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कैसे अफगान शरणार्थियों के भरोसे चल रहा है जर्मन कंपनियों का कारोबार ?

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 April 2018, 9:24 IST
(The Guardian)

एक ओर अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश विदेशी शरणार्थियों के आने पर रोक लगाने की कोशिश कर रहे हैं तो दूसरी ओर उनपर भरोसा जता रहा है. जर्मनी दुनिया का पहला ऐसा देश है, जो अपने देश में कर्मचारियों की कमी को पूरा करने के लिए विदेशी शरणार्थियों पर विश्वास जता रहा है. द गार्जियन में छपी एक खबर तो इसी ओर इशारा करती है.

दरअसल, द गार्जियन ने अफगानिस्तान के एक शरणार्थी जिया हयाफी की कहानी को प्रकाशित किया है. 20 साल के जिया हयाफी जर्मनी में एक शरणार्थी हैं और एक नर्स के रूप में काम करते हैं. वे पिछले तीन महीने से यहां काम कर रहे हैं. इससे पहले हयाफी की जिंदगी ऐसी नहीं थी. वो अफगानिस्तान पुलिस फोर्स में एक ऑफिसर थे. लेकिन आतंकवादी संगठन तालिबान की वजह से उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा और जर्मनी ने उन्हें शरण दी.

द गार्जियन की खबर के मुताबिक हयाफी बताते हैं कि उन्हें बुढ़े लोगों की सेवा करना अच्छा लगता है. क्योंकि जब वे बूढ़े हो जाएंगे तो उनकी भी कोई इसी तरह सेवा करे. यही नहीं ब्रेनडेनबर्ग में रहकर वे ब्रेकफास्ट से लेकर डिनर तक खुद बनाते हैं.

बता दें कि जर्मनी ने कुशल कामगारों और अर्थव्यवस्था के बीच लगातार बढ़ते अंतर के बावजूद दो साल में 10 लाख शरणार्थियों को शरण दी है. जर्मनी की 4 लाख कंपनियों में भी विदेशी शरणार्थियों अलग-अलग पोस्ट पर काम करते हैं. इन कंपनियों ने इनका शॉर्ट टर्म एग्रीमेंट कराकर किसी को इंटर्नशिप तो किसी को शॉर्ट टर्म के लिए काम पर रखा गया है.

The Guardian

आंकड़ों के मुताबिक जर्मनी में कुशल कामगारों की कमी के चलते हर तीसरे ट्रेनी को चिकित्सा देखभाल से संबंधित विकल्प को चुनना पड़ता है. जिनमें हयाफी जैसे लोग भी शामिल हैं. हालांकि उन्हें डर है कि कहीं जर्मनी उन्हें डिपोर्ट कर दोबारा अफगानिस्तान ना भेज दे. क्योंकि ऐसा करना अफगानियों के साथ आम बात है.

हमबर्ग चैंबर ऑफ कॉमर्स में शरणार्थी मामलों की कोर्डिनेटर स्टेफनी एंडर्स बतातें हैं कि जर्मनी की ज्यादातर बिजनेस रिपोर्ट्स में शरणार्थियों को काम देने को सकारात्म बताया है. ऐंडर्स का कहना है कि यहां की कंपनियां ट्रेनी को सिखाने के लिए खुशी जताती है. वे कहते हैं कि हाल के वर्षों में स्कूल छोड़ने के बाद कुछ जर्मन युवाओं में इस बात को लेकर निराशा देखी गई. बावजूद इसके वे काम पर आते हैं.

First published: 10 April 2018, 17:06 IST
 
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