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एच-1बी वीज़ा पाबंदी विवाद: निर्मला सीतारमण के कड़े शब्द क्या रंग लाएंगे?

नीरज ठाकुर | Updated on: 22 April 2017, 10:04 IST


अमरीका में डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन द्वारा एच-1बी वीज़ा पर लगाए गए प्रतिबंध से भारत हतोत्साहित हुआ है. इस पाबंदी से भारतीय और विदेशी कम्पनियों पर असर पड़ेगा. एच-1बी वीज़ा के तहत कई भारतीय कम्पनियां हर साल हज़ारों लोगों को अमरीका में काम करने के लिए भेजती हैं. इस मुद्दे पर विनम्र रवैया अपनाने और आधिकारिक रूप से अमरीका को भरोसा दिलाने की कोशिश के बाद भारत सरकार अब अमरीका को दबाव में लाने के लिए कठोर कदम उठाने के उपाय तलाश रही है.


बीते 20 अप्रैल को वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने इशारा किया कि अगर अमरीका एच-1बी वीज़ा मानकों पर अपने रुख में बदलाव नहीं लाता है तो पूरी बहस का विस्तार कर इसमें उन अमरीकी कम्पनियों को भी शामिल करना होगा जो भारत में मुनाफ़ा कमा रही हैं और जो अमरीकी अर्थव्यवस्था में जाता है.


वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह भी कहा कि ऐसा नहीं है कि केवल भारतीय कम्पनियां ही अमरीका में हैं. कई बड़ी अमरीकी कम्पनियां भी भारत में हैं. वे भी यहां मुनाफ़ा कमाती हैं जो अमरीकी अर्थव्यवस्था में जाता है. इसलिए इस परिस्थिति में ऐसा नहीं हैं कि एकपक्षीय तरीके से केवल भारतीय कम्पनियों को अमरीकी सरकार के कार्यकारी आदेश का सामना करना है, भारत में कई अमरीकी कम्पनियां भी हैं जो कई साल से काम कर रही हैं. इसलिए मैं चाहती हूं कि पूरी बहस का विस्तार हो. इसमें इन सभी पहलुओं को शामिल किया जाए और हम सुनिश्चित करेंगे कि इन सभी कारकों को दिमाग में रखा जाए.


एच-1बी वीजा लेने वालों में भारतीयों की सबसे बड़ी तादाद है. इसके बाद चीन का नम्बर आता है. साल 2014 में अमरीकी ने जितने एच-1बी वीजा अप्रूव्ड किए थे, उसमें 70 फीसदी हिस्सा भारतीयों का था. कम्प्यूटवर्ल्ड के अनुसार कम्प्यूटर पेशेवरों के लिए जितने एच-1बी वीजा जारी किए जाते हैं, उसमें लगभग 86 फीसदी भारतीय पेशेवरों को जारी किए जाते हैं.

 

कब तक संकट?

 

इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन विभाग के पूर्व सचिव अजय दुआ कहते हैं कि अगर भारत इस लाइन पर सोच रहा है कि वह इसे अमरीका के साथ पूरी तरह व्यापार युद्ध में बदल देगा तो इसका असर दोनों राष्ट्रों के सम्बंधों पर पड़ेगा. मुक्त व्यापार अर्थव्यवस्था में भारत अपने देश में व्यवसाय कर रहीं विदेशी कम्पनियों पर रायल्टी भुगतान मुद्दे पर समान क्षेत्रों वाली कम्पनियों पर प्रतिबंध लगा सकता है लेकिन किसी विशिष्ट देश की कम्पनियों का चयन करना और रॉयल्टी भुगतान को रोकने के लिए अदालत में अपने फैसले का बचाव करना एक मुश्किल भरा काम होगा.


दुआ आगे कहते हैं कि अमरीका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. इस मुद्दे को उस स्तर पर आगे ले जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था एक बहुत बड़े पैमाने पर प्रभावित होगी. वर्ष 2016 में भारत का अमरीका के साथ व्यापार 42 बिलियन डॉलर का था और भारत का कुल निर्यात 16.1 फीसदी का ही था.


एक कॉरपोरेट वकील, जो भारत सरकार को कानूनी मामलों पर सलाह देते हैं, ने अपना नाम न छापने का शर्त पर कहा कि आज, भारत का विदेशी मुद्रा नियंत्रण विश्व व्यापार संगठन की प्रतिबद्धता नहीं है. अगर भारत सरकार फैसला करती है कि उसे रॉयल्टी भुगतान की अनुमति नहीं देनी है तो यह उसका विशेषाधिकार है. हालांकि, अगर भारत केवल अमरीकी कम्पनियों को ही बाहर निकालने का निर्णय लेता है तो इस मुद्दे को भारत के भेदभावपूर्ण उपचार के आरोपों पर विश्व व्यापार संगठन में ले जाया जा सकता है. कानूनी सलाह देने वाले वकील साहब आगे कहते हैं कि आप मुक्त व्यापार समझौते के तहत कुछ देशों के साथ उनका पक्ष तो ले सकते हैं पर आप किसी विशेष देश को दंडित नहीं कर सकते.


वहीं पूर्व एडिशनल सॉलिस्टर जनरल विश्वजीत भट्टाचार्य मानते हैं कि भारत के पास ऐसी नीति तैयार करने की क्षमता है जो इस तरह के फैसले को कानूनी रूप से पीछे ले जाती है. इस तरह के उपाय भारत की विदेश नीति के दायरे में आते हैं. वह आगे कहते हैं कि यह भारत सरकार पर निर्भर है कि वह इस मुद्दे पर आगे किस तरह से बढ़ना चाहती है.


कॉरपोरेट जगत के एक अन्य वकील भी, जो अपना नाम उजागर नहीं करना चाहते. वो कहते हैं कि सिर्फ अमरीका ही नहीं है जिसने आप्रवासियों के लिए वीज़ा प्रतिबंध लगाया है. ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और ब्रिटेन जैसे अन्य देश भी हैं, वे सभी संरक्षणवाद के लिए सहारा ले रहे हैं. वर्तमान हालात में केवल एक देश को बाहर करना और उसके प्रभावों से निपटना मुश्किल भरा काम होगा.

 

First published: 22 April 2017, 10:04 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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