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शंघाई सहयोग संगठन की सदस्यता भारत के हित में, जानिए कैसे?

अशोक साजनहार | Updated on: 2 July 2016, 7:36 IST

वर्ष 2001 में स्थापित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के जुलाई 2015 में रूस के उफा शहर में हुए शिखर सम्मलेन में भारत और पाकिस्तान को एससीओ का पूर्ण सदस्य बनाकर इस क्षेत्रीय संगठन का विस्तार करने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया था. गत 23 और 24 जून को शंघाई सहयोग संगठन के ताशकन्द शिखर सम्मलेन में पूर्ण सदस्यता के लिए प्रक्रिया की शुरुआत करते हुए दोनों देशों ने दायित्व संबंधी दस्तावेज (मेमोरंडम ऑफ ऑब्लीगेशन- एमओओ) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं.

सदस्य बनने के लिए आवश्यक औपचारिकताए पूरी करने के बाद भारत को करीब 30 ऐसे अन्य दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने होंगे और वह जून 2017 में कजाखस्तान में होने वाले संगठन के सम्मेलन में पूर्ण सदस्य बन जाएगा. अपनी स्थापना के बाद से ही एससीओ ने सुरक्षा, व्यापार, विनिवेश, कनेक्टिविटी, ऊर्जा, एससीओ बैंक, संस्कृति प्रसार आदि महत्वपूर्ण मुद्दों पर पारस्परिक सहयोग के लिए सहमति बनाई है.

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एससीओ की स्थापना 2001 में रूस, चीन, कजाखस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किरगित गणराज्य के राष्ट्रपतियों ने की थी. हालांकि इनकी भूमिका अभी कोई उत्साहजनक रूप नहीं ले सकी है. इसकी एक वजह सामन्वय का अभाव भी है. रूस के समर्थन से चीन के प्रभुत्व वाला एससीओ अभी भी रुतबा हासिल करने के लिए जूझ रहा है. 

इसके बावजूद एससीओ को कमतर नहीं आंका जा सकता क्योंकि इसका फैलाव बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय, भू-राजनीतिक, रणनीतिक और आर्थिक तरक्की से जुड़ा हुआ है.

अवसर और चुनौतियां

भारत की सदस्यता से संगठन को सार्थक मजबूती मिलेगी विशेषकर आज के अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्य में. भारत सालाना 7.5 फीसदी जीडीपी के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेज गति से प्रगति करने वाला देश है. यह विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (अमेरिका आठ ट्रिलियन डॉलर) पीपीपी टर्म्स में और सातवां सबसे बड़ा देश (अमेरिका 2.3 ट्रिलियन डॉलर) नॉमिनल डॉलर टर्म्स में है.

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बड़ा बाजार, मजबूत अर्थव्यवस्था, एफडीआई, बचत दर, आर्थिक सुधारों आदि से भारत का विश्वास बढ़ा है. गहरी आर्थिक साझेदारी से व्यापार बढ़ेगा तो साथ ही निवेश, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, ऊर्जा क्षेत्र में भारत की क्षमताएं एससीओ के देशों को व्यापक आर्थिक लाभ पहुंचा सकती हैं और यूरेनियम, तेल, गैस, कोयला आदि से सम्पन्न मध्य एशिया और रूस को भारत बड़े बाजार के रूप में मिल सकता है.

आतंकवाद और कट्टरवाद

अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो सेनाओं के हटने के बाद एससीओ को वहां सुरक्षा की जिम्मदारी संभालने की जरूरत होगी. अफगानिस्तान में हालात को स्थिर करने में भारत अपनी भूमिका निभाने में समर्थ हो सकता है. तालिबान के बढ़ते हमलों से वहां के हालात काफी तकलीफदेह हो गए हैं. क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए आतंकवाद और कट्टरवाद से जूझना काफी मुश्किल भरा काम है. भारत खुद भी पिछले 30 सालों से आतंकवाद से पीड़ित रहा है.

कट्टरवाद के अभिशाप से इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन को हावी होने और अपना प्रभाव फैलाने में मदद मिली है

आतंकवाद से जूझने के चलते भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठानों को खुफिया सूचनाएं एकत्रित करने, प्रशिक्षण आदि में चीजों की तह तक प्रवेश करने की क्षमता हासिल हो गई है. क्षेत्र में बढ़ते आतंकवाद के खतरे से अफगानिस्तान में हिंसा की घटनाएं गहराई से प्रभाव डाल रही हैं. इसके चलते मध्य एशिया में सरकारों को अस्थिर करने में क्षेत्रीय संगठन जैसे इस्लामिक मूवमेन्ट ऑफ उज्बेकिस्तान, हिज्ब-उत-तहरीर आदि को प्रोत्साहन मिला है. कट्टरवाद के अभिशाप से इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन को हावी होने और अपना प्रभाव फैलाने में मदद मिली है.

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यह भी खबर है कि तालिबान, अल-कायदा के कई कैडर उनका साथ छोड़कर इस्लामिक स्टेट में शामिल हो गए हैं. आईएस का जाल मध्य एशिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तेजी से फैल रहा है. मध्य एशिया के सैकड़ों युवक और युवतियां इस संगठन में शामिल होने के लिए अपना घर छोड़ चुके हैं.

भारत को आतंकवाद और कट्टरवाद से जूझने का अनुभव है. भारत के अनुभवों का लाभ एससीओ देशों के साथ साझा हो सकता है. भारत खुद ताशकंद स्थित रीजनल एंटी टेरिरिस्ट स्ट्रक्चर (रैट्स) के साथ अपने अनुबंध को और ऊंचाई दे सकता है. रैट्स एससीओ की ही एक सहयोगी इकाई है.

संबंधो की स्थापना

मध्य एशिया भारत के विस्तारित पड़ोस का एक हिस्सा है. हालांकि ये देश सुरक्षा, राजनीतिक, अर्थ, व्यापार, विनिवेश और ऊर्जा सम्बंधों में भारत की उपयोगिता को महसूस करने में असफल रहे हैं क्योंकि भारत की सीमाएं इस क्षेत्र के देशों के साथ नहीं लगती हैं. एक अन्य वजह यह भी है कि मध्य एशियाई देशों के बीच उच्चतम स्तर के नेताओं का लगातार आना-जाना नहीं है.

एससीओ की सदस्यता भारत के लिए सुनहरा अवसर होगी. भारत के प्रधानमंत्री मध्य एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों से नियमित और बार-बार मिलते रहेंगे. यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (ईईयू) में भारत की सहभागिता इस साझेदारी के महत्व में और इजाफा करेगी. मध्य एशिया के देशों में जाने के लिए भारत के पास अभी कोई सीधा सड़क सम्पर्क मार्ग नहीं है.

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पाकिस्तान इन देशों के लिए संपर्क मार्ग मुहैया करवाने से हमेशा भारत को इनकार करता रहा है. अब भारत ने जापान के वित्तीय और तकनीकी समर्थन से ईरान के चाबहार तट को विकसित करने का कदम उठाया है.

हाल में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ईरान की यात्रा पर गए थे तो उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति के साथ चाबहार और उससे जुड़े रेल-नेटवर्क के विकास के लिए 500 मिलियन डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. भारत ने अंतरराष्ट्रीय नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के निर्माण को भी प्राथमिकता दी है.

भारत ने मध्य एशिया के देशों के साथ अपने रिश्तों को मजबूती दी है. प्रधानमंत्री मोदी की जुलाई में पांच मध्य एशियाई गणराज्यों की ऐतिहासिक यात्रा से कई सम्बंधों को मजबूती मिली है, कई समझौतों पर हस्ताक्षर भी हुए हैं. दिसम्बर 2015 में तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत (टापी) गैस पाइप लाइन का निर्माण शुरू हो गया है. यह आपसी लाभ परियोजना का सुस्पष्ट उदाहरण है.

निष्कर्ष

कुछ विश्लेषकों ने चिंता जताई है कि भारत और पाकिस्तान की सदस्यता से एससीओ का ध्यान मध्य एशिया से हटकर दक्षिण एशिया की तरफ हो सकता है. इससे एससीओ का काम प्रभावित हो सकता है. लेकिन यह पूरी तरह असंभव है. भारत का एससीओ सदस्यों के साथ शामिल होने का उद्देश्य यही है कि वह क्षेत्र में शांति, सुरक्षा, ऊर्जा व्यापार, नागरिकों के बीच आपसी संबंध और आर्थिक विकास को बढ़ावा दे सके.

चीन के कुछ जानकारों का विचार है कि भारत और पाकिस्तान की एससीओ में सदस्यता से दोनों देशों को सीमा विवाद हल करने में मदद मिलेगी. इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि एससीओ के पूर्ववर्ती ने अपने सदस्य देशों के बीच लोकतांत्रिक सीमाएं बना ली हैं. ये सीमाएं सफलतापूर्वक बना ली गईं थीं.

हालांकि यह सिर्फ सोच ही हो सकती है. भारत ने दृढ़ता से कह दिया है कि भारत-पाक के विवाद में तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है. कोई भी समाधान तभी सम्भव है जब पाकिस्तान आतंकवाद रोके जो उसकी नीति का एक स्थायी हिस्सा बन गया है. एससीओ में भारत की सदस्यता संगठन, मध्य एशिया, रूस और चीन के साथ ही भारत के लिए भी लाभदायक है. यदि सदस्य देश दायित्वों के साथ निर्वहन करेंगे तो उन्हें व्यापक लाभ होंगे.

First published: 2 July 2016, 7:36 IST
 
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