरेड कय्यूम समेत कई यूनिट और जोनल मेंबरों की लाशें वीराने में पेड़ों से लटकी पाई गईं. हम तब भी उसी हालात में काम कर रहे थे, जैसे अब बैन लगने के बाद कर रहे हैं.

बैन लगने से पहले ही हमारी तहरीक़ से जुड़ी मैग्ज़ीन, किताबें और पैम्फलेट हॉस्टलों-बाज़ारों ने निकालकर आग के हवाले कर दिए गए थे. हमारी पूरी लाइब्रेरी जला दी गई थी. हमें मालूम है कि जंगी जरायम करते हुए हुकूमत ज़रा भी नहीं हिचकती. उसका सामना करने का हमारे पास तजुर्बा है लेकिन हम अपनी स्ट्रैटजी आपसे साझा नहीं कर सकते.

पाकिस्तानी हुक़ूमत ने आपको आतंकवादी क्यों घोषित किया हुआ है?

पाकिस्तानी रियासत ख़ुद टेररिस्ट है. उसकी आर्मी, फ्रंटियर कोर बलोची क़ौम का क़त्ल-ए-आम करती है. मुझे पाकिस्तान द्वारा टेररिस्ट कहलाने से कोई फर्क़ नहीं पड़ता. वो मुझे हिंदुस्तान की ख़ुफिया एजेंसी रॉ की एजेंट भी कहते हैं लेकिन ये सारे इल्ज़ाम बेहद पुराने हैं. उनके प्रोपगंडा का मुझपर और मेरी तहरीक़ पर कोई असर नहीं है.

आपकी मांगें क्या हैं?

बलोचिस्तान की बहाली के लिए हमें मुकम्मल तौर पर आज़ादी चाहिए. हम फ्रीडम फाइटर्स हैं अलगाववादी नहीं हैं. इतिहास है कि बलोचिस्तान कभी भी सब कंटिनेंट का हिस्सा नहीं था लेकिन 27 मार्च, 1948 को उस पर कब्ज़ा कर लिया गया.

मुझे नहीं मालूम कि दुनिया के नक़्शे पर पाकिस्तान रहेगा या नहीं लेकिन बलोच हमेशा से एक आज़ाद और ज़िंदा क़ौम रही है. एक रियासत की गुलामी करते हुए हम 70 सालों से लड़ रहे हैं, सिर्फ इसलिए ताकि हमारी आने वाली नस्लों के लिए हम ज़िंदा रह पाएं. हम आज़ादी से कम पर कोई समझौता नहीं करने वाले हैं.

पाकिस्तान और आपकी तंज़ीम के बीच कभी डॉयलॉग हुआ है

डॉयलॉग दूर की बात है, उनके लोग मेरे घर पर चार दफ़ा मोर्टार से हमले कर चुके हैं. आर्मी, फ्रंटियर कोर और खुफिया एजेंसी ने मेरी मां और बहनों को लाइन में खड़ा करके शूट करने की धमकी दी. उन्होंने कहा था कि हम इलाक़ा छोड़कर कहीं और चले जाएं लेकिन हम लड़ रहे हैं. मैं सालों से अंडरग्राउंड हूं.

बलोचिस्तान में 5 से 10 किलोमीटर की दूरी पर फौजी चेक पोस्ट लगे हैं. बार-बार मुसाफ़िरों को बस से उतारकर उनके सामानों की तलाशी और घंटों धूप में खड़ा करके टॉर्चर किया जाता है. उनके फोटो और वीडियो बनाए जाते हैं. बावजूद इसके हमारी तहरीक़ जारी है, बिना किसी डायलॉग के. वो बातचीत में यकीन ही नहीं करते.

पाकिस्तान का दावा है कि आपकी तंज़ीम बलोचिस्तान स्टूडेंट्स ऑर्गनाइज़ेशन को रॉ ने खड़ा किया है

तंज़ीम नहीं पूरी तहरीक़ पर रॉ का एजेंट होने का इल्ज़ाम है. इसी की आड़ लेकर पाकिस्तान बलोची तहरीक़ के बड़े इंटलेक्चुअल फीगर्स और नागरिकों को मारता है और इल्ज़ाम रॉ पर थोप देता है. कभी आप क्वेटा का दौरा करें तो पाएंगे कि जब आप एक जगह खड़े हैं तो दूसरी चेकपोस्ट नज़र आ रही होगी. स्कूल जा रहे छोटे बच्चों तक के बैग़ खंगाले जाते हैं.

हर तरफ उनकी बख़्तरबंद गाड़ियां, गश्ती टीमें साए की तरह होती हैं, फिर भी हमले होते हैं. ये हमले कैसे और क्यों होते हैं? इनमें मारे हम जाते हैं और ख़ुद को दहशतगर्दी का शिकार मुल्क़ बताकर पाकिस्तान दुनिया से फंड्स जमा करता है. फिर मदद के नाम पर मिलने वाले जंगी जहाज़ और हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल हम पर होता है. बस यूं समझ लें कि बलोचिस्तान में अपनी जंग कायम रखने के लिए उन्हें रुपया दूसरे मुल्क़ों से मिलता है जिससे पहले सिर्फ धमाके करवाने होते हैं.

किन-किन मुल्क़ों से आपकी तहरीक़ को मदद मिलती है?

बलोच कौमी तहरीक़ को किसी मुल्क की मदद कभी नहीं मिली, वरना हमारी मुहिम आज एक कदम आगे होती. 67 साल बाद भी हम वहीं खड़े हैं और अपने संसाधनों के दम पर लड़ रहे हैं. पाकिस्तान कभी अफगानिस्तान तो हिन्दुस्तान का नाम लेता है लेकिन सच्चाई का पता कैसे चलेगा? बलोचिस्तान में इंटरनेशनल मीडिया का ब्लैकआउट है. सारे मुकामी सहाफी मारे जा चुके हैं. पाकिस्तान के दूसरे सूबों का मीडिया या ह्यूमन राइट्स इदारों को वहां जाने नहीं दिया जाता.

कभी-कभी बेशक़ सर्वे होते हैं लेकिन आर्मी वाले साए की तरह लगे रहते हैं. बेशक़ हमारे नज़रिए से जुड़ाव रखने वाले कराची और इस्लामबाद में हैं लेकिन जैसे ही हमारे लिए आवाज़ उठती है, उसे ख़ामोश कर दिया जाता है. 2014 में इस्लामाबाद में मारी गईं सबीन महमूद इसकी मिसाल हैं. मरने से ठीक पहले उन्होंने अपने दफ़्तर में बलोचिस्तान पर प्रोग्राम करवाया था.

लाल किले से पहली बार हमारे पीएम बलोचिस्तान पर बोले. आपको फायदा हुआ या मुश्किलें बढ़ने वाली हैं?

कोई बोले या ना बोले, नफ़ा हो या नुकसान मगर हम अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेंगे. हम सालों से इंटरनेशनल फ़ोरम पर अपने सवाल उठाते रहे हैं लेकिन सुनवाई नहीं होती. अब हिन्दुस्तान के वज़ीर-ए-आज़म नरेंद्र मोदी ने हमारा मामला उठाया है तो दुनिया इसपर सोच सकती है. बस हमें उनसे यही चाहिए कि वो हमारी आवाज़ उठाएं क्योंकि पूरे ख़ित्ते में बार-बार मास ग्रेव्स मिलने के बावजूद दुनिया यहां के हालात से अनजान है. अगर हमारा मुद्दा बार-बार उठाया गया तो सभी को पता चलेगा और बहस भी शुरू होगी.

आप नरेंद्र मोदी से किस तरह का समर्थन चाहती हैं, मोरल, फौजी हस्तक्षेप या फिर कुछ और?

पाकिस्तान निहत्थे लोगों पर 1948 से ज़ुल्म कर रहा है. उसे रोकने के लिए बेशक़ फौजी हस्तक्षेप चाहिए लेकिन हमारी तहरीक़ हम अपनी शर्तों पर लड़ेंगे. ऐसा नहीं हो सकता कि हम पाकिस्तान के हाथ से निकलकर हिन्दुस्तान के हाथ की कठपुतली बन जाएं. अगर दुनिया हमारी मदद नहीं करेगी तो हम ऐसे ही लड़ते रहेंगे. अच्छा होगा अगर हिन्दुस्तान समेत दूसरे मुल्क़ भी पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बनाएं.

नरेंद्र मोदी से आपको क्यों उम्मीदें हैं? वो तो कश्मीर मसले पर ही इंटरनेशनल कम्युनिटी को अपने पाले में नहीं कर पाए हैं?

उम्मीद नहीं लेकिन इस्तक़बाल ज़रूर करते हैं क्योंकि अब इस मुद्दे पर बहस के आसार बढ़ रहे हैं. पाकिस्तान हमेशा बलोचिस्तान को अंदरुनी मामला बताता है लेकिन 1948 में उसने अपनी सरहद फांदकर बलोचिस्तान पर कब्ज़ा किया. पाकिस्तान इस सच को छिपाता है और अब शायद इस झूठ की उम्र पूरी हो चुकी है.

आज़ाद बलोचिस्तान का कोई ख़ाका है आपके पास?

हम डेमोक्रेटिक लोग हैं और बलोच नेशनल मूवमेंट समेत हमारे सारे संघर्ष एक धर्म निरपेक्ष देश के लिए ही हैं. मज़हबी कट्टरपंथ पाकिस्तान की देन है. आधुनिक शिक्षा की जगह इस्लामी तालीम, मदरसे और जिहादी कैंप उन्होंने खड़े किए लेकिन हम अपने मुल्क़ में मज़हबी इंतेहा पसंदी को कभी परवान नहीं चढ़ने देंगे.

आप औरत हैं और आज़ादी की तहरीक़ का एक चेहरा भी. आपके सपनों के बलोचिस्तान में औरतें कहां होंगी?

मैं इस बात की क़ायल नहीं हूं कि मर्दों और औरतों के हुक़ूक को अलग करके देखा जाए. बेहतर होगा अगर सभी को बराबर का इंसान मानकर उनके हुक़ूक तय किए जाएं. एक इंसान के तौर पर जो हक मर्दों को मिलें, वही औरतों के पास भी होना चाहिए. हमारी तंज़ीम इसी नज़रिए की है जहां कई यूनिट में लड़कियां ज़्यादा हैं और सभी अपनी आज़ादी के लिए लड़ रही हैं.

First published: 21 August 2016, 10:11 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी