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BRICS: मेकिंग इंडिया के लिए अहम है रूस से रिश्ते में मज़बूती

कंवल सिब्बल | Updated on: 18 October 2016, 4:52 IST
(सजाद मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • अगर रूस चीन की तरह ही पाकिस्तान के साथ संबंध बढ़ाने की कोशिश कर रहा है तो यह भारत के लिए वाकई चिंता की बात है. 
  • रूस को पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ चलाए जा रहे आतंकवाद के खिलाफ और ज्यादा खुलकर बोलना होगा क्योंकि इस मुद्दे पर खाड़ी देशों ने उससे अधिक खुलकर अपना रुख साफ किया है.

व्लादिमीर पुतिन ने साल 2000 में बतौर राष्ट्रपति रूस की कमान संभाली. तभी से भारत-रूस के बीच द्विपक्षीय वार्ताएं होती आई हैं जो दोनों देशों के बीच संबंधों के महत्व को दर्शाता है. इन वार्ताओं का उद्देश्य इनकी उच्च स्तर पर निगरानी भी है ताकि संबंध बने रहें और समस्याओं के समाधान के साथ ही नए अवसर भी तलाशे जाएं. भारत-रूस संबंधों ने अपने लिए आधार खोज ही लिया है. 

रक्षा सहयोगी

दोनों देशों के बीच घनिष्ठ रक्षा संबंध जगजाहिर हैं. रूस हमेशा से ही हमारा सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी रहा है. अब अमेरिका और इजराइल इस क्षेत्र में भारत के साथ सहयोग बढ़ा रहे हैं. लेकिन रक्षा निर्माण क्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेक इन इंडिया नीति के तहत क्रेता-विक्रेता संबंध और भारत में लाइसेंस के अधीन निर्माण भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं करते. 

देखा जाए तो रक्षा क्षेत्र में परम्परागत सहयोगी होने के नाते रूस भारत को अत्याधुनिक रक्षा उपकरण और तकनीक देने में और देशों के मुकाबले अधिक उदार है. हमें अपना देसी रक्षा निर्माण बेस बनाने के लिए रूस को राजनीतिक महत्व देना ही होगा. 

रूस भारत को अत्याधुनिक रक्षा उपकरण और तकनीक देने में और देशों के मुकाबले अधिक उदार है.

सवाल यह है कि क्या रूस के व्यापारिक तौर तरीके और रक्षा उद्योग संगठन ऐसा बेस बनाने के लिए भारत के निजी क्षेत्र के साथ तालमेल बिठा पाएंगे. निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी में पारदर्शिता व्यापार की पहली शर्त होती है. रूस के लिहाज से देखा जाए तो उत्पाद की गुणवत्ता के साथ-साथ उसकी कीमत भी महत्वपूर्ण है.

रूस ने डिजाइन पक्ष पर भारत के साथ सहयोग की इच्छा जताई है. पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों जैसे प्रोजेक्ट में डिजाइन बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है लेकिन इसमें प्रगति की रफ्तार काफी धीमी है.

KA-226 हेलीकॉप्टरों के निर्माण का प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूरा करना दोनों देशों के लिए एक प्रायोगिक टेस्ट साबित होगा. सीरिया के युद्ध जैसे हालात में रूस का वहां अत्याधुनिक रक्षा तकनीक का परीक्षण करना इस बात का संकेत है कि रूस का रक्षा क्षेत्र आधुनिक हो रहा है. 

इससे भारत-रूस रक्षा सहयोग के नए द्वार खुलेंगे. पिछले साल हमने रूस से एस-400 वायु रक्षा प्रणाली प्राप्त करने का फैसला किया था, जिस पर इसी गोवा सम्मेलन में करार किया गया है. 

परमाणु सहयोग

हमारे द्विपक्षीय संबंधों में परमाणु सहयोग बहुत बड़ा मुद्दा है. कुडनकुलम (केके) 1 और 2 परियोजनाएं सफलतापूर्वक पूरी कर ली गई हैं. केके 3 व 4 को भी फाइनल कर दिया गया है और काम शुरू करने की तैयारी चल रही है. केके 5 व 6 पर बातचीत चल रही है.

रबल की कीमतों में भारी गिरावट, रूपए की कीमत में गिरावट और रूस द्वारा मिस्र व बांग्लादेश को ऑफर की जाने वाली शर्तें इस वर्ष के अंत तक तय कर ली जाएंगी.

भारत रिएक्टरों के लिए स्वयं उत्पादन करना चाहता है ताकि एक देसी मैन्यूफैक्चरिंग बेस बनाया जा सके.

भारत रूस से वादे के मुताबिक तय किए गए रिएक्टर खरीदेगा. कुडनकुलम के अलावा आंध्रप्रदेश के लिए भी ये रिएक्टर खरीदे जाएंगे. पश्चिम बंगाल सरकार ने रिएक्टर लगाने से इनकार कर दिया है. इसलिए कुडनकुलम के लिए 1000 मेगावाट की जगह 1200 मेगावाट वाले नए रिएक्टर खरीदे जाएंगे. न्यूक्लियर रिएक्टर जैसे इस अत्याधुनिक क्षेत्र में अपना देसी मैन्युफैक्चरिंग बेस बनाने के लिए भारत रूसी रिएक्टरों के लिए स्थानीय स्तर पर ही उत्पादन बढ़ाना चाहता है.

फिलहाल व्यवहारिक कारणों के चलते मुख्य रूप से ऐसा किया जाना संभव नहीं है लेकिन वक्त आने पर यह होगा जरूर. हमारे न्यूक्लियर क्षेत्र में रूस की सक्रिय भूमिका को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है कि यह भारत की एनएसजी सदस्यता का पुरजोर समर्थन करेगा. उसे भविष्य में भी भारत से इस क्षेत्र में अच्छा निवेश मिलने की उम्मीद है.

ऊर्जा क्षेत्र

ऊर्जा सहयोग क्षेत्र में कुछ प्रगति हुई है. रूस के पास काफी बड़े ऊर्जा संसाधन हैं और भारत में ऊर्जा की काफी कमी है. इसे अर्थव्यवस्था में विकास के साथ ही अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी. रूस और चीन के बीच तो गैस अनुबंध भौगोलिक मजबूरियों के चलते टूट गए थे लेकिन भारत-रूस के संबंधों के मामले में ऐसा नहीं है. सरकारी कम्पनियों के साथ ही इस क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियां भी आगे आ रही हैं जो स्वागत योग्य कदम है. 

2015 में एस्सार एंड रोजनेफ्ट ने एस्सार के वाडिनार ऑइल रिफाइनरी में 49 प्रतिशत की हिस्सेदारी लेने का समझौता करने का ऐलान किया. इसके तहत एस्सार को दस साल तक कच्चे तेल की आपूर्ति की जाएगी. अमेरिका हालांकि रूसी तेल सेक्टर, खास तौर पर रोजनेफ्ट पर प्रतिबंध लगा रहा है. इससे जटिलता बढ़ सकती हैं.

2015  में ओवीएल ने वैंकॉर्नेफ्ट प्रोजेक्ट में 15 प्रतिशत हिस्सेदारी पाने के लिए रोजनेफ्ट के साथ एक करार पर हस्ताक्षर किए. वैंकॉर ऑइल ब्लॉक में 23-9  प्रतिशत हिस्सेदारी पाने के के लिए इस वर्ष जून में ऑइल इंडिया लिमिटेड, इंडियन ऑइल और भारत पेट्रो रिसोर्स लिमिटेड ने रोजनेफ्ट के साथ एक करार किया. अमेरिका और यूरोपीय संघ से प्रतिबंधों के चलते पश्चिमी देशो से रूस के हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में निवेश प्रभावित हुआ है. और इससे भारत के लिए अवसर खुल गए हैं और लगता है हम इसका फायदा उठा रहे हैं.

व्यापार

सरकारी प्रयासों के बावजूद भारत और रूस के बीच व्यापार कम ही रहता है. द्विीपक्षीय संबंधों में यह बहुत बड़ी कमजोरी मानी जाती है. बड़े पैमाने पर व्यापार और निवेश संबंधों से दो देशों के बीच सरकारी, आर्थिक कारकों और जनता के बीच सम्पर्क बढ़ते हैं.

भारत में अर्थव्यवस्था से जुड़े आधुनिक क्षेत्र रूस के मोहताज नहीं हैं. भारत सरकार ने मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, स्मार्ट सिटी और ऐसी ही कई अन्य योजनाएं शुरू की हैं. इसके लिए आवश्यक तकनीकी प्रबंधन और वित्तीय सहायता के लिए भारत अत्याधुनिक औद्योगिक देशों तक पहुंच बना रहा है.

अन्य क्षेत्रों में ऐसे मजबूत संबंध होने के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध अभी बहुत अच्छे नहीं हैं

स्वास्थ्य, नवीनीकृत ऊर्जा, साफ कोयला तकनीक, सौर ऊर्जा-बल्कि कहना चाहिए कि अविष्कार के क्षेत्र में हम रूस के बजाय पश्चिम की ओर बढ़ रहे हैं.

इसीलिए मीडिया भी भारत-रूस संबंध को ज्यादा तरजीह देता नजर नहीं आता. दिसम्बर 2014 में दोनों देशों ने 2025 तक 30 अरब डॉलर के व्यापार साझेदारी का लक्ष्य निर्धारित किया है. 2015 में दोनों देशों के बीच मात्र 7.83 अरब डॉलर का ही व्यापार हुआ. पिछले साल के मुकाबले इसमें 17.74 प्रतिशत की गिरावट देखी गई.

पाक से चिंता

भारत ने रूस के पाक के साथ बढ़ते रक्षा संबंधों पर गहरी चिंता जताई है. मास्को में भारत के राजदूत ने कहा कि रूस ऐसे देश को रक्षा संबंधी प्रस्ताव दे रहा है, जिसकी विदेश नीति आतंकवाद को दूसरे देशों के खिलाफ इस्तेमाल करना हो, जो कि गलत है. 

पड़ोसी देश के साथ रूस के इस नए समीकरण की आलोचना हो रही है. उरी हमले के ठीक बाद रूस का पाकिस्तान के साथ संयुक्त सैन्य अभियान किया जाना इसकी खास वजह रही. यह ठीक वैसा ही था जब भारत ने यूक्रेन द्वारा ओडेसा में आतंकी हमला करने के बाद यूक्रेन के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास किया था.

पाक के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने के रूस के उद्देश्य साफ नहीं हैं और जो सफाई वह दे रहा है, वह भी मान्य नहीं है. जब अमेरिका ही अफगान में आतंक पर पाक से कोई उम्मीद नहीं बांध सका तो रूस कैसे मान बैठा कि पाक आतंकवाद से दूर रहेगा.

रूस को पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ चलाए जा रहे आतंकवाद के खिलाफ और ज्यादा खुलकर बोलना चाहिए.

अगर रूस चीन की तरह ही पाकिस्तान के साथ संबंध बढ़ाने की कोशिश कर रहा है तो यह भारत के लिए वाकई चिंता की बात है. रूस को भारत-पाक में से किसी एक को चुनना होगा. उसे पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ चलाए जा रहे आतंकवाद के खिलाफ और ज्यादा खुलकर बोलना होगा. यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर खाड़ी देशों ने रूस से अधिक खुलकर अपना रुख स्पष्ट किया हुआ है.

पिछली कई सरकारों के बजाय मोदी सरकार रूस के साथ हमारे संबंधों का महत्व बखूबी समझती है. हमें इस समय रूस के साथ संबंधों में स्थिरता लानी होगी, जबकि पश्चिम न उसे अकेला करके चीन का मुंह देखने को मजबूर कर दिया है. 

First published: 18 October 2016, 4:52 IST
 
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