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फिदेल कास्त्रो और क्यूबा की क्रांति

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 November 2016, 12:07 IST
(एजेंसी)

क्यूबा की कम्युनिस्ट क्रांति के जनक फिदेल कास्त्रो का 90 साल की आयु में हवाना में निधन हो गया. उनके निधन पर शोक संवेदनाओं का सिलसिला जारी है.

जब-जब कास्त्रो का नाम जेहन में आता है, क्यूबा की क्रांति और फिदेल एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं. आखिर क्यूबा की क्रांति ने कास्त्रो को कैसे इतना महान बना दिया? जानते हैं कास्त्रो और क्यूबा की क्रांति के बीच संबंध.

क्यूबा क्रांति

साल 1952 में क्यूबा पर शासन करने वाले राष्ट्रपति फुल्गेन्सियो बतिस्ता अमेरिका के पक्के समर्थक थे. उन्होंने अपने शासनकाल में अमेरिकी हितों को सर्वोपरि रखा और क्यूबा की आम जनता को पूरी तरह से नजरअंदाज किया.

जिसके कारण वहां लोग भ्रष्टाचार, असमानता और दूसरी अन्य तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था. क्यूबा के बिगड़ते हालात और जनता के लगातार बढ़ते रोष की वजह से क्यूबा की क्रांति का जन्म हुआ. इसकी अगुआई फिदेल कास्त्रो और चे ग्वारा कर रहे थे. 26 जुलाई, 1953 को क्यूबा क्रांति की शुरुआत हुई.

दिसंबर 1958 को राष्ट्रपति बतिस्ता का तख्तापलट कर दिया गया. कास्त्रो ने क्यूबा का राष्ट्रपति बनते ही अमेरिकी विरोधी रुख अपनाया. वहीं, अमेरिका ने भी क्यूबा पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए.

उसके बावजूद क्यूबा ने अपने संघर्ष के बल पर पूरे विश्व में चीनी उत्पादन का रिकॉर्ड बनाया और क्यूबा को आज 'चीनी के कटोरे' के नाम से जाना जाता है.

फिदेल कास्त्रो

क्यूबा क्रांति से पहले फिदेल कास्त्रो एक युवा वकील थे. उनका जन्म 13 अगस्त 1926 में क्यूबा के फिदेल अलेजांद्रो कास्त्रो परिवार में हुआ था, जो काफ़ी समृद्ध परिवार माना जाता था.

साल 1952 में क्रांति से पहले कास्त्रो तानाशाह राष्ट्रपति फुल्गेन्सियो बतिस्ता के खिलाफ के चुनाव में खड़े हुए, लेकिन इससे पहले लोग वोट कर पाते, वोटिंग खत्म कर दी गई.

जनक्रांति शुरू करने के इरादे से 26 जुलाई को फिदेल कास्त्रो ने अपने 100 साथियों के साथ सैंटियागो डी क्यूबा में सैनिक बैरक पर हमला किया, लेकिन उन्हें नाकामी हाथ लगी.

इस हमले के बाद फिदेल कास्त्रो और उनके भाई राउल बच तो गए, लेकिन अन्य लोगों को जेल में डाल दिया गया.

फिदेल कास्त्रो ने बतिस्ता शासन के खिलाफ अभियान बंद नहीं किया. यह अभियान उन्होंने मैक्सिको में निर्वासित जीवन जीते हुए चलाया. वहां उन्होंने एक छापामार संगठन बनाया. इसे '26 जुलाई मूवमेंट' नाम दिया गया.

कास्त्रो के क्रांतिकारी आदर्शों को क्यूबा में काफी समर्थन मिला. 1959 में उनके संगठन ने राष्ट्रपति फुल्गेन्सियो बतिस्ता शासन का तख्तापलट कर दिया.

उसके बाद कास्त्रो क्यूबा के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बने. बीमारी और उम्र की अन्य परेशानियों के कारण फिदेल कास्त्रो ने जुलाई 2008 में अपने छोटे भाई राउल कास्त्रो के हाथ देश की सत्ता सौंप दी. वर्तमान में राउल कास्त्रो क्यूबा के राष्ट्रपति हैं.

विवादों भरी निजी जिंदगी

फिदेल कास्त्रो को क्यूबा की क्रांति के अलावा अन्य विवादों से भी जाना जाता है, जो उनकी निजी जिंदगी से जुड़ी हुई हैं. कहा जाता है कि फिदेल कास्त्रो हर दिन कम से कम दो महिलाओं के साथ संबंध बनाते थे.

क्यूबा के क्रांतिकारी नेता फिदेल कास्त्रो ने 82 साल की उम्र तक 35,000 महिलाओं के साथ संबंध बनाए. इस बात का दावा उन पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री में किया गया है.

न्ययॉर्क पोस्ट ने कास्त्रो के पूर्व अधिकारी के हवाले से कहा था कि वो रोजाना दिन में करीब दो महिलाओं के साथ संबंध बनाते थे. ये सिलसिला चार दशकों से भी ज्यादा समय तक चला.

फिदेल कास्त्रो ब्रिटेन की महारानी और थाईलैंड के राजा के बाद दुनिया के तीसरे ऐसे राष्ट्राध्यक्ष थे, जिसने सबसे लंबे समय तक शासन किया. वे 1959 से 1976 तक प्रधानमंत्री और 1976 से 2008 तक राष्ट्रपति बने रहे.

फिदेल कास्त्रो के नाम एक गिनीज बुक रिकॉर्ड भी दर्ज है. ये रिकॉर्ड उन्होंने भाषण देकर बनाया था. 29 सितंबर 1960 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में 4 घंटे, 29 मिनट का भाषण दिया था.कास्त्रो का 7 घंटे 10 मिनट का सबसे लंबा भाषण क्यूबा में 1986 में रिकॉर्ड किया गया था. ये भाषण उन्होंने हवाना में कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस के कार्यक्रम में दिया था.

कास्त्रो का दावा था कि अमेरिकी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) ने 634 बार उनकी मौत की साजिश रची थी. उनकी जान लेने के लिए उन पर जहरीली दवाओं, जहरीली सिगार, विस्फोटक और जहरीले पाउडर से लेकर तमाम तरह की चीजों का इस्तेमाल किया गया.

First published: 26 November 2016, 12:07 IST
 
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